वो अपने पार्टनर के साथ मिलकर समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के काम में जुटी हुई थी.
दोनों वसुधैव कुटुम्बकम् से आगे ब्रह्मांडम् कुटुम्बकम् की बात करते. कुछ ही आगे बढ़ पाई थी कि पार्टनर प्रतिक्रियावादी ताकतों का शिकार बन गया.
मगर वह हार नहीं मानती है , अकेले ही आगे बढ़ती है. संयोग से उसे एक नया पार्टनर मिल जाता है. दोनों मंजिल की ओर तेजी से बढ़ते हैं. लेकिन उसकी एक गलत आदत ने उसे उस मुकाम पर पहुंचा दिया कि प्रोफेसर आयशा के पदार्पण का रास्ता साफ हो गया. लेकिन कैसे?
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"मेरी जनहित याचिका"
में. Matrubharti पर ही.