फ़िल्म -- आर्टिकल 15
अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित फिल्म जो काफी चर्चा में हैं।
एक सत्य घटना पर आधारित फिल्म जिसके फिल्माकंन में घटनाओं को बुरी तरह से तोड़ा गया है। सत्य को बैकफुट पर रखकर इसे जातीय रँग का जामा पहना दिया।
आयुष्मान खुराना का अभिनय एक क्षण के लिए भी अभिनय नहीं लगा। ऐसा लगा जैसे वो अपनी जिंदगी की कहानी हमारे सामने रख रहे हैं।
सयानी गुप्ता, मनोज पाहवा का अभिनय दमदार है। फ़िल्म के हर कलाकार ने अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया। दो तीन सीन को छोड़कर फ़िल्म रियलिस्टिक लगती है ड्रामा नही लगती। फ़िल्म को मात्र मनोरंजन के लिए नही देख सकते, काफी बातें है जो सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
भारत एक विकासशील देश है जहाँ विकास का मुद्दा जोर शोर से उबलता है, लेकिन क्या उतनी ही तेजी से होता भी है? यह एक बड़ा और गम्भीर सवाल है।
एक विशेष पिछड़ी जाति इस फ़िल्म का केंद्र रही। आज भी जिस तरह से गटर की सफाई की जाती है वह मन को विचलित करती है। हालांकि बड़े शहरों में ऐसी स्थिति नही है वहाँ मशीनों द्वारा यह कार्य सम्पन्न किया जाता है लेकिन दूर दराज के गांवों में क्यों नही?
समानता का अधिकार
और
आरक्षण का लाभ
एक ही व्यक्ति को दोनो चाहिए! यह कैसे सम्भव है?
एक जाति जो स्वयम ही दो धड़ों में बंटी हुई है, आरक्षण से लाभान्वित लोग और उससे वंचित जन।
एक ही जाति से जहाँ कुछ परिवार आरक्षण से पीढ़ी दर पीढ़ी पुनः लाभ उठाते जा रहे हैं वहीं कुछ परिवार ऐसे जिनमें सड़क पर झाड़ू लगाने की सरकारी नौकरी को ही जन्मसिद्ध अधिकार मानते है इस मानसिकता को क्या कहेंगे?
एक सीन में फ़िल्म के नायक की साथी का कहना कि - "राजा की जरूरत ही क्या है?"
हम कहते कि- "राजा विहीन देश की जनता को अनाथ समझ कोई भी दूसरा देश काबिज होने चला आएगा। राजा देश को दिशा देता है, दिशाविहीन समाज तो बहुत ही घातक परिणाम लेकर आता है।"
एक ईमानदार पुलिस कर्मी पर राजनैतिक दबाव ने जहां गटर की बदबू फैलाकर मन को विचलित किया वहीं उसकी कार्यप्रणाली ने पहली बारिश के बाद उठी मिट्टी की सौंधी सुगंध से महका दिया। अगर आप सत्य के लिए सत्ता से लड़ते हैं तो रास्ते भी खुद चलकर स्वागत के लिए खुल जाते हैं।
एक शब्द फ़िल्म में बारम्बार प्रयुक्त हुआ- वो लोग"
कौन हैं यह वो लोग?
यह वो लोग हैं जो बरसों से वोट की राजनीति को गर्म कर रहे हैं? जिसका लाभ हर पार्टी ने उठाया।
इनमें हिम्मत नही आरक्षण के खिलाफ़ कदम उठाने की और ना ही किसी दल ने हिम्मत दिखाई इसे खत्म करने की।
यह कभी नही कहेंगे कि हम भी बाकी सभी की तरह मेहनतकश इंसान हैं तो पिछड़े क्यों घोषित हैं?
आज़ादी के 70 साल बाद भी जो पिछड़े विशेष दर्जे से लाभ लेकर भी अगड़े नही बन जाये तो भगवान ही मालिक है।
लिखने को इस मुद्दे पर बहुत कुछ है मगर समझदार को इशारा काफी है।
विनय...दिल से बस यूँ ही