बारिशें धूप की अब कहीं नही हुआ करती l
कच्ची बस्तियो में बो शाम अब नही हुआ करती ll
बैठा करते थे चबूतरों पर पीपल की छांव में l
बुजुर्गो की बो बैठक अब नही हुआ करती ll
चार घरो की चर्चा और पुरे गाँव भर का हाल l
बो चर्चायें अनुभबो की अब नही हुआ करती ll
चाचा बाबा करते थे जिनकी शाख से दातुने l
उन पेड़ों की छाँव अब नही हुआ करती ll
- Rj krishna