बाढ़ की विभीषिका में सड़के निरुत्तर है ।
अपनी असहायता का बोध हैं करा रही ।
छोटे सरोवर भी क्रोध में उफन रहे हैं ।
नदियों की धाराएं हर्षित हो गा रहीं ।
आम जन कैदी बन गेह में समाया है ।
भोजन पानी की चिंता है सता रही ।
धान गेंहूँ दाल नमक जल में समा गये ।
पीकर अशुद्ध जल बेटी भी जा रही ।
इन्द्र देव रोको अब तो निज वेग को ।
अब तो सहन शक्ति सीमा पार जा रही ।