मौत के उस पार
जीवन जब गतिशील हुआ था
सहयात्री बन मृत्यु चली थी
उस अतीत से उस भविष्य तक
भादों निशा सदृश बदली थी
कुछ जुगुनू जरूर चमके थे
उस अतीत की परछाईं में
फिर भविष्य की मृगमरीचिका
खींच लिया गहरी खाईं में
यक्ष प्रश्न था उस भविष्य का
जहाँ अभेद्य मृत्यु प्राचीरें
अविश्वास की चंचल लहरें
स्वप्नों में स्वप्नों को चीरें
तब क्या जीवन रुक जायेगा
टकराकर उस मृत्युपाश से
सिन्धु सितारे चंदा सूरज
मिट जायेंगे मृत्यु प्यास से
वर्तमान ही था अतीत में
तब भी जीवन में मैं ही था
अब भी जीवन में मैं ही हूँ
फिर किससे मन आशंकित था
जब जब मैं भविष्य में आया
मृत्युपाश सब बिखर गये थे
पतझर और बहार दोनों के
चेहरे जादा निखर गये थे
जीवन का यह वृक्ष अक्षयवट
विद्यमान है अगर आज भी
झड़ते पत्ते देख रहा हूँ
नवल कोपलों के निनाद भी
अब मुझको विश्वास हो गया
वर्तमान में जिंदा ही हूँ
भय भविष्य की व्यर्थ देशना
मैं उन्मुक्त परिंदा ही हूँ
पत्ते टूटेंगे पतझर में
फिर बहार वापस आयेगी
वृन्त वृन्त फिर मुस्कायेंगे
जीवन गीत सदी गायेगी
Kuber Mishra