शुष्क सी है जिंदगी यहां
चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं
आओ साथ इन्हें भी जीना सिखाएं।
सुना है बहुत बेरूख़ी से यहाँ जीते हैं लोग
आओ थोड़ी तबीयत इनकी रंगीन बनाएं।
सड़क के गलीचे सब ओर बिछे है
मिट्टी की चादर आओ मिलकर फैलाएं।
चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।
चलते दिखते हैं अक्सर कुछ जिस्म यहाँ
चाहतें बहुत है पर फिर भी है तन्हा
आओ यह अकेलापन उनका मिटाएं।
चलो इश्क का दीदार उनको कराएं।
चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं
हर शख्स मालिक है खुद का ही यहां
पर भरता रहता है क्यों किराया यहां।
न जाने क्यों आँखों में एक तिश्नगी है
कि ताबूत में बंद हर एक जिंदगी है।
चलो आज उनकों आजाद कराएं
कि उनकी जिंदगी से उनको मिलाएं।
चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।
लटके हुए कुछ चाँद तारें यहां हैं
पर वे भी है अकेले न जाने कहाँ है
हर बंद कमरें में एक दास्तां छिपी है
कि हँसता है हर कोई फिर भी दुखी है।
चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।
न जाने यह वक्त क्यों बदल रहा है
वो रूकता नहीं क्यों हर वक्त चल रहा है
बांध दो तुम समय को जरा घड़ी को छिपाओ
छेड़ो न साज न गम को गुनगुनाना
न जख्मों को तुम अब मरहम लगाना
आओ जमाने को खुशियां बांट आएं।
चलो पत्थर के जंगल में एक फूल उगाएं।
दिव्या राकेश शर्मा।