जब भी दिखता दर्द मेरे मौला
सूरत तेरी नजर आई मेरे मौला।
हर तरफ हैं बस धोखे दिखते
कैसी आग लगाई मेरे मौला।
हर शख्स सितमगर बन बैठा है
कैसी दुनिया बनाई मेरे मौला।
जान की कोई कीमत न है
टूकडों पर है लुटाई मेरे मौला
इश्क की बातें बीत चुकी है
रुत ये कैसी आई मेरे मौला।
रूह से बज्म लिख रहा हूँ
लहू से स्याही बनाई मेरे मौला।
खुद की इबादत करता इंसा
कहाँ है तेरी खुदाई मेरे मौला।
रिश्ते तो अब छूट गए है
कैसी दौलत कमाई मेरे मौला।
हर एक शख्स यहां तन्हा देखों
कैसी इमारत सजाई मेरे मौला।
दिव्या राकेश शर्मा।