'नए दरबारी'
-मनोहर चमोली ‘मनु’
‘‘मैं खुद खजांची और महामंत्री खोजूँगा।’’ राजा ने तय कर लिया था। दरबार में कई खचांजी और महामंत्री बदले जा चुके थे। वे अक्सर बेईमानी कर बैठते और दरबार से निकाल दिए जाते। राजा वेश बदलकर राज्य में घूमने लगा। यहाँ-वहाँ बैठता। आम जनता में घुलता-मिलता। उसे कदम-कदम पर कपटी, धूर्त, मक्कार और बेईमान मिलते। भले लोग भी मिलते। बस अभी तक दो ईमानदार व्यक्ति नहीं मिले।
एक तिराहे पर हाट लगी थी। दुकानें सजी थीं। कोने में दरी बिछाकर एक आदमी मूँगफली बेच रहा था। तभी एक कुम्हार आया। बोला,‘‘ मियाँ जी,मेरे तो सारे घड़े बिक चुके हैं। आठ आने की मूंगफली देना।’’ मूँगफली लेकर वह चला गया। अचानक वह फिर पलटा और मूंगफली वाले के पास आ पहुँचा। बोला,‘‘मियाँ जी। आठ आने की मूंगफली दी और उसके साथ एक रुपया भी दे दिया! ये लो पकड़ो।’’
मूंगफली वाला बोला,‘‘शुक्रिया। वैसे तुम चाहते तो इसे लौटाते भी नहीं। फिर क्यों लौटाया?’’
‘‘अगर ऐसे ही तुम्हारे रुपए मूंगफली के साथ जाते रहे तो घर क्या ले जाओगे? खाली बोरा।’’
‘‘ये लो, थोड़ी-सी मूंगफली और ले जाओ।’’
‘‘क्यों भाई? ये तो गलत होगा।’’
‘‘तो फिर ये एक रुपया भी मेरा नहीं है।’’
‘‘कमाल है ! इस काग़ज़ी लिफाफे में से निकला है।’’
‘‘मैं तो काग़ज के लिफाफे का वजन करना भूल गया था। लिफाफे के वजन के बराबर मूंगफली ही तो दे रहा हूँ। लो।’’
दोनों की बातें सुनकर राजा मुस्कराया। उसे नया खजांची और महामंत्री जो मिल गया था।
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