#moral story- *जीवन की पाठशाला*
ये आज के वर्तमान दौर की कहानी है।जिसमें महानगर में एक आम मध्यम वर्गीय परिवार में, माता-पिता के साथ, उनकी लाडली बेटी पीहू रहती थी। दोनों ही बेटी को बहुत प्यार करते थे, पिता तो अपनी बेटी पर जान छिड़कते थे। बेटी की खुशी के साथ, सुरक्षा के लिए हरदम चिन्तित रहते, इसलिए बेटी की सारी जरूरतें, घर पर ही पूरे करने की यथासंभव कोशिश करते। बेटी केवल पढ़ने बाहर जाती, घर से स्कूल और स्कूल से घर, बस यही उसकी दिनचर्या थी। इसी प्रकार बेटी अपने माता- पिता के लाड- प्यार और संस्कारों के साथ बड़ी हो रही थी।उम्र के साथ साथ,उसकी इच्छाएं और जरूरतें भी बढ़ने लगी थी। अपने फ्रेंड्स को बाहर घूमने जाते और इंजॉय करते देखकर, उसका भी मन जाने का करता ,पर पिता जाने से मना कर देते।पत्नि भी उन्हें समझाने की कोशिश करती, तो वे उन्हें भी चुप करा देते।
एक दिन पिता,तबीयत खराब होने के कारण काम से, जल्दी घर आ गए। घर में बेटी को न पाकर उन्होंने पत्नी से पूछा
"पीहू कहां है?"
" बाहर गई है, फ्रेंड्स के साथ मूवी देखने "
"क्या ?.मूवी देखने, किसकी इजाजत से?"- वे गुस्से से बोले ।
"मैंने "-पत्नी ने डरते हुए कहा
" यह तुमने ठीक नहीं किया, जमाना कितना खराब है। आए दिन अखबार, टीवी न्यूज़ में रोज ऐसी खबरें नहीं देखती ?"
" देखिए आप चिंता न करें"
"इतनी तेज धूप में, सड़क पर बस के इंतजार , फिर धक्का- मुक्की, मनचलों की गंदी नजरें, कितना सहना पडेगा, मुझे बताती तो मैं कार में आराम से ले जाता"- वे विचलित होकर बोले।
"देखिए! आप ऐसे कब तक, उसकी सुरक्षा करते रहेंगे, कभी न कभी तो उसे, अपनी चुनौतियों का स्वयं सामना करना पड़ेगा, और यही तो शुरुआत है, छोटी-छोटी परेशानियों से सीख कर, अपने जीवन में बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में, आने वाली बड़ी चुनौतियां से लड़कर जीतने का, *जिंदगी के सबक को सीखने के लिए, किताबी ज्ञान के साथ साथ, **निजी***अनुभव होना भी बहुत जरूरी है* "- पत्नि ने समझाया।
"हां शायद तुम ठीक ही कह रही हो?- कहते हुए वे निश्चिंत हो गए।
अर्चना राय, भेडाघाट, जबलपुर (म. प्र. )