#मात्रुभारती मोरल कहानी प्रतिस्पर्धा
गुमराह
" तंग आ चुका हूँ ! इन रोज -रोज की परेशानियों से! आज बच्चों की फीस भरनी है!तो कल किटी के पैसे देने हैं ! आज सन्डे है ,तो रेस्टोरेन्ट में खाने के लिए चलना है।कहाँ से लाऊँ इतना पैसा ?इस तीस हजार रूपओं की सैलरी से होता ही क्या है? ऐसी जिंदगी से तो मर जाना ही बेहतर है। ना रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी।वैसे भी जियो या मरो किसी को क्या फर्क पड़ता है ।सभी पैसे के मीत हैं इस दुनियाँ में।
हे भगवान तूने मुझे दिया ही क्या है ? ये स्कूटर , एक मामूली सी नौकरी और छोटा सा फ्लैट । कल फ्लैट की किस्त भरनी है ,और सारा पैसा बीबी- बच्चों को पचमढ़ी ट्रिप घुमाने में खर्च कर चुका हूँ ।किसी से उधार भी नहीं ले सकता! पहले का ही थोड़ा- थोड़ा कर्ज बांकि है।कल के कल पैसे ना भरे तो बैंक वाले घर पर ही आकर बैठ जाऐंगे ।सारी सोसायटी वालों को पता चल जाएगा । कितनी बेजज्ति होगी। हे भगवान अब तो खुदकुशी के अलावा दूसरा कोई रास्ता नजर ही नहीं आ रहा है ।"
मन ही मन अंतर्द्वंद करते हुए रमेश ने यकायक स्कूटर नदी किनारे ऊँची चट्टान पर रोक दिया और गहरी सोच में नदी को निहारने लगा । तभी किसी ने काँधे पर हाँथ रख कर उसकी तंद्रा भंग कर दी।
"बाबूजी मैं यहीं पास में वहाँ उस झोपड़ी में रहता हूँ। यहाँ सूखी लकड़ियाँ बीनने आया था। मैंने लकड़ियों का गट्ठा तो जैसे- तैसे बना लिया है, पर एक हाँथ से अपाहिज होने के कारण भारी गट्ठा सर पर नहीं रख पा रहा हूँ ।आप मेरे सर पर रखवा देंगे ,तो बड़ी महरवानी होगी।" एक हाँथ से अपाहिज गरीब मजदूर ने रमेश से प्रार्थना भरे स्वर में कहा।
"हाँ हाँ क्यों नहीं ! वैसे क्या घर में कोई और नहीं है जो ये सब काम कर सके । "
"अभी एक महीने पहले ही मेरी पत्नी की बीमारी के कारण मौत हो गई। झोपड़ी में तीन छोटी -छोटी बिन माँ की बच्चियाँ अकेली भूँखी हैं। उनके लिए खाना भी बनाना है। आज बहुत देर हो गई ।" गरीब मजदूर ने बड़ी ही जिम्मेदारी जताते हुए कहा।
रमेश ने जल्दी से स्कूटर स्टार्ट किया और घर की ओर चल दिया।
मौलिक एवं स्वरचित
सीमा शिवहरे 'सुमन
भोपाल।