कलम से आज गीतों का काफिया तोड़ दिया मेरा इश्क यह किस मुकाम पर आया है उठ ! अपनी गागर से पानी की कटोरी दे दे मैं राह के हादसे, अपने बदन से धो लूंगी.....यह राह के हादसे, आकाशगंगा का पानी ही धो सकता है.एक दर्द ने मन की धरती की जरखेज किया था.और एक दीवानगी उसका बीज बन गई, मन की हरियाली बन गई..वह मोहब्बत के रेगिस्तान से भी गुजरी है और समाज और महजब के रेगिस्तान से भी..वक्त वक्त पर उनको कई फतवे मिलते रहे..और वह लिखती रही..बादलों के महल में मेरा सूरज सो रहा --जहाँ कोई दरवाजा नही, कोई खिड़की नहीकोई सीढ़ी नही --और सदियों के हाथों ने जो पगडण्डी बनायी हैवह मेरे चिंतन के लिए बहुत संकरी है
मातृभारती पर इस कहानी 'आधी नज्म का पूरा गीत - 21' पढ़ें
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