जो दहेज मांगते हैं, उन्हें दहेज दीजिए... बेटी नहीं!
अक्सर लोग कहते हैं कि अच्छा घर-परिवार देखकर बेटी की शादी कर देनी चाहिए। लेकिन क्या कभी हमने गौर किया है कि जो लोग शादी के मंडप में बेटी की नहीं, बल्कि अपनी 'कीमत' और 'दहेज' की बात करते हैं, वे क्या वाकई एक 'अच्छा परिवार' हो सकते हैं?
समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी दहेज को अपना अधिकार समझता है। उन लोगों को मेरा सीधा संदेश है— "यदि आप दहेज मांगते हैं, तो कृपया दहेज ही स्वीकार करें, बेटी की मांग न करें।" क्योंकि जिस बेटी को आपने पैसों से तौल दिया, उस बेटी का मोल आप कभी नहीं समझ पाएंगे।
सच तो यह है कि बेटी की कोई कीमत नहीं होती। वह अनमोल है, लेकिन जो लोग उसकी कीमत लगाने की हिम्मत करते हैं, वास्तव में उनमें उस बेटी की गरिमा को संभालने की 'हैसियत' ही नहीं होती।
कई बार माता-पिता सिर्फ 'स्टेटस' और 'दिखावे' के चक्कर में अपनी बेटी को दहेज लोभियों के हवाले कर देते हैं। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि जिन्होंने पहले ही दिन पैसों से आपकी और आपकी बेटी की 'औकात' तय कर दी है, वे उम्र भर आपकी बेटी को सम्मान क्या खाक देंगे?
दहेज सिर्फ एक मांग नहीं, बल्कि यह आपकी बेटी के आत्म-सम्मान पर लगा पहला प्रहार है। जो इंसान अपनी बहू को लाने के लिए बोली लगाता है, वह उसे कभी 'बहू' का दर्जा नहीं दे सकता, वह उसे सिर्फ एक 'सामान' की तरह ही समझेगा।
वक्त आ गया है कि हम 'अच्छा रिश्ता' ढूंढना बंद करें और 'अच्छे इंसान' को पहचानना शुरू करें। याद रखिए, जिस घर में बेटी की कीमत नहीं, वहाँ बेटी का भविष्य कभी सुरक्षित नहीं हो सकता।
दहेज बंद करें, बेटी बचाएं।
"जो पैसों से रिश्ता जोड़ते हैं, वो बेटी की कद्र क्या जानेंगे?"
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