Hindi Quote in News by Sonu Kumar

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पटाखे जलाना हमारी संस्कृति से जुड़ा है किन्तु पर्यावरण की खातिर क्या आप इनका बहिष्कार करेंगे?
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कृपया कोई ज्यादा बेहतर कारण ढूंढ कर लाइए। क्योंकि दीवाली की आतिशबाजी का पर्यावरण से कोई लेना देना नहीं है। निचे मैंने इससे सम्बंधित कुछ बिंदु दिए है :
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खंड - अ
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(1) आतिशबाजी से हुआ प्रदुषण सिर्फ 3 घंटे के अंदर वातावरण से पूरी तरह गायब हो जाता है !!! ऐसा दिल्ली के रोहिणी स्टेशन पर लगे प्रदूषण मापक सिस्टम के आंकड़ों से सिद्ध होता है। 2013 में आई आई टी कानपुर ने यह अध्ययन किया था !! उन्होंने कई सेम्पल इकट्ठे करके यह जांचा और पाया कि दिवाली के दिन सुबह 4 बजे तक PM2.5 का स्तर फिर से 300 से 375 micrograms तक आ जाता है, जो कि दिल्ली के नियमित दिनों के लिए प्रदुषण का औसत स्तर है। लिंक देखें -
Firecrackers ban in Delhi-NCR: Not just Diwali, what’s SC plan for other periods?
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(2) 2003 में दिल्ली नगर निगम एवं स्वास्थ्य मंत्रालय नागरिको को आतिशबाजी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था !!!
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वजह ?
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उन्होंने पाया कि घनघोर आतिशबाजी डेंगू के मच्छरों का नाश कर देती है। और इस लिहाज से आतिशबाजी जरुरी है। आतिशबाजी का धुंवा वातावरण की नमी सोख लेता है और धुंवे के कारण मच्छरों की एक बड़ी आबादी नष्ट हो जाती है। नतीजा : इससे नए मच्छरों के पनपने के अवसर भी कम हो जाते है !! पेड द हिन्दू का लिंक देखें -
Say yes to fire-crackers to control dengue
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2006 में पेड टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने विभिन्न स्वास्थ्य विशेषज्ञों के हवाले से रिपोर्ट किया कि दिवाली की आतिशबाजी मच्छरों से निपटने के लिए प्रभावी उपाय है। पेड टाइम्स ऑफ़ इण्डिया का लिंक -
Cracker cure | Delhi News - Times of India
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उल्लेखनीय है कि पटाखों से जो धुंआ और गर्मी पैदा होती है वह मच्छरों के लिए तो हानिकारक है लेकिन इंसान के लिए नहीं। क्योंकि आतिशबाजी का धुंआ वातावरण में सिर्फ 3 घंटे ही टिका रह सकता है। सांय 6 बजे से आतिशबाजी शुरू होती है और 11 बजे तक यह बड़े पैमाने पर चलती रहती है। इन पांच घंटो में मच्छर मर जाते है और 2 बजे तक प्रदूषण का स्तर फिर से वही हो जाता है जैसा कि आतिशबाजी से पहले था !!!
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दुसरे शब्दों में, दिल्ली में पिछले 15 सालो से जो आतिशबाजी के खिलाफ प्रचार चलाया जा रहा है, उसकी वजह से डेंगू एवं अन्य मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया लगता है। और अगर ऐसा है तो मेरे विचार में इन अतिरिक्त मौतों के लिए जिम्मेदार वे लोग है जो मिशनरीज द्वारा नियंत्रित पेड मीडिया की चपेट में आकर दिवाली की आतिशबाजी के खिलाफ प्रचार अभियान चला रहे है !!!
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बहरहाल, हमें किसी विश्वनीय संस्था द्वारा इस बारे में व्यवस्थित तकनिकी अध्ययन करवाए जाने की जरूरत है, ताकि यह बात एकदम साफ़ तौर पर और भी निर्विवाद रूप से निकलकर स्थापित हो सके कि दिवाली की आतिशबाजी मच्छरो की बड़ी आबादी को नष्ट कर देती है। और इसके लिए यह आवश्यक है कि दीवाली के इन 6 घंटो के दौरान एकदम भयंकर वाली आतिशबाजी की जाए।
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यदि मच्छरों पर दिवाली की आतिशबाजी का प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट हो जाता है तो सरकार को देश व्यापी प्रचार अभियान चलाना चाहिए जिससे नागरिक दिवाली पर आतिशबाजी करने को प्रोत्साहित हो !!
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(3) दिवाली पर प्रदूषण बढ़ जाता है क्योंकि ज्यादातर लोग खरीददारी करने के लिए वाहन लेकर निकलते है। माल की खपत ज्यादा होने से ट्रको का परिवहन भी बढ़ता है और और इस वजह से भी प्रदुषण बढ़ जाता है। दूसरे शब्दों में , दिवाली पर प्रदुषण बढ़ने की एक बड़ी वजह ट्रेफिक का बढ़ना भी है, न की आतिशबाजी।
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(4) इसी समय किसान अपनी पराली भी जलाते है और फूस जलाने से भी प्रदुषण बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए पिछले साल दिवाली के अगले दिन सुबह 5 बजे दिल्ली और लाहौर में प्रदुषण का स्तर एक समान था !!! क्यों ? क्योंकि दोनों इलाको में किसान फूस जला रहे थे। और फूस जलाने से भी प्रदुषण होता है !
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खंड - ब
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उत्सवों में भागीदारी कम होने से धार्मिक जमाव टूटेगा और हिन्दू धर्म के विघटन में तेजी आएगी।
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हिन्दू धर्म का प्रशासन बेहद कमजोर है और इसे दुरुस्त नहीं किया गया तो अगले 50 वर्षो में इसके अनुयायियों की संख्या लगभग आधी रह जायेगी। यह शान्ति काल की स्थिति है। यदि इस दौरान भारत को युद्ध का सामना करना पड़ जाता है तो अगले 50 वर्षो में हिन्दू धर्म पूरी तरह से लुप्त होने की कगार पर जा सकता है।

ईसाई धर्म लगातार विस्तार कर रहा है , क्योंकि उनके पास जूरी सिस्टम है।
इस्लाम ने भी लगातार विस्तार किया है क्योंकि उनके पास हर सप्ताह एकत्र होने की प्रक्रिया है।
सिक्ख धर्म अब तक टिका हुआ है क्योंकि उनके पास गुरुद्वारा प्रमुख को चुनने की प्रक्रिया है। ( हालांकि अब यह कमजोर हो रहा है )

हिन्दू धर्म के प्रशासन में इनमे से कुछ भी नहीं है, और न ही ऐसी कोई प्रक्रिया है जो इनकी कमी को पूरा करे। इसीलिए वह लगातार जमीन एवं अनुयायी खो रहा है। लेकिन फिर भी इसके विघटन की दर धीमी है। आखिर , हिन्दू धर्म का क्षरण उतनी तेजी से क्यों नहीं हो रहा है, जितनी तेजी से होना चाहिये ?
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मेरे विचार में इसकी 2 बड़ी वजहें है :

हिन्दू धर्म को अब तक किसी ताकतवर प्रतिस्पर्धी का सामना नहीं करना पड़ा और इस वजह से विघटन की दर धीमी रही। किन्तु अब एफडीआई के माध्यम से मिशनरीज की घुसपेठ भारत में तेजी से बढ़ रही है।
उत्सवो पर धार्मिक जमाव। किन्तु अब इसे तोड़ने के निरंतर प्रयास किये जा रहे।
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हिन्दू धर्म में साल भर बेतहाशा त्यौहार आते है और इनमें से ज्यादातर त्योहारों में अध्यात्म / भक्ति के साथ साथ मनोरंजन का तत्व भी शामिल है। मनोरंजन का तत्व होने से सभी तबके के सभी आयु वर्ग के लोग इन उत्सवो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है। इस कवायद से उत्सवो पर भारी संख्या में धार्मिक जमाव देखने को मिलता है और धर्म के प्रति जुड़ाव बना रहता है।
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उदाहरण के लिए , दिवाली पर आतिशबाजी, मिठाई और नए कपडे का चलन बच्चो एवं युवाओ को आकर्षित करता है, जबकि गृहणियां साफ़ सफाई रंग रोगन में व्यस्त हो जाती है। बुजुर्गो एवं वरिष्ठ जनों के लिए इसमें लक्ष्मी पूजा। फिर धनिकों के लिए जुआ भी है। सामुदायिकता बढ़ाने के लिए अगले दिन "राम राम"। कुल मिलाकर दिवाली सभी आयु वर्ग के लोगो को खींच लेती है, और लोग इसमें उत्साह के साथ भाग लेते है। किन्तु यहाँ मनोरंजन और रोमांच का मुख्य तत्व आतिशबाजी है जो दीवाली को हिट बनाता है। इसमें सामूहिक गतिविधि है।
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इसी तरह होली पर सिर्फ होलिका दहन उत्साह बनाये नहीं रख सकता। रंग, गुलाल खेलना और ढपली पर फाग गाना वह तत्त्व है जो लोगो की भागीदारी बढाता है। फिर जन्माष्टमी पर मनोरंजन के लिए दही हांड़ी प्रतियोगिता एवं झांकियां है। दुर्गा पूजा एवं गणपति स्थापना पर 9 दिनों तक नाच-गान। और पूजा तो खैर है ही। तो हिन्दू धर्म के ज्यादातर उत्सवो में मनोरंजन के तत्व डाले गए है, ताकि इनमे नागरिको का उत्साह बना रहे। विभिन्न उत्सवो जैसे दुर्गा पूजा / महाशिवरात्रि / कुम्भ आदि पर मेले इस धार्मिक जमाव में और भी वृद्धि कर देते है।
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तो यदि प्रतिस्पर्धी धर्म भारत में हिन्दू धर्म को और भी कमजोर करना चाहते है तो उन्हें हिन्दू धर्म के त्योहारों पर होने वाले धार्मिक जमाव को तोड़ना होगा। वे ऐसा कैसे कर रहे है ?
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प्रदुषण का हवाला देकर वे आतिशबाजी का विरोध करते है और अन्य लोगो को भी दिवाली पर आतिशबाजी का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित करते है !! इससे सामूहिकता घटती है, और रोमांच चला जाता है।
अगले दौर में वे यह तर्क लेकर आयेंगे कि, देश में बिजली की कमी है और कई गरीब लोगो तक बिजली नहीं पहुँच रही है , किन्तु दिवाली पर हम महज सजावट के लिए इतनी बिजली बर्बाद कर दे रहे है, अत: हमें सोच समझकर बिजली खर्च करनी चाहिए !!
फिर वे इस तरह का अभियान लायेंगे कि दिवाली पर दीपक जलाने से तेल की घी-तेल की हानि हो रही है। ज्यादा से ज्यादा एक-दो दीपक जलाए और बाकी तेल-घी किसी गरीब को दान कर दें !!!
फिर वे होली पर आयेंगे और होली को पानी की बर्बादी से जोड़ देंगे। लोगो को समझायेंगे कि होली खेलने में करोडो गेलन पानी व्यर्थ हो रहा है और इस बर्बादी के कारण लोग प्यासे मर रहे है !!!
जन्माष्टमी पर वे दही हांडी की उंचाई घटाने की मुहीम छेड़ देंगे। वे लोगो को समझाएंगे कि जन्माष्टमी पर चुपचाप घर पर पंजरी बना कर खा ले। दही हांडी जैसे उत्सवो में हिस्सा न ले। क्योंकि इससे चोट आती है। हांडी की उंचाई घटने से रोमांच चला जाता है, और धार्मिक जमाव टूटता है।
गरबा पर वे आपको बताएँगे कि इससे किस प्रकार का जानलेवा ध्वनी प्रदुषण होता है। यदि फिर भी लोग इकट्ठे होने से न माने तो उन्हें साइलेंट गरबा करने की सलाह देंगे। साइलेंट गरबा में प्रत्येक खिलाडी कान में हेडफोन से गाना सुनता रहता है और नाचता रहता है। इस तरह पंडाल पूरी तरह से साइलेंट रहता है। उत्सवों के लिहाज से यह सन्नाटा है, लेकिन पेड मीडिया की अफीम चाटने वाले इसे शांति बताते है।
शिवरात्रि आने पर वे आपको कहेंगे की शिवलिंग पर दूध चढाने की जगह यह दूध किसी बच्चे को पिला दो। इससे व्यक्ति के पास शिवरात्रि पर मंदिर जाने की वजह खत्म हो जायेगी और धार्मिक जमाव एवं मेला टूटेगा।
अंतिम संस्कार का वे यह कह कर विरोध करेंगे कि इससे लकड़ी की हानि और प्रदुषण हो रहा है !! अत: शव को बिजली से जला दो।
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ये छोटे में लिखा है। उनके दिमाग काफी उर्वर है। वे सभी त्योहारों में ऐसे ढेर सारे बिंदु खोजकर ला सकते है, जिससे उत्सवो को सुट्ट किया जा सके। यहां तक कि वे करणी माता मंदिर ( चूहों वाली माता ) में प्रसाद, नारियल, ध्वजा, धूपबत्ती आदि चढाने पर भी रोक लगा चुके है। वजह - इससे मंदिर में प्रदुषण होता है !!
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साइलेंट गरबा, आतिशबाजी मुक्त दिवाली, जल विहीन होली, दही हांडी मुक्त जन्माष्टमी के बाद अब उन्होंने एक नयी चीज पेश की है - रावण बर्निंग विद कोल्ड फायर !!
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रावण दहन के कारण होने वाले धूम्र प्रदुषण से बचने के लिए पिछले वर्ष उदयपुर नगर निगम ने दशहरे पर धुआं मुक्त आतिशबाजी करने का फैसला किया !! उम्मीद है कि जल्दी ही हमें साइलेंट आतिशबाजी ( विशेष तौर पर दशहरे और दिवाली पर ) भी देखने को मिलेगी !!!
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किन्तु , यदि आप हिन्दू धर्म की परम्पराओं में मानते है और इन्हें जारी रखना चाहते है तो दिवाली पर आतिशबाजी करें , होली पर रंग खेले, शिवरात्रि पर मेले में भाग ले , साइलेंट गरबा का विरोध करे और उन लोगो का भी विरोध करे जो "पर्यावरण के नाम पर" हिन्दू त्योहारों की परम्पराओं पर रोक लगाना चाहते है। यह हर तरीके से साबित है कि दिवाली पर आतिशबाजी का प्रदुषण से कोई लेना देना नहीं है। आतशबाजी से सिर्फ एक दिन प्रदुषण होता है और उस एक दिन भी आतिशबाजी का प्रदुषण में हिस्सा सिर्फ 6% है !!! और यह प्रदुषण में अगले 8 घंटे में वातावरण से पूरी तरह से तिरोहित हो जाता है।
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कुल मिलाकर सयानो की बातों में न आये और दिवाली पर खुद भी आतिशबाजी करें, और दुसरो को भी प्रेरित करे। लेकिन आतिशबाजी करते समय अपनी सुरक्षा का ध्यान रखे। सूती कपडे पहने और यदि उपलब्ध हो तो प्लेन ग्लास का चश्मा लगा ले। अनार, फुलझड़ी , चकरी आदि सुरक्षित पटाके चलाये और मिर्ची बम, रोकेट आदि पटाको की अवहेलना करे। तथा बच्चो को अपने पर्यवेक्षण में आतिशबाजी करवाएं।
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बहरहाल , जब से पेड मीडिया ने दिवाली की आतिशबाजी को प्रदुषण से कनेक्ट करने में पैसा फूंकना शुरू किया है, तब से मैंने भी आतिशबाजी का अपना बजट बढ़ा दिया है। मैं आतिशबाजी भी करता हूँ, और इसका चित्र सोशल मीडिया पर पोस्ट भी करता हूँ। कृपया आप भी दीवाली की आतिशबाजी के चित्र सोशल मीडिया पर पोस्ट करके इसे प्रदर्शित करें ताकि ताकि अन्य नागरिक भी आतिशबाजी करने के लिए प्रेरित हो।
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आतिशबाजी युक्त दिवाली की शुभकामनाएं।
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खंड - स
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संघ=बीजेपी के मंत्रियों का आतिशबाजी पर स्टेंड :
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संघ के नेता और मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने पिछले साल 3 हिन्दू उत्सव-विरोधी ट्वीट किये थे, जिन्हें अब उन्होंने डिलीट कर दिया है !!! एक कार्यकर्ता ने इन ट्वीट्स को सेव कर लिया था। डिलीट किये गए ट्वीट के लिंक और विवरण :
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(1)
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Welcome decision by the SC on ban of fire crackers sales in NCR. Comes as a huge support for my #GreenDiwali initiative for our environment
बहुत ख़ुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर में दीवाली पर आतिशबाजी बेचने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इस फैसले से मेरे #GreenDiwali मिशन को भारी समर्थन मिलेगा !!

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And of course, we must spare a thought for poor birds and animals who spend a terrible evening scared by all the fire & noise #GreenDiwali "
और हाँ, हमें उन निरीह पक्षियों एवं जानवरो की फ़िक्र भी करनी चाहिए जो आग और धुएं के कारण दिवाली की शाम काफी सदमे में बिताते है, #GreenDiwali !

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Instead of spending thousands on crackers, lets buy food & sweets and share it with poor/underprivileged, make it an awesome #GreenDiwali "
आतिशबाजी पर हजारो रूपये फूंकने की जगह हमें उन पैसो से मिठाइयाँ व भोजन खरीद कर गरीबों में बाँट देनी चाहिए। तभी सच्चे अर्थो में दिवाली होगी, #GreenDiwali !

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ये तीनो ट्वीट अब गायब है !!
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शर्म की बात है कि एक मंत्री ट्वीट करता है और फिर उन्हें डिलीट कर देता है !! यहाँ तक कि मेरे जैसे छोटे और पार्ट टाइम एक्टिविस्ट को भी इतना शउर है कि - यदि मैंने सार्वजनिक रूप से कुछ गलत लिखा है तो, या तो मुझे इसके लिए खेद प्रकट करना चाहिए या फिर इसे सम्पादित करके ठीक करना चाहिए। किन्तु रिकॉर्ड को मिटा देना किसी भी तरीके से ईमानदार व्यवहार नहीं है।
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दरअसल डॉक्टर हर्षवर्धन को आतिशबाजी से कोई समस्या नहीं है। लेकिन उन्हें दिवाली पर की जाने वाली आतिशबाजी से ख़ास एलर्जी है। डॉक्टर साहेब दिवाली पर आतिशबाजी न करने की मुहीम चलाते है, लेकिन बीजेपी के चुनाव जीतने पर यही हर्षवर्धन कार्यकर्ताओ से कहते है कि — आतिशबाजी करो !!
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(i) यहाँ आप देख सकते है कि हर्षवर्धन ने दीपावली पर आतिशबाजी न करने की अपील की - Health minister Harsh Vardhan advocates for a silent Diwali in Capital
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(ii) हर्षवर्धन यह समझाते हुए कि किस तरह सिर्फ दीपावली पर आतिशबाजी करने से स्वास्थ्य को नुक्सान होता है : Union Health Minister on dangers of Diwali Cracker
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(iii) और चुनाव जीतने पर यही हर्षवर्धन खुद खड़े होकर आतिशबाजी करवा रहे है - Celebrations on Narendra Modi arrival, Harshvardhan dances - Live Video
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Hindi News by Sonu Kumar : 112022433
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