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क्या भारत में सैन्य विद्रोह द्वारा तख्तापलट हो सकता है ? बिलकुल हो सकता है। पुलिस के अलावा भारत के किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संगठन के पास या नागरिको के पास सेना को रोकने के लिए हथियार नहीं है !! वास्तविक अर्थो में भारत में सबसे ताकतवर संस्था सेना है। सेना के पास हथियार है, हथियार चलाने का प्रशिक्षण है, आदेशो का पालन करवाने और आदेश देने के लिए पद सोपान प्रक्रिया है और वांछित अनुशासन है। दुसरे नंबर पर सबसे शक्तिशाली संस्था पुलिस है। किन्तु भारत की पुलिस के पास सेना की तुलना में नगण्य हथियार है, अतः यदि सेना टेक ओवर करती है, और पुलिस सेना का विरोध करती है तो पुलिस सेना के सामने कुछ घंटें भी नहीं टिकेगी। भारत की सेना जनरल के कंट्रोल में है, और जनरल पीएम से आदेश लेता है। यदि सेना के कनिष्ठ अधिकारी यह मानने लगते है कि भारत का प्रधानमन्त्री भ्रष्ट या निकम्मा है और देश को गड्ढे में धकेल रहा है. या फिर उन्हें यह लगने लगता है कि पीएम को हटा दिया जाना चाहिए, और यदि ऐसे में जनरल अपने कुछ बरिष्ठ अधिकारियो के साथ मिलकर तख्ता पलट की योजना बनाता है तो जनरल भारत में तख्ता पलट करने में सफल हो सकता है। या मान लो कि जनरल का मूड बन जाता है और यदि जनरल अपने अधीनस्थ अधिकारियो के साथ तख्ता पलट की कोशिश करता है तो उसे रोकने वाला कोई नहीं है है !! ऐसी स्थिति में सेना को सिर्फ भारत के नागरिक ही रोक सकते है, किन्तु भारत के नागरिक हथियार विहीन है, अतः यदि भारत की सेना विद्रोह कर देती है, तो भारत के नागरिको को फौजी शासन स्वीकार करना होगा। यदि नागरिक सेना के खिलाफ छुट पुट प्रदर्शन करते है तो सेना फायरिंग खोल कर उन्हें आसानी से दबा सकती है। 100-200 नागरिको के गोलियां लगने के बाद नागरिक समझ लेंगे कि प्रदर्शन करने से कोई फायदा नहीं है। और तब सेना खुद को राष्ट्रवादी और प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र विरोधी बता कर मामला रफा दफा कर सकता है। भारत में निरंतर चुनाव होने, जनता का लोकतंत्र में विश्वास होने और सैनिको का सरकार पर भरोसा होने के कारण अब तक कभी तख्ता पलट नहीं हुआ है। क्योंकि जनरल को यह संदेह रहता है कि तख्ता पलट में कनिष्ठ अधिकारी एवं सैनिक जनरल का साथ देंगे या नहीं। किन्तु यदि कोई विदेशी ताकत जैसे अमेरिका आदि भारत में तख्ता पलट करवाना चाहते है तो वे कुछ ही महीनो में गृह युद्ध छिडवाकर, बड़े पैमाने पर आतंकवादी हमले करवाकर, असुरक्षा का भाव उत्पन्न करके एवं राजनैतिक विकल्प हीनता दर्शा कर ऐसे हालात पैदा कर सकते है कि जनरल आसानी से तख्ता पलट कर सकेगा। जिस देश में राजनेता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको के नियंत्रण से बाहर होने लगते है और वे नेताओं को काबू नहीं कर पाते तो ऐसे हालात में विदेशी ताकतें (विशेष तौर पर अमेरिका) देश को कंट्रोल में लेने के लिए सेना का इस्तेमाल करती है। भारत में फिलहाल ऐसा कोई खतरा मौजूद नहीं है क्योंकि भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों के सभी नेता पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथो बिके हुए है अतः उन्हें अपना एजेंडा भारत में लागू करने के लिए सेना की जरूरत नहीं है। हालांकि भारत में दो बार ऐसे हालात बने थे जब सेना द्वारा तख्ता पलट की कमजोर सम्भावना होने के संकेत मिलते है। 1) जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने बड़े पैमाने पर हथियारों का उत्पादन शुरू किया, बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया, पाकिस्तान के दो टुकड़े किये और अमेरिका के आगे झुकने से इनकार कर दिया तो अमेरिका ने पहले उन्हें भ्रष्ट जजों (इलाहाबाद का हाई कोर्ट जज जगमोहन लाल सिन्हा) के माध्यम से गिराने की कोशिश की। जब इंदिरा जी ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट पर ताले लगवा दिए तो उन्होंने इंदिरा जी का तख्ता पलटने के लिए सेना को एप्रोच करना शुरू किया था। तब जेपी ने दो बार सार्वजनिक रूप से ऐसी अपील की थी कि यदि इंदिरा गांधी सेना को कोई गलत आदेश देती है तो सेना को उसका पालन करने से मना कर देना चाहिए। और जब पानी सर से ऊपर निकल गया तो इंदिरा जी ने आपातकाल लगाकर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया था। 2) जब देश मनमोहन सिंह से उकताया हुआ था तब. 2012 में जनरल वी के सिंह के कार्यकाल के दौरान हिसार में तैनात "33 आई रेजिमेंट" एवं आगरा की "50 पैरा ब्रिगेड" ने दिल्ली की और कूच किया था। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे रिपोर्ट किया था. घटना उस दिन से एक दिन पहले की है जब वी के सिंह को अपने जन्म प्रमाण पत्र से सम्बन्धित मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश होना था। सरकार को, रक्षा मंत्रालय को और गृह मंत्री को इस मोबिलाईजेशन की कोई जानकारी नहीं थी। लगभग 18 घंटे तक सरकार असमंजस में बनी रही। प्रोटोकोल के अनुसार बिना रक्षा मंत्री की अनुमति के सेना की कोई भी टुकड़ी दिल्ली की और नहीं बढ़ सकती। बाद में सेना ने स्पष्टीकरण दिया कि यह एक रूटीन एवं औचक प्रोसीजर था। सरकार ने यह बात मानी कि उन्हें नोटिफाईड नहीं किया गया था. किन्तु सरकार ने किसी भी प्रकार के कू (coup) की सम्भावना को सिरे से नकारा। https://zeenews.india.com/news/nation/army-moved-two-units-towards-delhi-report 768126.html लोकतंत्र की जननी हथियारबंद नागरिक समाज है। जिस देश के नागरिको की शक्ति उस देश की सेना से अधिक बढ़ जाती है. वहां किसी भी स्थिति में लोकतंत्र का निलम्बन नहीं किया जा सकता। भारत के नागरिक हथियार विहीन है, और यदि सेना विद्रोह कर देती है तो नागरिको के पास उन्हें रोकने के लिए चाकू और नेल क़टर ही है। ब्रिटिश ने सिर्फ । लाख बन्दुक धारियों के माध्यम से भारत के 40 करोड़ नागरिको को 200 सालो तक अपने कंट्रोल में रखा। भारत में 17 लाख की सेना है और सभी हथियारों से लेस है। तो मुकाबले की बात तो भूल ही जाइए। अतः भारत में यदि सेना तख्ता पलट नहीं कर रही है, तो यह केवल चांस की बात है। यदि सेना तख्ता पलट कर देती है तो हम नागरिक "लोकतंत्र वापिस लाओ" के नारे लगाने के सिवा कुछ नहीं कर सकते। https://www.facebook.com/share/p/1C1XiG4uRM/ #वोट_वापसी_पासबुक
#14 भारतीय राष्ट्रिय नागरिकता रजिस्टर NRCI - National Register for Citizenship of India विभिन्न सरकारी एजेंसियों के अनुसार भारत में 2 करोड़ के लगभग अवैध आर्थिक विदेशी (illegal economic imigrant) रह रहे है। असम, बंगाल, पूर्वोत्तर के अलावा ये पूरे भारत में फैले हुए है। इन अवैध विदेशियों में प्रताड़ित शरणार्थी भी है, और आर्थिक अवसरों की तलाश में आये विदेशी (illegal economic migrant) भी है। इनकी वजह से भारत के संसाधनों पर भार बढ़ रहा है, और ये हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इन अवैध विदेशी निवासीयों में से कई समूह हिंसक अपराधो एवं तस्करी आदि में भी लिप्त है। यदि पाकिस्तान एवं चीन इन्हें बंगलादेशी सीमा के माध्यम से हथियार भेजना शुरु कर देते है तो ये अवैध विदेशी निवासी भारत में एक हिंसक गृह युद्ध शुरू कर सकते है। गृह मंत्री श्री अमित शाह ने सन 2019 में संसद में भरोसा दिलाया था कि जल्दी ही वे देश व्यापी NRC का ड्राफ्ट लायेंगे। किन्तु सरकार ने अभी तक NRC का ड्राफ्ट तक सामने नहीं रखा है। असम में NRC का जो ड्राफ्ट लागू किया गया था, उसमें गंभीर विसंगितियों एवं कमियां थी। उदाहरण के लिए असम का NRC न तो अवैध रूप से रह रहे आर्थिक विदेशियों को चिन्हित करता है, और न ही उन्हें डिपोर्ट करने की कोई व्यवस्था देता है। दुसरे शब्दों में, CAA एवं असम में किये गए NRC ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है, बल्कि इस तरह की प्रोपेगेंडा खड़ा कर दिया है कि इस समस्या को सुलझा लिया गया है। हमारे द्वारा प्रस्तावित NRCI में इस तरह के प्रावधान किये गए है कि यह कानून आने के 1 वर्ष के भीतर सभी अवैध आर्थिक विदेशी या तो डिपोर्ट कर दिए जायेंगे या फिर स्वयं ही अपने मुल्कों में लौट जायेंगे। प्रस्तावित NRCI क़ानून में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (National Register for Citizens of India) बनाने की प्रक्रिया दी गयी है। गेजेट में प्रकाशित होने के साथ ही नागरिकता रजिस्टर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जायेगी। इस क़ानून को मनी बिल / धन विधेयक के रूप में लोकसभा से पास करके गेजेट में छापा जा सकता है। नागरिकता रजिस्टर बनाने की पूरी प्रक्रिया देखने के लिए पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें Tinyurl.com/Nrcindia 1. यह क़ानून निम्नलिखित कार्य करेगा : a. अवैध विदेशीयों को (illegal immigrant) भारत से निष्कासित करेगा। b. प्रताड़ित शर्णार्थियो (persecuted refugee) को शरण देगा। c. नागरिकता रजिस्टर (national citizenship register) बनाएगा। 2. प्रस्तावित NRCI क़ानून के अनुसार, ऐसे विवाद की स्थिति में कि कौन अवैध आर्थिक विदेशी है और कौन प्रताड़ित शरणार्थी है, का अंतिम फैसला नागरिको की जूरी करेगी, जज नहीं। 3. प्रधानमंत्री एक राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्ट्रार (NCRO) की नियुक्ति करेंगे। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार सभी राज्यों में राज्य नागरिकता रजिस्ट्रारों एवं जिला रजिस्ट्रारो की नियुक्ति करेगा। राष्ट्रिय रजिस्ट्रार प्रधानमंत्री की अनुमति से जिला कलेक्टरों को जिला रजिस्ट्रार के रूप में नियुक्त कर सकता है, या इच्छित जिलो में अलग से जिला रजिस्ट्रारो की नियुक्ति भी कर सकता है। 4. राष्ट्रीय रजिस्ट्रार एवं उसका स्टाफ वोट वापसी पासबुक एवं जूरी मंडल के दायरे में रहेगा। ताकि यदि राष्ट्रिय रजिस्ट्रार अपना काम त्वरित एवं निष्पक्ष ढंग से नहीं कर रहा है तो नागरिक वोट वापसी पासबुक का इस्तेमाल करके उसे बदल सके। राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होग
#VoteVapsiPassBook प्रश्न : मैं राईट टू रिकॉल पार्टी से वोट वापसी पासबुक के मुद्दे पर चुनाव क्यों लड़ रहा और क्यों युवाओं को अधिक से अधिक राजनीति के क्षेत्र में जाना चाहिए? उत्तर : स्थापित राजनैतिक पार्टियाँ चाहती है कि कम से कम युवा चुनावों में हिस्सा ले। यदि ज्यादा लोग चुनावों में आयेंगे तो इनमे ईमानदार / समर्पित / काबिल लोग भी होंगे, और धीरे धीरे मतदाताओ के विकल्प बढ़ने लगेंगे। और विकल्प बढ़ने से बदतर लोगो को चुनौती मिलेगी। पूरी राजनीती कार्यकर्ताओ का टाइम पास करने और उन्हें विकल्प मुहैया नहीं कराने पर चलती है। यदि लोगो को अच्छे विकल्प मिलने लगेंगे तो धीरे धीरे वे या तो बुरे उम्मीदवारों को मैदान से बाहर कर देंगे, या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे। . इसे फिर से पढ़े : या फिर उन्हें जनहित के मुद्दों की और धकेलने में कामयाब हो जायेंगे। . कैसे ? . मान लीजिये कि, भारत में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बैंको का एनपीए, सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल की समस्या है और कोई भी पार्टी इसे मुख्य मुद्दा बनाने को तैयार नहीं है। मान लीजिये कि किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते है और इन मुद्दों को अपने घोषणापत्र में शामिल करते हुए किसी विधानसभा से 20 छोटे उम्मीदवार नामंकन दाखिल करते है। तो उस विधानसभा क्षेत्र में चुनावों के दौरान गरीबी / भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुखता से छा जाएगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार पर चुनाव प्रचार के दौरान यह दबाव बनेगा कि वह इस पर कोई स्टेंड ले। . यदि वह कोई स्टेंड नहीं लेता है तो जनता के सामने वह एक्सपोज होने लगेगा और जनता देखेगी कि बड़ी पार्टियो के उम्मीदवार इन पर बोल नहीं रहे है। इससे उस पर दबाव बनेगा और बड़ी पार्टी के उम्मीदवार को इस मुद्दे को एड्रेस करना पड़ेगा। और जैसे ही एक बड़ी पार्टी का उम्मीदवार इसे एड्रेस करता है, वैसे ही अन्य बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों को भी इसे एड्रेस करना पड़ेगा। और इस तरह यह मुद्दा उभरकर आ जाएगा। और अब इसे पेड मीडिया को भी रिपोर्ट करना पड़ेगा !! . और यदि ऐसा 50 विधानसभाओ में होता है तो ये मुद्दे पूरे राज्य में उछलकर आ जायेंगे। लेकिन यदि कोई भी उम्मीदवार इन मुद्दों को लेकर चुनाव में नहीं आएगा तो जनता के पास सिर्फ बड़ी पार्टियों के रूप में 2–3 विकल्प रहेंगे। अत: उनमे से कोई भी इन मुद्दों पर नहीं बोलेगा, और वे पब्लिक का खून गरम करने वाले भाषण देंगे, और सभी बड़ी पार्टियों के उम्मीदवार ऐसा ही करेंगे। इस तरह जब चुनाव में कम विकल्प होते है, तो जनता असहाय हो जाती है। लेकिन यदि कई छोटे छोटे कार्यकर्ता सही मुद्दों पर चुनावों में आ जाते है तो बड़ी पार्टियों को सही मुद्दों को उठाने के लिए बाध्य किया जा सकता है। . क्योंकि नेता आपकी बात सिर्फ चुनाव में ही सुनता है, इसके अलावा अगले 5 साल तक कुछ भी बोलते रहिये, वह सुनने का सिर्फ नाटक करता है, लेकिन सुनता नहीं है। लेकिन चुनावों के दौरान नेताओं के कान निकल आते है, और वे सुनना शुरू करते है। तो यदि आप नेता की तवज्जो चाहते है तो आपको चुनाव के दिनों में ही अपनी बात कहनी चाहिए। और चुनावो के दौरान जनता इस मोड में रहती है कि उन्हें सिर्फ उम्मीदवार को ही सुनना होता है। ऐसे में यदि आप उम्मीदवार है, तो जनता भी आपको सुनेगी और नेता भी सुनेगा !! . मेरा अब तक जो अनुभव रहा है उस आधार पर मैं कह सकता हूँ कि, भारत में दो काम करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यो की श्रेणी में आते है : खुद के कमाए गए पैसे से जमीन खरीदकर बिना किसी लोन के छोटी मोटी मनुफेक्चरिंग यूनिट लगाना किसी छोटी पार्टी से या निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सांसद / विधायक का चुनाव लड़ना। युद्ध (War) सबसे बेहतर शिक्षक है। युद्ध जो चीजे सिखाता है, उसे दुनिया में और किसी भी तरह से सीखा नहीं जा सकता। इस तरह युद्ध सबसे बेहतरीन शिक्षक है। युद्ध के बाद शांति काल के सबसे बेहतर 2 शिक्षक ऊपर दिए गए है। ये तीनो शिक्षक सबसे श्रेष्ठ इसीलिए है, क्योंकि इसे किताबों को पढ़कर सीखा नहीं जा सकता। इसके लिए मैदान में उतरना पड़ता है। . —————— . (A) . अच्छे और काबिल लोग चुनावों में हिस्सा ना ले और राजनीती से दूर रहे इसके लिए उन्होंने कितने सारे गलत क़ानून छापें हुए है, इस विषय पर मैं 100 पेज की पोस्ट लिखूंगा तो भी यह विषय पूरी तरह कवर नहीं कर पाऊंगा। लेकिन राजनीती को जितना मैंने अब तक समझा है उसका पूरा निचोड़ मुझसे पुछा जाए तो मैं कहूँगा कि पूरी राजनीती के डिजाइन का केन्द्रीय उद्देश्य यह है कि - युवाओं को राजनीती में आने से हतोत्साहित किया जाए !! . वे सिर्फ वोटर चाहते है, राजनैतिक कार्यकर्ता नहीं। एक वोटर वह है जो व्यवस्था में वांछित बदलाव के लिए नेता से उम्मीद करता है। जबकि एक कार्यकर्ता वह है जो अमुक आवश्यक बदलाव के लिए तब स्वयं चुनावों में हिस्सा लेता है, जब अन्य कोई व्यक्ति अमुक मुद्दे पर मैदान में आने को तैयार न हो। . युवाओं को राजनीति में आने से रोकने के लिए पेड मीडिया निरंतर काम करता है। और वह यह कैसे करता है, इसे समझाने का मेरे पास कोई शोर्ट कट नहीं है। इसे समझने का तरीका सिर्फ यह है कि, आप खुद चुनाव लड़ें। जब तक आप चुनाव नहीं लड़ते तब तक आप इस बात को कभी भी समझ नहीं पायेंगे कि उन्होंने कैसे आपको चुनाव लड़ने से रोका हुआ है। दरअसल चुनाव लड़ने में सबसे बड़ी बाधा वास्तविक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक है। . पेड मीडियाकर्मियों ने चुनाव लड़ने वालो के खिलाफ समाज में किस तरह का जहर घोला हुआ है, इसका पता आपको तब चलता है, जब आप चुनाव लड़ने का फैसला करते है। और जैसे ही आप यह फैसला लेते है आपके परिवार वालो से लेकर मित्र, रिश्तेदार, अड़ोसी-पडौसी आपको ऐसी नजरो से देखने लगते है जैसे आप कोई निहायत ही फालतू / निकृष्ट / अनुत्पादक कर्म करने जा रहे है। . ज्यादातर लोग आपका मजाक उड़ायेंगे, ताने कसेंगे और तरह तरह के तंज सुनाकर आपको हतोत्साहित करेंगे। हालांकि उन्हें आपको रोकने से कोई जाती फायदा नहीं होने वाला है। लेकिन पेड मीडिया ने सब तरफ से माहौल ही इस तरह का बनाया हुआ है कि ज्यादातर लोग इसी तरह से पेश आते है। तो सबसे पहले आपको इस मनोवैज्ञानिक लड़ाई से पार पाना होता है, और पिछले 5 साल में मेरा अनुभव है कि 99.9999% लोग इस पहली बाधा को ही पार नहीं कर पाते। . जो लोग यह सलाह देते है कि युवाओं को राजनीती में नहीं जाना चाहिए, मैं उनसे कहता हूँ कि यदि राजनीती गटर है तो आप वोट क्यों करते है, राजनीती पर टिप्पणियाँ एवं विमर्श क्यों करते है !! मतलब राजनीती पर बहस करना, राजनैतिक टिप्पणियाँ करना, नीतियों पर बहस करना, विभिन्न समस्याओ के लिए राजनेताओ को कोसना और सोशल मीडिया पर राजनीती पर बवाल काटना एक रचनात्मक काम है, लेकिन चुनाव लड़ना एक बदतर गतिविधि है !! . और यदि राजनीती गन्दी है तो इसकी वजह यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को राजनीती में जाने से हतोत्साहित किया जाता है। इससे जनता के पास बेहद बेहद सीमित विकल्प रह जाते है, और उन्हें उन बदतर विकल्पों में से ही किसी को चुनना होता है !! और फिर यही लोग कहते है कि राजनीती में अच्छे लोगो की कमी है। यह एकदम सीधी बात है कि, यदि आप लोगो को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करोगे तभी तो ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे, और जब ज्यादा लोग राजनीती में आयेंगे तो उनमे अच्छे लोग भी होंगे। . टीवी चेनल्स पर या अखबारों में आपने कई बार इस आशय की बात पढ़ी-सुनी-देखी होगी जिसमें यह बार बार दोहराया जाता है कि एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते आपको वोट करना चाहिए, और सोच समझकर वोट करना चाहिए। . लेकिन क्या आपने अख़बार-टीवी पर कितने बुद्धिजीवियों को यह कहते सुना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को चुनाव लड़ना चाहिए ताकि मतदाताओ के पास ज्यादा विकल्प हो ? शायद आज तक आपने ऐसा वाक्य कभी भी पेड मिडिया में नहीं सुना होगा !! वे कभी कभार यह कह देंगे कि अच्छे लोगो को आगे आना चाहिए, राजनीती में रुचि लेनी चाहिए, अच्छे उम्मीदवारों को वोट करना चाहिए आदि आदि। लेकिन यह बात कभी भी नहीं कहेंगे कि - यदि आपको राजनीति में सुधार लाना है तो ज्यादा से ज्यादा लोगो को अच्छे मुद्दों को उठाने के लिए चुनाव लड़ने चाहिए !! . वे कहेंगे राजनीती गटर है, और इससे दूर रहो !! बस !! सोशल मीडिया पर बामा बूम करो, यू ट्यूब पर वीडियो बनाकर अपलोड करो, धरने दो, विरोध करो, समर्थन करो और राजनीति के नाम पर जो मर्जी करो पर चुनाव मत लड़ो !! . ——————- . (B) . चुनाव लड़ना राजनीती में सबसे ज्यादा गंभीर गतिविधि है, और एक्टिविज्म में मेरा एक मुख्य लक्ष्य भारत के ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओ को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना है। और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे है। मैं बस उन तक यह बात पहुंचा देना चाहता हूँ कि यदि वे वाकयी व्यवस्था में बेहतर बदलाव चाहते है तो जब तक वे चुनावो में नहीं आते तब तक बात बनने वाली नहीं है। कृपया इस बात को नोट करें कि मेरा यह कहना नागरिको से नहीं बल्कि राजनैतिक कार्यकर्ताओ से है। राजनैतिक कार्यकर्ता वे है जो राजनैतिक विषयों पर टीका करते है, जिनके विमर्श में राजनैतिक दृष्टिकोण प्रकट होता है। . मैं बहुधा जूरी कोर्ट के बारे में लिखता हूँ। जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने में व्यक्ति को 2 -3 घंटे का समय लगता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति आकर मुझसे कहता है कि वह देश के लिए राजनैतिक सन्दर्भ में 3 घंटे काम करने के लिए उपलब्ध है, तो मैं उससे जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट पढने के लिए नहीं कहूँगा। मैं उससे कहूँगा कि वह चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर विधायक का फॉर्म डाउलोड करे और इस डमी फॉर्म को भरे। और फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह व्यक्ति चुनाव लड़ता है या नहीं। . क्योंकि मेरे मानने में चुनाव का फॉर्म भरना भी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गतिविधि है। और यह इतनी महत्त्वपूर्ण है कि मैं इसे ड्राफ्ट पढने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण मानता हूँ। और चुनाव लड़ना तो खैर सबसे महत्त्वपूर्ण है ही। . यदि आप चुनाव लड़ने इच्छुक है और इसमें आपको यदि किसी भी प्रकार की जानकारी या सहयोग चाहिए तो मुझसे राब्ता कर सकते है। अपनी तमाम व्यस्तताओ के बावजूद मैं आपको यथा शक्ति सहयोग करूँगा। और कृपया इस बात को नोट करें कि मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप मेरे द्वारा सुझाए गए मुद्दों पर चुनाव लड़ते है या खुद के मुद्दों पर चुनाव लड़ते है। आप चुनाव लड़ रहे है, यह भी अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है। तो आप किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ें या निर्दलीय भी चुनाव लड़ रहे तो मुझे सहयोग करने में ख़ुशी होगी। . मैंने अब तब दो चुनाव लड़े है। एक बार विधायक का और एक बार सांसद का। . चुनाव का बजट - विधायक का चुनाव 20 हजार के बजट में आसानी से लड़ा जा सकता है। पाठक ध्यान दें कि चुनाव जीतने के लिए आपको कम से 25-30 करोड़ की जरूरत होती है। लेकिन मैं यहाँ चुनाव लड़ने की बात कर रहा हूँ, चुनाव जीतने की नहीं। तो यदि आप 20 हजार रुपया वहन कर सकते है तो चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य करें। इसके लिए आपको एक सहयोगी की भी जरूरत होगी, ताकि पर्चे छपवाने, फ़ार्म भरने आदि में वो आपका सहयोग कर सके। तो यदि आपका साथ देने के लिए 1 भी आदमी तैयार है तो आप चुनाव लड़ सकते है। . ———————- . (C) . चुनाव लड़ने से सम्बंधित कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी : . चुनाव लड़ने में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम है नामांकन भरना। और यह बहुत बहुत महत्त्वपूर्ण काम है। यदि आपने सही तरीके से अपना नामांकन भर दिया तो समझिये आधी लड़ाई जीत ली है। तो यदि आप भविष्य में कभी भी चुनाव लड़ना चाहते है तो सबसे पहला काम यह है कि आप तुरंत चुनाव आयोग की वेबसाईट पर जाकर फॉर्म डाउनलोड करें, और इसे भरकर अपने पास रख ले। मान लीजिये कि आपको 2 साल बाद आने वाला चुनाव लड़ना है। तो भी 2 साल पहले ही नामांकन भर कर रख ले। नामांकन भरने के कोई पैसे नहीं लगते है। यह मुफ्त में डाउनलोड होता है। अत: आप इसका प्रिंट आउट ले ले और भरकर अपने पास रख ले। जब चुनाव आयेंगे तब इस बारे में अंतिम फैसला करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं। यदि नहीं लड़ना है तब भी नामांकन तो भर कर रख ले। और फिर जब चुनावी अधिसूचना निकलेगी तब आपको यदि चुनाव लड़ना है तो चुनाव आयोग में जाकर ओरिजिनल फॉर्म ले आये और पहले से भर कर रखे गए अपने फॉर्म से नकल कर ले। नामांकन फॉर्म बहुत ही जटिल होता है। मैंने अपने जीवन में इतना जटिल दस्तावेज दूसरा नहीं देखा है। और इसे जानबूझकर बहुत जटिल बनाया गया है। ज्यादातर लोग इसे गलत भर देते है और उनका फॉर्म रिजेक्ट हो जाता है। मुझे इसे भरने में पूरे 7 दिन लगे थे, और फॉर्म आने और इसे जमा करने के लिए सिर्फ 7 दिन की टाइम विंडो ही मिलती है। इस तरह मैंने अंतिम दिन के अंतिम दिन घंटे में अपना फॉर्म जमा कराया। यदि आपने पहले से नामांकन फॉर्म नहीं भरा है तो आपको वकील के पास दौड़ लगानी होगी। वकील आपको सीधे 25 हजार की फ़ीस सुनाएगा, और इस तरह आपका 25 हजार वेस्ट हो जाएगा। बड़ी पार्टियों के फॉर्म पेशेवर वकील भरते है। लेकिन हम छोटे उम्मीदवार है, अत: हमें अपना फॉर्म खुद ही भरना पड़ेगा, और इसीलिए हमें ज्यादा वक्त चाहिए। इसीलिए मैं कहता हूँ कि पहला स्टेप है डमी फॉर्म भरकर अपने पास रखना। और इस बात का फैसला बाद में करें कि आपको चुनाव लड़ना है या नहीं। मेरे चुनाव प्रचार में सिर्फ पेम्पलेट होता है। न कोई कार्यालय, न कोई टेम्पू, न बैनर, न विज्ञापन। मैं बस पेम्पलेट छपवाकर बाँट देता हूँ। आप भी ऐसा ही कर सकते है। 1 दिन पेम्पलेट छपाने में लगेगा, और 2 दिन बांटने में। बस और कुछ नहीं करना है। ज्यादा लोड लेना हो तो आपकी इच्छा है। मेरे हिसाब से इतना करना काफी होता है। 1 दिन नामांकन भरने में और 3 दिन पेम्पलेट के। आपको 4 दिन चाहिए होते है। यदि आपके साथ कोई सहयोगी है तो पेम्पलेट का काम 1 दिन में भी हो सकता है। इस तरह आप 2 दिन और 20 हजार खर्च करके चुनाव लड़ सकते है। यदि आप महाराष्ट्र एवं हरियाणा के निवासी है तो मालूम हो कि 4 अक्टूबर नामांकन भरने की अंतिम तिथि है। अत: आप यह चुनाव भी लड़ सकते है। यदि आप अन्य राज्यों के निवासी है तो भी नामांकन भरकर रखे ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में आप चुनाव लड़ सके। . राजनीति को देखने के दो दृष्टीकोण है : वोटर का दृष्टिकोण , और उम्मीदवार का दृष्टिकोण। यदि आप चुनाव लड़ लेते है तो आपको राजनीति को समझने का एक और दृष्टिकोण मिलेगा। और यह दृष्टिकोण वाकयी महत्त्वपूर्ण है। अत: मेरा मानना है कि एक राजनैतिक कार्यकर्ता को विधायक या सांसद का चुनाव लड़ने का प्रयास अवश्य चाहिए, ताकि वह राजनीति के उन पहलूओ को देख सके, जिसे ज्यादातर लोग नहीं देख पाते। और इस बात से कभी फर्क नहीं पड़ता कि आपको कितने वोट मिले है। . —————— . (D) . गैर राजनेतिक संगठन बनाकर राजनैतिक मुद्दों पर काम करना दुनिया की सबसे गन्दे किस्म की राजनीति है । . राजनीति को सत्ता के लालच से जोड़ कर देखा जाता है, इसीलिए अपना नैतिक मापदंड बनाए रखने के लिए कई संघठन गैर राजनेतिक गतिविधियाँ संचालित करते है, लेकिन उनके लक्ष्य हमेशा राजनेतिक होते है । अवाम में राजनेतिक विवेक पनपने से राजनेतिक सत्ताओ को चुनोती मिल सकती है, इसलिए कार्यकर्ताओं का टाइम पास करने के लिए उन्हें निस्वार्थ सेवा के ऊँचे आदर्श में उलझा दिया जाता है । . राजनेतिक दल पेड मीडिया, पेड बुद्धिजीवीयों, पेड स्तंभकारो, पेड पाठ्य पुस्तक लेखको की सहायता से आम जन के राजनेतिक विवेक को परिपक्व करने वाली सूचनाओं को बाधित कर देते है। इससे शासको के लिए शासन करना आसान हो जाता है । . उदाहरण 1 : जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के बाद देश की अवाम में भारी असंतोष पनपने लगा था। महात्मा लाला लाजपत राय, और महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल के नेतृत्व में महात्मा भगत सिंह, महात्मा चन्द्र शेखर आज़ाद, महात्मा बटुकेश्वर दत्त तथा महात्मा राजगुरु जैसे हज़ारो युवाओ का मोहन गांधी से मोहभंग हुआ, और युवा राजनेतिक गतिविधियों में रूचि लेने लगे । ये क्रांतिकारी राईट टू रिकाल कानूनों और पूर्ण स्वराज्य की मांग कर रहे थे । इनकी बढ़ती लोकप्रियता लाखो युवाओं में राजनेतिक विवेक का संचार कर सकती थी । निदान : अंग्रेजो के निर्देश पर जवाहर लाल और मोहन गांधी ने 1924 में 'सेवा दल' की स्थापना की । इस दल के कार्यकर्ताओं को राजनेतिक गतिविधियों में भाग न लेने की शपथ दिलाई गयी । सेवा दल ने लाखो कार्यकर्ताओं को सुबह व्यायाम करने, जन जागरण और समाज सेवा जैसे अनुपयोगी कार्यो में इसीलिए उलझा दिया ताकि, कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट हो जाए, और पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले क्रान्तिकारियो को कार्यकर्ता नही मिल सके । . उदाहरण 2 : 1922, तुर्की के खिलाफत आन्दोलन के दौरान मोहन गांधी आज़ादी की लड़ाई को हाशिये पर धकेल कर खिलाफत आन्दोलन में कूद गए थे । यह वाकयी में एक अजीब स्थिति थी। मोहन के इस कदम से हिन्दू नाराज हुए और हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण होने लगा । इसी दौरान अखिल भारतीय हिन्दू महासभा नामक राजनेतिक संघठन खड़ा हो रहा था और उनके एजेंडे में चुनाव लड़ना भी शामिल था। यदि ऐसा होता तो मोहन गांधी और जवाहर लाल का युवाओं को चरखे, बकरी का दूध, खादी, भजन, अनशन और साफ़ सफाई में उलझाए रखने का कार्यक्रम खटाई में पड़ सकता था, जिस से ब्रिटिश साम्राज्य को नुकसान होता। ब्रिटिश भारत के युवाओं को सक्रीय राजनीती में नही आने देना चाहते थे। निदान : अंग्रेजो की अनुमति से सिंधिया राजवंश ने एक छद्म हिन्दू वादी अराजनेतिक संगठन 'X' को खड़ा करने के लिए धन मुहैया कराया, ताकि हिन्दू महासभा को तोड़ा जा सके । संघठन X ने सिंधिया तथा अन्य देशी राजाओं से प्राप्त चंदो से लाखो हिन्दू कार्यकर्ताओं को खींच कर परेड करने, लाठी चलाना सीखने , राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ध्वज वंदन करने और नारे लगाने जैसे अनुपयोगी और अराजनैतिक कार्यो में उलझा लिया। हिन्दू महासभा को कार्यकर्ता और चंदे मिलने बंद हो गए, और यह संघठन टूट गया। चूंकि हिन्दू महासभा राजनेतिक लक्ष्यों के लिए नागरिको को संघठित कर रही थी, इसलिए इनके नेता हमेशा अंग्रेजो के निशाने पर रहे । . इस समय भारत एक अजीब स्थिति से गुजर रहा था, जिसमे एक और मोहन और जवाहर युवाओं को अनशन और चरखे से जबकि X परेड और लाठियों से आज़ादी लाने का विश्वास दिला रहे थे ( और दिला भी चुके थे), वही दूसरी और देश में कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रहे राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस देश से बाहर जाकर कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा कर के दुनिया की सबसे ताकतवर सेना से लड़ने के लिए फ़ौज खड़ी कर रहे थे। . उदाहरण 3 : आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रणेता महात्मा राजीव भाई दिक्षित 1985 से ही स्वदेशी का प्रचार कर रहे थे । पिछले 70 वर्ष में वो अकेले शख्स है जिन्होंने लाखों कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण सूचनाएं दी । व्यवस्था परिवर्तन के तथा विदेशी शासको से भारत की मुक्ति के लिए वो पूरे देश में घूम घूम कर 25 वर्ष तक राजनेतिक जन आन्दोलन की जमीन तैयार करते रहे । उन्होंने लाखों नागरिको को FDI के दुष्प्रभाव से परिचित कराया कि, कैसे FDI जनित विकास भारत को फिर से ग़ुलाम बना देगा । निदान : चूंकि राजीव भाई राजनेतिक आन्दोलन खड़ा कर रहे थे, अत: इसे तोड़ने के लिए आरएसएस ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। आरएसएस, बीजेपी और धनिको से प्राप्त सरंक्षण और अनुदान से स्वदेशी जागरण मंच ने लाखों कार्यकर्ताओं को अपनी और खींचा और बीजेपी को सत्ता हासिल हुयी, 1999 में सत्ता में आते ही बीजेपी ने स्वदेशी के मुद्दों को दरकिनार कर दिया । ज़्यादातर बड़े समाज सेवी संघठन सत्ता में सेंध लगाने का ही कार्य करते है । यह कोयले की दलाली के बावजूद हाथ काले न होने देने का एक पैंतरा है । ये भारी भरकम गैर राजनेतिक संघठन समाज सेवा के नाम पर लाखो करोड़ो कार्यकर्ताओं को आकर्षित करते है, तथा उनकी मदद से परोक्ष राजनेतिक ताकत हासिल करते है । इसमें फायदा यह होता है, कि राजनेतिक दल इन अराजनेतिक संघठनो के भ्रमित कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह नही रहता, तथा इन संघठनो के पास हमेशा बच निकलने की यह पतली गली रहती है कि अमुक राजनेतिक दल उनकी उम्मीदों पर खरा नही उतरा। इस प्रकार ये अराजनैतिक संघठन अमरये बकरे बने रहते है । . बड़े संघठनो के अलावा इसी तासीर के हज़ारो अराजनैतिक संघठन देश में संचालित है, जिनका एकनिष्ठ उद्धेश्य नागरिको या धनिको से चंदा लेकर कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करना होता है, ताकि उन्हें सक्रीय राजनीति में आने से रोका जा सके। आपको किसी भी जिले में इस तबियत के सैंकड़ो छोटे मोटे संगठन मिल जायेंगे जिनका मॉडल कुछ इस तरह का होता है : इनकी जिले स्तर पर एक कार्यकारिणी होती है, जिसमे 10-20 सदस्य/पदाधिकारी होते है। इन अध्यक्षों / उपाध्यक्षो/ सचिवो / कोषाध्यक्षो आदि नामधन्य पदाधिकारियों के हाथ जोड़ते हुए से फोटो वगेरह आप अखबारों और शहर के मुख्य चौराहों पर चस्पां हुए देख सकते है। वक्त जरुरत इन पदाधिकारियो द्वारा कार्यकर्ताओं का टाइम खपाने एवं संघठन से चिपकाये रखने के लिए एक सभा रखी जाती है, जिसके प्रारम्भ मालाएं और साफे पहनाने तथा समापन संघठन में ही शक्ति है टाइप के नारो से होती है। अमूमन सभा के मध्य में चाय, बिस्किट, समोसो आदि के सिवाय कोई तार्किक एजेंडा नही होता, अत: गाहे बगाहे समस्या के समाधान सुझाने की जगह सिद्धांतो की रूटीन भाषण बाज़ी कर इति कर ली जाती है । कार्यकर्ताओं को व्यस्त रखने के लिए ये संगठन रक्तदान शिविर लगाना, भोजन वगेरह बांटना, पेड़ लगाना, जयंतिया मनाना, प्याऊ चलवाना, नये मेंबर बनवाना, भभका पैदा करने के लिए नारों के साथ जुलुस और वाहन रेली निकालना आदि तथा इसी तरह की फौरी गतिविधियाँ संचालित करते है । अमूमन इस प्रकार के सभी संगठन कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सूचनाये नही देते, और उन्हें राजनीती से दूर रहने की घुट्टी देते रहते है। इनका मुख्य डायलॉग होता है, यहाँ राजनीती मत करो, राजनीती गन्दी चीज है, आदि आदि !! पेड मीडिया में इस तरह के बड़े अराजनैतिक संगठन चलाने वालो को काफी सकारात्मक कवरेज दिया जाता है, और उनके इस अराजनैतिक पने को एक खासियत की तरह उभारा जाता है कि, देखो ये लोग कितने निस्वार्थ है कि राजनीति की गंदगी से दूर रहकर सेवा का कार्य कर रहे है !! . कुल मिलाकर, उन्होंने लोगो को राजनीति में जाने से रोकने के लिए काफी अच्छा सेट अप लगाया हुआ है !! मैं यह लेख पढ़ने वाले से पूछना चाहता हूं की क्या आप भारत देश की समस्याओं को सुलझाने में देश की उन्नति में अपना योगदान देना चाहते हैं तो कृपया आप अपनी बात राजनीति में सक्रिय योगदान देकर अपनी बात जनता के सम्मुख प्रमुखता से रखें बहुत सी राजनीतिक पार्टियों हैं आप उन पार्टियों से टिकट लेकर या निर्दलीय चुनाव लड़े अगर आप एक मंच चाहते हैं और चुनाव लड़ना चाहते हैं तो कृपया निम्नलिखित नंबरों पर व्हाट्सएप करें हम आपको टिकट भी देंगे आपका नामांकन फार्म भी भरवाने में मदद करेंगे और अपनी क्षमता अनुसार फाइनेंशियल सहयोग भी प्रदान करेंगे आने वाले विधानसभा चुनाव असम बंगाल तथा कई छोटे राज्यों में 2026 में चुनाव होने की प्रबल संभावना है इच्छुक कार्यकर्ता देशहित में चुनाव लड़ने के लिए संपर्क कर सकते हैं. शिव प्रसाद गुप्ता 7007184869 महावीर प्रसाद कुमावत 9887742837
गौ नीति : भारतीय नस्ल के गौ-धन को सरंक्षित करने के लिए प्रस्तावित क़ानून (Gau Neeti : Proposed Notification to Protect Indian Cow ) . (इस क़ानून ड्राफ्ट का पीडीऍफ़ एवं अन्य सम्बंधित जानकारी के लिए इस पोस्ट के पहले 3 कमेन्ट देखें। पीडीऍफ़ पेम्पलेट छपवाने और मोबाईल पर पढने के फोर्मेट में है।) . इस कानून का सार : इस क़ानून के गेजेट में आने से देशी गाय की हत्या में कमी आएगी और गौ वंश का सरंक्षण होगा। इस कानून को विधानसभा से पास करने की जरूरत नहीं है। मुख्यमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। . यदि आप इस क़ानून का समर्थन करते है तो मुख्यमंत्री को एक पोस्टकार्ड भेजे। पोस्टकार्ड में यह लिखे : . “मुख्यमंत्री जी, कृपया प्रस्तावित गौ रक्षा क़ानून को गेजेट में छापें - #GauNeeti , #P20180436111 #VoteVapsiPassBook , . ======क़ानून ड्राफ्ट का प्रारम्भ==== . टिप्पणी : इस ड्राफ्ट में दो भाग है - (I) नागरिकों के लिए सामान्य निर्देश, (II) नागरिकों और अधिकारियों के लिए निर्देश। टिप्पणियाँ इस क़ानून का हिस्सा नहीं है। नागरिक एवं अधिकारी टिप्पणियों का इस्तेमाल दिशा निर्देशों के लिए कर सकते है। . (I) नागरिको के लिए निर्देश : . (01) इस क़ानून के गेजेट में छपने के 30 दिनों के भीतर राज्य के प्रत्येक मतदाता को एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी। निचे दिए गए अधिकारी इस वोट वापसी पासबुक के दायरे में आयेंगे : . 1. गौ रक्षा अधिकारी ( Dy S.P. - Cow Protection Cell Incharge ) 2. गौ कल्याण मंत्री ( Cow Welfare Minister ) 3. जूरी प्रशासक ( Jury Administrator ) . तब यदि आप ऊपर दिए गए किसी अधिकारी के काम-काज से संतुष्ट नहीं है, और उसे निकालकर किसी अन्य व्यक्ति को लाना चाहते है तो पटवारी कार्यालय में जाकर स्वीकृति के रूप में अपनी हाँ दर्ज करवा सकते है। आप अपनी हाँ SMS, ATM या मोबाईल APP से भी दर्ज करवा सकेंगे। आप किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दे सकते है, या अपनी स्वीकृति रद्द कर सकते है। आपकी स्वीकृति की एंट्री वोट वापसी पासबुक में आएगी। यह स्वीकृति आपका वोट नही है। बल्कि यह एक सुझाव है। . (02) यदि आपका नाम वोटर लिस्ट में है तो इस कानून के पारित होने के बाद आपको जूरी ड्यूटी के लिए बुलाया जा सकता है। निचे दिए गए मामले जूरी ड्यूटी के दायरे में आयेंगे : . (2.1) गौ रक्षा अधिकारी, गाय मंत्री, जूरी प्रशासक एवं उनके स्टाफ से सम्बंधित सभी प्रकार की नागरिक शिकायतें। . (2.2) गौ वंश की तस्करी, गौ हत्या एवं देशी गाय से संबधित सभी प्रकार के मुकदमें। . (2.3) देशी गाय के उत्पादों में जर्सी या अन्य नस्लों की गायों के उत्पादों की मिलावट को रोकने वाले कानूनों का उलंघन करने की शिकायतें। . जूरी मंडल का चयन लॉटरी से किया जाएगा, मुकदमे की गंभीरता को देखते हुए जूरी मंडल में 15 से 1500 तक सदस्य हो सकेंगे। यदि लॉटरी में आपका नाम निकल आता है तो आपको आरोपी, पीड़ित, गवाहों और दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत सबूत आदि देखकर बहस सुननी होगी और सजा / जुर्माना या रिहाई का फैसला देना होगा। . (03) यदि आपका नाम वोटर लिस्ट में है और आप इस क़ानून की किसी धारा में कोई आंशिक या पूर्ण परिवर्तन चाहते है, तो अपने जिले के कलेक्टर कार्यालय में इस क़ानून के जनता की आवाज खंड की धारा (15.1) के तहत एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकते है। कलेक्टर 20 रू प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर शपथपत्र स्वीकार करेगा, और शपथपत्र को मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर स्कैन करके रखेगा। . भाग (II) : नागरिकों और अधिकारियों के लिए निर्देश : . [ टिप्पणी 1 : इस क़ानून में गाय शब्द से आशय है देशी गाय एवं उसका वंश। इस क़ानून में गौ रक्षा अधिकारी से आशय है, वह जिले का वह पुलिस अधिकारी जिसके पास गौ प्रकोष्ठ ( Cow Protection Cell ) का चार्ज है। ] . टिप्पणी 2 : गौ कल्याण मंत्री / मुख्यमंत्री यह क़ानून पास होने के 180 दिनों के भीतर निम्नलिखित बिन्दुओ का निष्पादन करने के लिए नोटिफिकेशन निकालेंगे जिन्हें इस क़ानून में जोड़ा जाएगा ] . (4.1) मुख्यमंत्री एक गौ कल्याण मंत्री की नियुक्ति करेंगे। गाय मंत्री राज्य में देशी गाय या भारतीय नस्ल की गाय के सरंक्षण एवं देशी गाय के सभी उत्पादों आदि को बढ़ावा देने के लिए नीति-निर्धारण, प्रबंधन एवं नियमन करेगा। . (4.2) मुख्यमंत्री प्रत्येक जिले में एक गौ प्रकोष्ठ ( Cow Protection Cell ) की स्थापना करेंगे। इस प्रकोष्ठ का मुखिया पुलिस उप अधीक्षक या सहायक अधीक्षक स्तर का पुलिस अधिकारी होगा, जो कि गौ रक्षा अधिकारी कहलायेगा। मामलों की संख्या को देखते हुए किसी जिले में इसके लिए अलग से अधिकारी नियुक्त किया जा सकता है, या फिर किसी उप अधीक्षक को इसका अतिरिक्त चार्ज दिया जा सकता है। किन्तु यदि गौ रक्षा अधिकारी नागरिको की स्वीकृति से नियुक्त किया गया है तो वह सिर्फ गौ प्रकोष्ठ का कार्य ही करेगा। . (4.3) मुख्यमंत्री प्रत्येक जिले में एक जिला जूरी प्रशासक की नियुक्ति करेंगे। जूरी प्रशासक गौ वंश से सम्बंधित शिकायतों एवं मुकदमो की सुनवाई के लिए जूरी मंडलों के गठन एवं संचालन का कार्य करेगा। . (05) गौ वंश का परिवहन . (5.1) गायो के परिवहन के लिए सिर्फ जालीदार वाहनों का ही उपयोग किया जाएगा। इन वाहनों पर गौ परिवहन यान लिखा रहेगा और सिर्फ इन्ही वाहनों में गायो को ले जाया जा सकेगा। . (5.2) गौ वंश को किसी निचे दिए गए राज्यों में ले जाने पर पाबंदी रहेगी : . 5.2.1. यदि अमुक राज्य में गौ कशी कानूनी है . 5.2.2. यदि अमुक राज्य में इस तरह का कोई क़ानून नहीं है जो ऐसे राज्यों में गौ परिवहन पर प्रतिबन्ध लगाता है जिन राज्यों में गौ कशी कानूनी है। . यदि कोई व्यक्ति ऐसे राज्यों में गौ वंश को ले जाता पाया जाता है तो मुख्यमंत्री अभियुक्त को पाँच वर्षों तक की सजा देने का क़ानून बना सकते है। . (6) गौ शालाओं की स्थापना एवं उनका संचालन : . (6.1) गौ कल्याण मंत्री तहसील स्तर पर गौ-शालाओ के संचालन के लिए नीति बनाएगा एवं यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक तहसील में गौ शालाओ का विधिवत संचालन हो। आवश्यकता अनुसार शहरों में 10,000 से 30,000 आबादी की प्रत्येक बस्ती में एवं पंचायत स्तर पर भी गौ शालाए खोली जा सकती है। इन गौ शालाओं को जो भी दान देगा उसे टेक्स में कोई छूट नहीं मिलेगी। गौ शालाएं बूढ़ी गायों को एक निर्धारित कीमत पर खरीदेगी। . (6.2) राज्य सरकार भारतीय नस्ल की गायों का निषेचन जर्सी सांडो से करने के लिए चलायी गयी सभी योजनाओ को बंद करेगी तथा भारतीय नस्ल की गायों का गर्भाधान देशी नस्ल के उन्नत सांडो से करवाने को प्रोत्साहन देगी। यदि प्राइवेट कम्पनियां या निजी व्यक्ति जर्सी सांडो का इस्तेमाल देशी गायों के गर्भाधान में करते है तो इस पर कोई रोक नहीं होगी। सरकार शुक्राणु-विभाजन की प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिये पूंजी निवेश करेगी ताकि सांड की पैदावार कम की जा सके। . (6.3) मुख्यमंत्री मंदिरों को राज्य सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए नोटिफिकेशन निकालेंगें । . (7) गौ उत्पादों को प्रोत्साहन एवं सरंक्षण . (7.1) डेयरी उद्योगों एवं दूध विक्रेताओ को अपने दूध के डिब्बे या बोतल पर स्पष्ट रूप से यह अंकित करना होगा कि इसमें जो दूध है वह देशी गाय का है या वर्ण संकर प्रजाति का । दूध विक्रेता अपनी गायों की नस्ल की शुद्धता के लिए विभाग से सर्टिफिकेट ले सकेंगे एवं छोटे पशुपालक अपनी गायों की नस्ल की शुद्धता का सेल्फ सर्टिफिकेट जारी कर सकेंगे। गाय मंत्री इन स्व घोषित सर्टिफिकेट को अनुमोदित करेगा। . (7.2) यदि कोई विक्रेता अपने दूध पर देशी गाय के दूध का चिन्ह अंकित करता है और उसमे 5% से अधिक मिलावट पायी जाती है तो उस पर आर्थिक दंड या लाइसेंस का रद्दीकरण किया जाएगा। देशी गाय के उत्पादों से सम्बंधित सभी मामलो में मिलावट आदि की सुनवाई भी नागरिको की जूरी करेगी। देशी गाय के दूध के अन्य उत्पादों जैसे पनीर, घी आदि पर भी यही नियम लागू होंगे। . (08) गाय का चमड़ा बेचने पर प्रतिबन्ध लगाया जाएगा। मृत गाय को दफनाया जायेगा या जलाया जायेगा। जूतों / बेग आदि के निर्माता अपने उत्पादों पर हरा गो-हत्या मुक्त लेबल लगा सकेंगे, जिसका मतलब होगा कि चमड़ा जिस पशु से आया है, उसकी प्राकृतिक मृत्यु हुई है और उसका मांस खाने के लिए प्रयोग नहीं किया गया था। . (09) अधिकारियों द्वारा आवेदन एवं योग्यताएं : . (9.1) गौ रक्षा अधिकारी के लिए : यदि 30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक जो पिछले 3000 दिनों में 2400 से अधिक दिनों के लिए किसी जिले में पुलिस प्रमुख नहीं रहा हो, तथा जिसने 5 वर्षों से अधिक समय तक सेना में काम किया हो, या पुलिस विभाग में एक भी दिन काम किया हो, या सरकारी कर्मचारी के रूप में 10 वर्षों तक काम किया हो अथवा उसने राज्य लोक सेवा आयोग या संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रशासनिक सेवाओ की लिखित परीक्षा पास की हो, अथवा उसने विधायक या सांसद या पार्षद या जिला पंचायत के सदस्य का चुनाव जीता हो, तो ऐसा व्यक्ति गौ रक्षा अधिकारी के प्रत्याशी के रूप में आवेदन कर सकेगा। . (9.2) गौ कल्याण मंत्री के लिए : 30 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक राज्य का गौ कल्याण मंत्री बनने के लिए आवेदन कर सकेगा। . (9.3) जूरी प्रशासक के लिए : भारत का कोई भी नागरिक जिसकी आयु 32 वर्ष से अधिक हो एवं उसे LLB की शिक्षा पूर्ण किये हुए 5 वर्ष हो चुके हो तो वह जिला जूरी प्रशासक पद के लिए आवेदन कर सकेगा। . (10) धारा 09 में दी गयी योग्यता धारण वाला कोई भी नागरिक यदि जिला कलेक्टर के सामने स्वयं या किसी वकील के माध्यम से ऐफिडेविट प्रस्तुत करता है, तो जिला कलेक्टर सांसद के चुनाव में जमा की जाने वाली राशि के बराबर शुल्क लेकर अर्हित पद के लिए उसका आवेदन स्वीकार कर लेगा, तथा शपथपत्र को मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर स्कैन करके रखेगा। . (11) मतदाता द्वारा प्रत्याशियों का समर्थन करने के लिए "हाँ" दर्ज करना . (11.1) कोई भी नागरिक किसी भी दिन अपनी वोट वापसी पासबुक या मतदाता पहचान पत्र के साथ पटवारी कार्यालय में जाकर गौ रक्षा अधिकारी गाय मंत्री एवं जूरी प्रशासक के प्रत्याशियों के समर्थन में हाँ दर्ज करवा सकेगा। पटवारी अपने कम्प्यूटर एवं वोट वापसी पासबुक में मतदाता की हाँ को दर्ज करके रसीद देगा। पटवारी मतदाताओं की हाँ को प्रत्याशीयों के नाम एवं मतदाता की पहचान-पत्र संख्या के साथ जिले की वेबसाईट पर भी रखेगा। मतदाता किसी पद के प्रत्याशीयों में से अपनी पसंद के अधिकतम 5 व्यक्तियों को स्वीकृत कर सकता है। . (11.2) स्वीकृति ( हाँ ) दर्ज करने के लिए मतदाता 3 रूपये फ़ीस देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी . (11.3) यदि कोई मतदाता अपनी स्वीकृती रद्द करवाने आता है तो पटवारी एक या अधिक नामों को बिना कोई फ़ीस लिए रद्द कर देगा । . (11.4) प्रत्येक सोमवार को महीने की 5 तारीख को, कलेक्टर पिछले महीने के अंतिम दिन तक प्राप्त प्रत्येक प्रत्याशियों को मिली स्वीकृतियों की गिनती प्रकाशित करेगा। पटवारी अपने क्षेत्र की स्वीकृतियो का यह प्रदर्शन प्रत्येक सोमवार को करेगा। गाय मंत्री की स्वीकृतियों का प्रदर्शन राज्य के कैबिनेट सचिव द्वारा भी किया जाएगा। . [ टिपण्णी : कलेक्टर ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता अपनी स्वीकृति SMS, ATM एवं मोबाईल एप द्वारा दर्ज करवा सके। . रेंज वोटिंग - प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री ऐसा सिस्टम बना सकते है कि मतदाता किसी प्रत्याशी को -100 से 100 के बीच अंक दे सके। यदि मतदाता सिर्फ हाँ दर्ज करता है तो इसे 100 अंको के बराबर माना जाएगा। यदि मतदाता अपनी स्वीकृति दर्ज नही करता तो इसे शून्य अंक माना जाएगा । किन्तु यदि मतदाता अंक देता है तब उसके द्वारा दिए अंक ही मान्य होंगे। रेंज वोटिंग की ये प्रक्रिया स्वीकृति प्रणाली से बेहतर है, और ऐरो की व्यर्थ असम्भाव्यता प्रमेय ( Arrow’s Useless Impossibility Theorem ) से प्रतिरक्षा प्रदान करती है। ] . (12) गौ कल्याण मंत्री एवं गौ रक्षा अधिकारी की नियुक्ति एवं निष्कासन . (12.1) गौ रक्षा अधिकारी के लिए : यदि जिले की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं ( सभी मतदाता, न कि केवल वे जिन्होंने स्वीकृति दर्ज की है ) के 35% से अधिक मतदाता किसी प्रत्याशी के पक्ष में हाँ दर्ज कर देते है और यदि ये स्वीकृतियां पदासीन गौ रक्षा अधिकारी से 1% अधिक भी है तो मुख्यमंत्री सबसे अधिक स्वीकृति प्राप्त करने वाले व्यक्ति को उस जिले में अगले 4 वर्ष के लिए गौ रक्षा अधिकारी नियुक्त कर सकते है। . (12.2) गौ कल्याण मंत्री के लिए : यदि राज्य की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं के 35% से अधिक मतदाता किसी उम्मीदवार के पक्ष में हाँ दर्ज कर देते है और यदि ये स्वीकृतियां पदासीन गौ कल्याण मंत्री से 1% अधिक भी है तो मुख्यमंत्री अमुक प्रत्याशी को गौ कल्याण मंत्री नियुक्त कर सकते है। . (12.3) जूरी प्रशासक के लिए : यदि जिले की मतदाता सूची में दर्ज सभी मतदाताओं के 35% से अधिक मतदाता किसी उम्मीदवार के पक्ष में हाँ दर्ज कर देते है और यदि ये स्वीकृतियां पदासीन जूरी प्रशासक से 1% अधिक भी है तो मुख्यमंत्री अमुक प्रत्याशी को जिला जूरी प्रशासक की नौकरी दे सकते है। . (13) जिला महाजूरी मंडल = डिस्ट्रिक्ट ग्रेंड ज्यूरी का गठन . (13.1) प्रथम महाजूरी मंडल का गठन : जिला जूरी प्रशासक एक सार्वजनिक बैठक में मतदाता सूची में से 25 वर्ष से 50 वर्ष की आयु के मध्य के 50 मतदाताओं का चुनाव लॉटरी द्वारा करेगा। इन सदस्यों का साक्षात्कार लेने के बाद जूरी प्रशासक किन्ही 20 सदस्यों को निकाल सकता है। इस तरह 30 महाजूरी सदस्य शेष रह जायेंगे। . (13.2) अनुगामी महाजूरी मंडल : प्रथम महा जूरी मंडल में से जिला जूरी प्रशासक पहले 10 महाजूरी सदस्यों को हर 10 दिन में सेवानिवृत्त करेगा। पहले महीने के बाद प्रत्येक महाजूरी सदस्य का कार्यकाल 3 महीने का होगा, अत: 10 महाजूरी सदस्य हर महीने सेवानिवृत्त होंगे, और 10 नए चुने जाएंगे। नये 10 सदस्य चुनने के लिए जूरी प्रशासक जिले की मतदाता सूची में से लॉटरी द्वारा 20 सदस्य चुनेगा और साक्षात्कार द्वारा इनमें से किन्ही 10 की छंटनी कर देगा। . (13.3) यह महाजूरी मंडल निरंतर काम करता रहेगा। महाजूरी सदस्य प्रत्येक शनिवार एवं रविवार को बैठक करेंगे। बैठक सुबह 11 बजे से पहले शुरू हो जानी चाहिए और बैठक सांय 5 बजे तक चलेगी। जूरी सदस्यों को प्रति उपस्थिति 500 रू एवं यात्रा व्यय मिलेगा। . (14) शिकायतों एवं मुकदमो का जूरी द्वारा निपटान . [ टिप्पणी : मुख्यमंत्री जूरी मंडल के गठन एवं संचालन के लिए आवश्यक विस्तृत प्रक्रियाएं गेजेट में प्रकाशित करेंगे, जिन्हें इस क़ानून में जोड़ा जायेगा। मुख्यमंत्री के अलावा कोई अन्य मतदाता भी इसी क़ानून की धारा 15.1 का प्रयोग करते हुए ऐसी आवश्यक प्रक्रियाएं जोड़ने का शपथपत्र दे सकता है। ] . (14.1) धारा 02 में दिए गए सभी मामले जूरी मंडल द्वारा सुने जायेंगे। वादीगण अपने मामले की शिकायत सम्बंधित जिला महाजूरी मंडल के सदस्यों को लिख कर दे सकते है। यदि महाजूरी मंडल के सदस्य मामले को निराधार पाते है तो शिकायत खारिज कर सकते है । यदि महाजूरी मंडल के अधिकांश सदस्य मानते है कि शिकायत बिलकुल आधारहीन और मनगड़ंत है तो वे मामले की सुनवाई में हुई समय की बर्बादी के लिए 5000 रूपये प्रति घंटे अधिकतम की दर से जुर्माना भी लगा सकते है। . (14.2) यदि महाजूरी मंडल शिकायत स्वीकार कर लेता है तो महाजूरी मंडल मामले की सुनवाई करेगा। महाजूरी मंडल चाहे तो खुद सुनवाई कर सकता है, और यदि मामले ज्यादा है तो सुनवाई के लिए अलग से जूरी मंडल का गठन भी कर सकता है। मामले की जटिलता एवं आरोपी की हैसियत के अनुसार महाजूरी मंडल तय करेगा कि 15-1500 के बीच में कितने सदस्यों की जूरी बुलाई जानी चाहिए। तब जूरी प्रशासक मतदाता सूची से लॉटरी द्वारा सदस्यों का चयन करते हुए जूरी मंडल का गठन करेगा और मामला इन्हें सौंप देगा। . (14.3) अब यह जूरी मंडल दोनों पक्षों, गवाहों आदि को सुनकर फैसला देगा। प्रत्येक जूरी सदस्य अपना फैसला बंद लिफ़ाफ़े में लिखकर ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर या जज को देंगे। दो तिहाई सदस्यों द्वारा मंजूर किये गये निर्णय को जूरी का फैसला माना जाएगा। किन्तु नौकरी से निकालने एवं नार्क्को टेस्ट का फैसला लेने के लिए 75% सदस्यों के अनुमोदन की जरूरत होगी। जज या ट्रायल एडमिनिस्ट्रेटर सभी के सामने जूरी का निर्णय सुनायेंगे। यदि जज जूरी द्वारा दिए गए फैसले को खारिज करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है। प्रत्येक मामले की सुनवाई के लिए अलग से जूरी मंडल होगा, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। पक्षकार चाहे तो फैसले की अपील प्रवृत कानूनों के अनुसार उच्च जूरी मंडल या उच्च न्यायालय में कर सकते है। . (15) जनता की आवाज : . (15.1) यदि कोई मतदाता इस कानून में कोई परिवर्तन चाहता है तो वह कलेक्टर कार्यालय में एक एफिडेविट जमा करवा सकेगा। जिला कलेक्टर 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से शुल्क लेकर एफिडेविट को मतदाता के वोटर आई.डी नंबर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके रखेगा। . (15.2) यदि कोई मतदाता धारा 15.1 के तहत प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर अपना समर्थन दर्ज कराना चाहे तो वह पटवारी कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क देकर अपनी हां / ना दर्ज करवा सकता है। पटवारी इसे दर्ज करेगा और हाँ / ना को मतदाता के वोटर आई.डी. नम्बर के साथ मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा। . [ टिपण्णी : यह क़ानून लागू होने के 4 वर्ष बाद यदि व्यवस्था में सकारात्मक एवं निर्णायक बदलाव आते है तो कोई भी नागरिक इस कानून की धारा 15.1 के तहत एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है, जिसमे उन कार्यकर्ताओ को सांत्वना के रूप में कोई औचित्य पूर्ण प्रतिफल देने का प्रस्ताव होगा, जिन्होंने इस क़ानून को लागू करवाने के गंभीर प्रयास किये है। यह प्रतिफल किसी स्मृति चिन्ह / प्रशस्ति पत्र आदि के रूप में हो सकता है। यदि कोई कार्यकर्ता तब जीवित नही है तो प्रतिफल उसके नोमिनी को दिया जाएगा। यदि राज्य के 51% नागरिक इस शपथपत्र पर हाँ दर्ज कर देते है तो प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री इन्हें लागू करने के आदेश जारी कर सकते है, या नहीं भी कर सकते है। ] . ======ड्राफ्ट का समापन===== . इस क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करवाने के लिए एक आम मतदाता के रूप में आप क्या सहयोग कर सकते है ? . 1. कृपया “ मुख्यमंत्री कार्यालय ” के पते पर पोस्टकार्ड लिखकर इस क़ानून की मांग करें। पोस्टकार्ड में यह लिखे : मुख्यमंत्री जी, प्रस्तावित जिला जूरी कोर्ट क़ानून को गेजेट में छापे - #GauNeeti , #P20180436111 , #VoteVapsiPassbook , . 2. ऊपर दी गयी इबारत उसी तरफ लिखे जिस तरफ पता लिखा जाता है। पोस्टकार्ड भेजने से पहले पोस्टकार्ड की एक फोटो कॉपी करवा ले। यदि आपको पोस्टकार्ड नहीं मिल रहा है तो अंतर्देशीय पत्र ( inland letter ) भी भेज सकते है। . 3. प्रधानमन्त्री / मुख्यमंत्री जी से मेरी मांग नाम से एक रजिस्टर बनाएं। लेटर बॉक्स में डालने से पहले पोस्टकार्ड की जो फोटो कॉपी आपने करवाई है उसे अपने रजिस्टर के पन्ने पर चिपका देवें। फिर जब भी आप पीएम / सीएम को किसी मांग की चिट्ठी भेजें तब इसकी फोटो कॉपी रजिस्टर के पन्नो पर चिपकाते रहे। इस तरह आपके पास भेजी गयी चिट्ठियों का रिकॉर्ड रहेगा। . 4. आप किसी भी दिन यह चिट्ठी भेज सकते है। किन्तु इस क़ानून ड्राफ्ट के लेखको का मानना है कि सभी नागरिको को यह चिठ्ठी महीने की एक निश्चित तारीख को और एक तय वक्त पर ही भेजनी चाहिए। . तय तारीख व तय वक्त पर ही क्यों ? . 4.1. यदि चिट्ठियां एक ही दिन भेजी जाती है तो इसका ज्यादा प्रभाव होगा, और मुख्यमंत्री कार्यालय को इन्हें गिनने में भी आसानी होगी। चूंकि नागरिक कर्तव्य दिवस 5 तारीख को पड़ता है अत: पूरे देश में सभी शहरो के लिए चिट्ठी भेजने के लिए महीने की 5 तारीख तय की गयी है। तो यदि आप चिट्ठी भेजते है तो 5 तारीख को ही भेजें। . 4.2. शाम को 5 बजे इसलिए ताकि पोस्ट ऑफिस के स्टाफ को इससे अतिरिक्त परेशानी न हो। अमूमन 3 से 5 बजे के बीच लेटर बॉक्स खाली कर लिए जाते है, अब मान लीजिये यदि किसी शहर से 100-200 नागरिक चिट्ठी डालते है तो उन्हें लेटर बॉक्स खाली मिलेगा, वर्ना भरे हुए लेटर बॉक्स में इतनी चिट्ठियां आ नहीं पाएगी जिससे पोस्ट ऑफिस व नागरिको को असुविधा होगी। और इसके बाद पोस्ट मेन 6 बजे पोस्ट बॉक्स खाली कर सकता है, क्योंकि जल्दी ही वे जान जायेंगे कि पीएम को निर्देश भेजने वाले जिम्मेदार नागरिक 5-6 के बीच ही चिट्ठियां डालते है। इससे उन्हें इनकी छंटनी करने में अपना अतिरिक्त वक्त नहीं लगाना पड़ेगा। अत: यदि आप यह चिट्ठी भेजते है तो कृपया 5 बजे से 6 बजे के बीच ही लेटर बॉक्स में डाले। यदि आप 5 तारीख को चिट्ठी नहीं भेज पाते है तो फिर अगले महीने की 5 तारीख को भेजे। . 4.3. आप यह चिट्ठी किसी भी लेटर बॉक्स में डाल सकते है, किन्तु हमारे विचार में यथा संभव इसे शहर या कस्बे के हेड पोस्ट ऑफिस के बॉक्स में ही डाला जाना चाहिए। क्योंकि हेड पोस्ट ऑफिस का लेटर बॉक्स अपेक्षाकृत बड़ा होता है, और वहां से पोस्टमेन को चिट्ठियाँ निकालकर ले जाने में ज्यादा दूरी भी तय नहीं करनी पड़ती । . 5. यदि आप फेसबुक पर है तो प्रधानमंत्री / मुख्यमंत्री जी से मेरी मांग नाम से एक एल्बम बनाकर रजिस्टर पर चिपकाए गए पेज की फोटो इस एल्बम में रखें। . 6. यदि आप ट्विटर पर है तो मुख्यमंत्री जी को रजिस्टर के पेज की फोटो के साथ यह ट्विट करें : @Cmo... , कृपया यह क़ानून गेजेट में छापें - #GauNeeti , #P20180436111 , #VoteVapsiPassbook , . 7. Pm / Cm को चिट्ठी भेजने वाले नागरिक यदि आपसी संवाद के लिए कोई मीटिंग वगेरह करना चाहते है तो वे स्थानीय स्तर पर महीने के दुसरे रविवार यानी सेकेण्ड सन्डे को प्रात: 10 बजे मीटिंग कर सकते है। मीटिंग हमेशा सार्वजनिक स्थल पर रखी जानी चाहिए। इसके लिए आप कोई मंदिर या रेलवे-बस स्टेशन के परिसर आदि चुन सकते है। 2nd Sunday के अतिरिक्त अन्य दिनों में कार्यकर्ता निजी स्थलों पर मीटिंग वगेरह रख सकते है, किन्तु महीने के द्वितीय रविवार की मीटिंग सार्वजनिक स्थल पर ही होगी। इस सार्वजनिक मीटिंग का समय भी अपरिवर्तनीय रहेगा। . 8. अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी से प्रेरित यह एक विकेन्द्रित जन आन्दोलन है। (15) धाराओं का यह ड्राफ्ट ही इस आन्दोलन का नेता है। यदि आप भी यह मांग आगे बढ़ाना चाहते है तो अपने स्तर पर जो भी आप कर सकते है करें। यह कॉपी लेफ्ट प्रपत्र है, और आप इस बुकलेट को अपने स्तर पर छपवाकर नागरिको में बाँट सकते है। इस आन्दोलन के कार्यकर्ता धरने, प्रदर्शन, जाम, मजमे, जुलूस जैसे उन कदमों से बहुधा परहेज करते है जिससे नागरिको को परेशानी होकर समय-श्रम-धन की हानि होती हो। अपनी मांग को स्पष्ट रूप से लिखकर चिट्ठी भेजने से नागरिक अपनी कोई भी मांग Pm तक पहुंचा सकते है। इसके लिए नागरिको को न तो किसी नेता की जरूरत है और न ही मीडिया की। . ==========
प्रेम Vs विवाह ; राजनीति Vs चुनावी राजनीति . सभी प्रेम कहानियों के साहित्यों में एक गलत बात को बार बार दोहराया गया है कि -- जमाना प्यार का दुश्मन है !! . यह बात ठीक नहीं है कि - ज़माना प्रेम का दुश्मन है। जमाने (जिसमें परिवार, समाज आदि शामिल है) को किसी भी व्यक्ति के प्रेम से कोई सख्त ऐतराज नहीं रहा है। जमाने को असली ऐतराज विवाह से होता है। . और जब जमाना किसी के प्रेम पर ऐतराज कर भी रहा होता है तो उसका यह ऐतराज इस वजह से होता है कि कहीं प्रेमी युगल प्रेम करते करते विवाह न कर बैठे !! . सलीम और मुगले आजम में इसीलिए ठन गयी थी कि सलीम अनारकली से निकाह करने पर अड़ गया था। यदि सलीम सिर्फ प्रेम तक सीमित रहता तो अकबर को कोई दिक्कत न थी। चाहे सलीम रोज नई अनारकली से प्रेम करें। . और सभी लैला-मजनूओं की दास्तानों का सार यही है। जब तक बात प्रेम तक सीमित है, तब तक जमाना अनदेखी करता है। पर जैसे ही जमाने को विवाह का अंदेशा होता, जमाना बीच में कूद जाता है। . यदि ज़माने को यह मुतमइन कर दिया जाए कि अमुक व्यक्ति सिर्फ प्रेम ही करेगा, और अपने प्रेमी से विवाह नहीं करेगा तो जमाना उसके प्रेम में बाधा नहीं बनता। उसे वह प्रेम करने की छूट दे देता है। . क्योंकि जमाना आपको अपनी सम्पत्ति के रूप में देखता है, और प्रेम से जमाने कोई साम्पत्तिक हानि नहीं होती। ज़माना चाहता है कि आप प्रेम किसी से भी करो और कितनो से भी करो, और करते रहो, किन्तु विवाह सिर्फ वहां करो जहाँ जमाना चाहता है। क्योंकि यदि आप जमाने के खिलाफ जाकर विवाह कर लेते है तो जमाने को लगता है कि उसने नियंत्रण खो दिया है। . ---------- . यही शर्त "राजनीति एवं चुनावी राजनीति" पर लागू होती है। . राजनीति में रुचि लेना, राजनैतिक विमर्श करना, जुलुस, प्रदर्शन, आन्दोलनो में हिस्सा लेना, सोशल मीडिया पर सरकार एवं राजनैतिक पार्टियों को कोसना आदि को जमाना (पेड मीडिया के प्रायोजक) निरापद प्रेम के रूप में देखता है। और जमाने को आपकी इस प्रेमल राजनैतिक रुचि से कोई ऐतराज नहीं। . जमाना सिर्फ इतना चाहता है कि -- जब चुनाव आये तो आप उनके द्वारा खड़ी की गयी पेड मीडिया पार्टियों (आरएसएस, कोंग्रेस, सपा, आपा, बसपा, अकाली आदि) को वोट देकर आ जाओ। बस !! . और वोट देने के बाद अगले 5 साल तक आप फिर से अपने अपने राजनैतिक प्रेम में खुद को व्यस्त कर सकते है। और ज़माना आपको कभी डिस्टर्ब करने नहीं आएगा। . जमाना (पेड मीडिया के प्रायोजक) सिर्फ इतना चाहता है कि आप जमाने द्वारा खड़ी की गयी पार्टियों के वोट काटने के लिए कोई नया राजनैतिक विकल्प खड़ा करने की दिशा में काम न करें। . यदि आपको नया राजनैतिक विकल्प चाहिए तो जमाना आपको नया राजनैतिक विकल्प (नवीनतम उदाहरण "आपा") बनाकर दे देगा। किन्तु कार्यकर्ता खुद से कोई राजनैतिक विकल्प खड़ा करने पर काम करे तो जमाने को ऐतराज है। . क्योंकि यदि मतदाताओं को पेड मीडिया पार्टियों के एजेंडे के खिलाफ काम करने वाला राजनैतिक विकल्प मिल जाता है तो जमाने द्वारा खड़ी पेड मीडिया पार्टियों को वोटो की हानि होगी। और वोट ही राजनैतिक जगत की वास्तविक सम्पत्ति है। . इस वजह से पेड मीडिया युवाओं को "चुनावी राजनीती" में आने से हतोत्साहित करता है। . राजनीती में रुचि लेने वाले ज्यादा से ज्यादा युवा यदि "चुनावी राजनीति" में आने लगेंगे तो चुनाव लड़ने वाले लोगो की संख्या बढ़ जाएगी। तब राजनीति से चुनावी राजनीति में शिफ्ट हुए ये कार्यकर्ता पेड मीडिया पार्टियों के खिलाफ नया राजनैतिक विकल्प खड़ा करने की दिशा में काम करने लगेंगे। . और युवाओं को चुनावी राजनीती में आने रोकने के लिए उन्होंने कितने कानूनी, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक लेंड माइन्स बिछा कर रखे है, इसे मैं लिखने जाऊँगा तो 1000 पृष्ठों में भी इसे समेटा नहीं जा सकता। . सार यह है कि -- कार्यकर्ताओ को "राजनीती एवं चुनावी राजनीति" के बीच के फर्क को समझना चाहिए। वे आपको राजनीति में रुचि लेने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करेंगे किन्तु चुनावी राजनीति में रुचि लेने से हतोत्साहित !! . -------- . और इस बात को अच्छे से नोट कर लें कि, जब भी कोई देश, समाज, राजनीति आदि की बात करने वाला कोई व्यक्ति या समूह इस मंशा से आपके पास आएगा कि आप राजनीती में रुचि ले किन्तु "चुनावी राजनीति" से दूरी बनाकर रखे तो वह हमेशा "जागरूक करने" की टर्म का इस्तेमाल करेगा !! . दरअसल, जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि - मैं लोगो को जागरूक कर रहा हूँ तो उसका उद्देश्य राजनीती में रुचि रखने वाले कार्यकर्ताओ को चुनावी राजनीति में आने से रोकना होता है। . और राजनीती में रुचि रखने वाले लोगो को चुनावी राजनीती में आने से रोकने की प्रक्रिया को कुछ भी कह कर नहीं पुकारा जा सकता। इसीलिए इसे वह "जागरूक करने की प्रक्रिया" कह कर पुकारता है। . ------------- . जिस प्रेम को विवाह से इनकार है वह क्या है ? . मुहब्बत जो डरती है -- अय्याशी है, गुनाह है : सलीम उवाच, मुगले आजम . सलीम अनारकली से मुहब्बत को मुगले आजम से छिपाने से इनकार कर देता है। क्योंकि सलीम अनारकली से शादी करना चाहता था। और इसीलिए वह जानता था कि वह कोई गुनाह नहीं कर रहा। विवाह गुनाह नहीं है। किन्तु वे सभी अपने प्रेम को गुनाह की तरह इसीलिए छिपाते है क्योंकि विवाह को लेकर उनमें संशय होता है। . ---------
#10 राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड यह कानून शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी की तर्ज पर सनातनी हिन्दुओं के लिए एक धार्मिक ट्रस्ट का गठन करता है। इस ट्रस्ट का नाम राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड (R.H.B.) होगा तथा इस ट्रस्ट का अध्यक्ष हिन्दू बोर्ड प्रधान कहलायेगा। राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड की मुख्य कार्यकारिणी में 1 प्रमुख एवं 4 न्यासियो सहित कुल 5 व्यक्ति होंगे। यह क़ानून सरकार द्वारा हथियाये जा चुके सभी देवालयों को भी सरकारी नियन्त्रण से मुक्त करता है। इस क़ानून को संसद से पास करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री इसे सीधे गेजेट में छाप सकते है। इस क़ानून का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें- Tinyurl.com/HinduBoard प्रस्तावित राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड क़ानून के मुख्य बिंदु निचे दिए गए है 1. प्रधानमंत्री एक अधिसूचना जारी करके राम जन्म भूमि देवालय, अयोध्या का स्वामित्व हिन्दू बोर्ड को सौंपेंगे। इसके अलावा हिन्दू बोर्ड उन सभी देवालयों का भी प्रबंधन करेगा जिन्हें किसी मंदिर के मालिको ने इसे स्वेच्छा से सौंप दिया है। 2. बोर्ड उन देवालयों का अधिग्रहण / प्रबंधन नहीं करेगा जिनकी देख-रेख देवालय के मालिक RHB से नहीं कराना चाहते। हिन्दू बोर्ड प्रधान और न्यासी अपने नियंत्रण में मौजूद देवालयो को प्राप्त हुए दान को इस तरह खर्च करेंगे कि सनातन संस्कृति का सरंक्षण हो। 3. भारत में निवास करने वाला प्रत्येक हिन्दू इस बोर्ड का वोटिंग मेम्बर बन सकेगा। यहाँ हिन्दू से आशय है उन सभी समुदायों, पन्थो, सम्प्रदायों के अनुयायी जो स्वयं को हिन्दू या सनातनी या सनातनी हिन्दू कहते है। 4. इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी एवं अन्य धर्म जो भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उत्पन्न हुए है, के अनुयायी स्पष्ट रूप से इस क़ानून के दायरे से बाहर रहेंगे, एवं वे इस बोर्ड के वोटींग मेंबर नहीं बन सकेंगे। सभी प्रकार की मस्जिदे, चर्च, गुरुद्वारे, बौद्ध, जैन तीर्थ स्थल आदि हिन्दू बोर्ड के दायरे से बाहर रहेंगे। 5. यदि आप हिन्दू बोर्ड के सदस्य बनते है तो आपको एक वोट वापसी पासबुक मिलेगी ताकि आप हिन्दू बोर्ड प्रधान को बदलने के लिए स्वीकृति दे सके। 6. यदि हिन्दू बोर्ड प्रधान या उसके स्टाफ के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो मामले को सुनने और दंड देने की शक्ति जजों के पास न होकर हिन्दू नागरिको की जूरी के पास रहेगी। प्रत्येक मामले के लिए अलग से जूरी होगी और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जाएगी। वर्तमान हिन्दू मंदिरों में धन के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख या संप्रदाय प्रमुख द्वारा लिए जाते है, तथा इनका ही मंदिरों की संपत्ति के उपयोग पर पूर्ण नियंत्रण होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। मतलब आज का गुरु ही अगला गुरु नियुक्त करता है। आजीवन कार्यकाल होने के कारण यहाँ संपत्ति इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होता है, तथा इसका उपयोग तड़क-भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी किया जाता है। सिक्खों में अकाल तख्त के ग्रंथी चुन कर आते है, और सीमित कार्यकाल (4 वर्ष) होने के कारण वे फिर से चुन कर आने के लिए गुरूद्वारो में आए दान को परोपकारी कार्यों में खर्च करने पर अधिक भार देते है। हिन्दू बोर्ड क़ानून के आने से हिन्दू मंदिरों में भी इसी तरह का अपेक्षित सुधार आएगा। राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा अथर्ववेद Pg
*वैश्विक सत्ता की संरचना: विश्व बैंक नहीं, हथियार उद्योग असली शक्ति है* . *1. आज की दुनिया को समझने के लिए सबसे पहले यह भ्रम तोड़ना आवश्यक है कि वैश्विक लूट, गुलामी और नियंत्रण के पीछे केवल बैंक, वर्ल्ड बैंक, WHO, WTO या फार्मा इंडस्ट्री ही सबसे बड़ी शक्ति हैं। वास्तविकता यह है कि ये सभी संस्थाएं केवल ऊपरी ढांचा है* . *2. इन सभी के पीछे जो असली निर्णायक शक्ति काम करती है, वह है Weapon Industry (हथियार उद्योग) सत्ता का असली स्रोत पैसा नही बल्कि वह ताकत है जो बंदूक और बम के जरिए लागू की जा सके* *बिना हथियार कोई नियंत्रण नही* . *3. कोई भी देश, कोई भी साम्राज्य और कोई भी पूंजीवादी सत्ता बिना हथियारों के किसी दूसरे देश या समाज को नियंत्रित नहीं कर सकती* . *4. यदि किसी देश के पास अपने स्वयं के हथियार नहीं हैं, तो वह हमेशा किसी हथियार-संपन्न देश पर निर्भर रहेगा, और यही निर्भरता धीरे-धीरे राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गुलामी में बदल जाती है* . *5. बैंक पैसे छाप सकते हैं, संस्थाएं नियम बना सकती हैं, लेकिन उन नियमों को लागू कराने की शक्ति केवल हथियारों के पास होती है* *6 खनिज लूट: सबसे बड़ी और सबसे छिपी हुई लूट* . *6. दुनिया की सबसे बड़ी लूट खनिज संसाधनों में होती है—सोना, लिथियम, कोबाल्ट, यूरेनियम, तेल, गैस और कोयला* . *7. आधुनिक टेक्नोलॉजी, हथियार, इलेक्ट्रिक गाड़ियां और डिजिटल सिस्टम सभी इन्हीं खनिजों पर आधारित है* . *8. लेकिन इस लूट की खुली चर्चा कभी नहीं होती, क्योंकि खनिजों की लूट सीधे-सीधे हथियारों के दम पर कराई जाती है* . *9. जहां खनिज हैं, वहां या तो गृहयुद्ध कराया जाता है, या तख्तापलट, या फिर आतंकवाद और शांति मिशन के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप* *WHO, WTO, World Bank: असली खिलाड़ी नहीं, मोहरे है* . *10. WHO, WTO और World Bank जैसी संस्थाएं असल में छोटे-छोटे प्यादे हैं, जिन्हें आगे करके जनता को भ्रम में रखा जाता है* . *11. ये संस्थाएं हथियार उद्योग और उससे जुड़े पूंजीवादी परिवारों को कानूनी, नैतिक और बौद्धिक कवर देती है* . *12. असली निर्णय कहीं और होते हैं, और ये संस्थाएं केवल उन्हें लागू करने का जरिया बनती हैं* *पूंजीवादी परिवारों की रणनीति* . *13. यदि कोई व्यक्ति खुद को एक बार किसी बड़े पूंजीवादी परिवार के नजरिये से देखे, तो पूरी रणनीति साफ दिखने लगती है* . *14. वे कभी भी सबसे बड़ी लूट को चर्चा में नहीं आने देते* . *15. वे जानबूझकर छोटी-मोटी लूट, छोटे घोटाले और सीमित मुद्दों को इतना फेमस कर देते हैं कि जनता वहीं उलझ कर रह जाए* . *16. भारत जैसे गुलाम या अर्ध-गुलाम देशों में बैंक घोटाले, फार्मा माफिया और NGO स्कैंडल को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है* . *17. ये मुद्दे गलत नहीं हैं, लेकिन ये मुख्य मुद्दा नहीं है* . *असली मुद्दा क्या है* *18. असली मुद्दा है हथियार उद्योग, खनिज लूट, राजनीतिक नियंत्रण* . *19. इसी त्रिकोण के दम पर पूरी दुनिया की सत्ता संरचना खड़ी है* . *ध्यान भटकाने का पूरा नेटवर्क* *20. खनिज लूट का एक छोटा-छोटा हिस्सा जानबूझकर अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है* . *21. इसमें बड़े राजनीतिक दल, उनकी IT सेल, टॉप लेवल के जज और नकली विपक्षी संगठन शामिल होते हैं* . *22. कुछ तथाकथित क्रांतिकारी NGO और एक्टिविस्ट ग्रुप भी इसी सिस्टम का हिस्सा बना दिए जाते हैं* . *सभी मिलकर आम जनता का ध्यान असली लूट से हटाते है और Conspiracy Theories को बढ़ चढ़ कर बढ़ावा देते है ताकि लोगो का ध्यान सही और उचित समाधान से भटका सके* . *24. कई बार जानबूझकर अधूरी और अजीब conspiracy theories को फैलाया जाता है* . *25. इसका उद्देश्य लोगों को भ्रमित करना, डराना और राजनीति से दूर रखना होता है* . *26. ताकि ईमानदार लोग चुनाव लड़ने की बजाय केवल बहस और आलोचना तक सीमित रह जाएं* . *चुनाव से डर क्यों* *27. पूंजीवादी परिवारों का सबसे बड़ा डर यही है कि यदि ईमानदार और समझदार लोग बड़ी संख्या में चुनाव लड़ने लगेंगे, तो उनका पूरा खेल खत्म हो जाएगा* . *28. क्योंकि तब हथियार उद्योग पर सवाल उठेंगे* . *29. खनिज लूट पर सख्त कानून बनेंगे* . *30. विदेशी नियंत्रण कमजोर पड़ेगा* . *31. जनता सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि सत्ता की असली मालिक बनेगी* . *निष्कर्ष* *32. दुनिया की असली समस्या बैंक नहीं है* . *33. दुनिया की असली समस्या WHO या WTO नहीं हैं* *34. दुनिया की असली समस्या है हथियार उद्योग के दम पर चलने वाली खनिज लूट और राजनीतिक गुलामी* *35. जब तक जनता इस सच्चाई को समझकर सत्ता में सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी, तब तक केवल चेहरे बदलते रहेंगे, सिस्टम नहीं* . *36. और जिस दिन यह समझ आम जनता तक पहुंच गई, उसी दिन पूंजीवादी परिवारों की सदियों पुरानी लूट की व्यवस्था हमेशा के लिए ढह जाएगी* *अब इस मे एक आम जनता क्या कर सकती है? इसके उत्तर मे सरल उपाय है की जो जो लोग बदलाव चाहते है वो आगे बढे चुनाव लड़े आपसी सहयोग बना कर चुनाव मे प्रचार करे, जनता मे अच्छे कानून ड्राफ्ट को प्रचार करके सत्ता की तरफ बढे, जितनी ऊर्जा हम धरना रैली मे लगाते है उसका केवल 10% ऊर्जा को चुनाव लड़ने पर थोड़ा जोर देंगे तो सरलता से जीत मिल सकती है और निष्पक्ष चुनाव के लिए बैलेट पेपर चुनाव बेहद जरूरी है क्योकि चुनाव प्रक्रिया ईमानदारी से नही हुई तो सत्ता मे पूंजीवादी परिवारों के गुलाम नेता बने रहेंगे और निरंतर पर्यावरण को क्षति होती रहेगी निर्दोष लोग मरते रहेंगे* RRPIndia.in Evmhatao.co
#06 विदेशी निवेश में कटौतियां संवेदनशील क्षेत्रो में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमती दिए जाने के कारण भारत में विदेशियों का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा है। यह कानून भारत के संवेदनशील क्षेत्रो में FDI पर रोक लगाकर सिर्फ सम्पूर्ण रूप से भारतीय नागरिको के स्वामित्व वाली कंपनियों की कारोबार करने की अनुमति देता है। कृपया ध्यान दें कि यह कानून सभी क्षेत्रो में FDI पर प्रतिबन्ध नहीं लगाता, बल्कि सिर्फ संवेदनशील क्षेत्रो में FDI पर निर्वन्धन लगाता है। इस कानून को संसद से साधारण बहुमत द्वारा पारित करके गेजेट में छापा जा सकता है। इस क़ानून का पूरा ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें Tinyurl.com/ReduceFDI प्रस्तावित विदेशी निवेश में कटौतियां क़ानून के मुख्य बिंदु निचे दिए गए है कोई भी कंपनी अपने आप को वोइक यानी सम्पूर्ण रूप से भारतीय नागरिको के स्वामित्व वाली कम्पनी (Woic = Wholly Owned by Indian citizens Company) के रूप में पंजीकृत करवा सकती है। वोइक कम्पनी से आशय ऐसी किसी कम्पनी से है जिसके 100% अंश (Share) भरतीय नागरिको या भारतीय सरकार या किसी अन्य बोइक कंपनी के पास हों, और अमुक कम्पनी के कोई भी शेयर विदेशियों के पास न हों। निचे दिए गए क्षेत्रो में सिर्फ बोइक कम्पनियां ही कारोबार करेगी। 1. सिर्फ वोइक कम्पनियां ही संचार एवं मीडिया के क्षेत्र में काम कर सकेगी। संचार एवं मीडिया में सभी पाठ्य, दृश्य, श्रव्य माध्यम जैसे अखबार, मैगजीन, चैनल्स, फ़िल्में, इंटरनेट सेवाएं, सोशल मीडिया एवं टेलिकॉम आदि शामिल है। 2. गैर वोइक कम्पनी को भारत में बैंक एवं बीमा कम्पनी खोलने या ऐसी कोई भी वित्तीय कम्पनी खोलने की अनुमति नहीं होगी जो जमाएं (Deposits) स्वीकार करती है। राष्ट्रियकृत बैंक (Nationalised Bank) सिर्फ बोइक कम्पनी को ही कर्ज दे सकेंगे। 3. सिर्फ वोइक कम्पनियां ही रेलवे, सेटेलाईट एवं रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में कार्य करेगी। रक्षा उत्पादन में हथियार निर्माण एवं सैन्य उपकरण शामिल है। 4. सिर्फ बोइक कम्पनी को ही खनन (Minerals) एवं ऊर्जा (Power) के क्षेत्र में काम करने की अनुमति होगी। 5. सिर्फ वोइक कम्पनियां ही शैक्षिक निकाय, शिक्षा बोर्ड, विद्यालय एवं विश्वविद्यालय खोल सकेगी। 6. गैर बोइक कम्पनी भारत में कोई भी भूमि एवं निर्माण नहीं खरीद सकेगी, और न ही इन्हें 25 साल से अधिक अवधि के लिए किराये पर ले सकेगी। 7. मॉरीशस संधि, फिजी संधि, सिंगापुर संधि एवं इस प्रकार की सभी संधिया जो विदेशी पूँजी पर कम दर से आयकर, या कम दर से पूंजीगत लाभ कर लगाती है, अब से निरस्त की जाती है। [टिप्पणी : यदि इस खंड की कोई धारा विश्व व्यापार संगठन (WTO) के किसी समझौते का उलंघन करती है तो WTO भारत को समझौते से बाहर कर सकता है, या प्रधानमंत्री भारत को WTO समझौते से अलग करने के लिए आवश्यक अधिसूचना जारी कर सकते है।] राजवर्ग प्रजा के अधीन रहना चाहिए, वर्ना वो प्रजा को लूट लेगा और राज्य का विनाश होगा - अथर्ववेद
*क्यों चुनावो में पार्टी के उम्मीदवारों को ही विजय मिलती है और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाती है, और कैसे यह व्यवस्था लोकतंत्र का गला दबाकर राजनीति में कुछ परिवारों का दबदबा बनाए रखती है, और कैसे इस समस्या को हल किया जा सकता है ?* . ==== . चुनावो की तारीख घोषित होने से लेकर प्रचार करने और मतदान होने तक की सारी प्रक्रियाएं लगभग एक माह के भीतर पूर्ण हो जाती है। मतदान के लिए सिर्फ एक दिन का वक्त होता है। आपको जो कुछ भी करना है इन कुछ दिनों में ही करना होता है। पार्टियो के पास संगठन होता है, सभी वार्डो, मुहल्लों, गाँवों, तहसीलों आदि में कार्यकर्ता होते है, और खर्च करने के लिए बेतहाशा रुपया होता है। इस तरह से इस तेज गति की दौड़ में बढ़त बना लेने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन होते है। उन्हें सिर्फ टिकेट लाना होता है। एक बार यदि टिकेट मिल जाए तो पार्टी के ये सभी संसाधन उसके हो जाते है। इस तरह से कोई नामालूम, निकम्मा, कमीना, भ्रष्ट और आपराधिक छवि का व्यक्ति भी अगर टिकेट ले आता है तो वह बिना कुछ किये ही चुनावी जीत का दावेदार हो जाता है। . जबकि किसी स्वतंत्र उम्मीदवार के पास इतना बड़ा सांगठनिक ढांचा, कार्यकर्ता और चुनाव लड़ने के लिए पैसा नहीं होता। और इतने कम समय में वह कितनी भी मेहनत करके इन्हें जुटा भी नहीं पाता है। इस तरह से संसाधन विहीन स्वतंत्र उम्मीदवार के लिए बराबर के मुकाबले के अवसर समाप्त हो जाते है। गुटबंदी और पैसा देकर प्रत्याशी टिकेट ले आते है और मतदाताओ को बाध्य होकर इन्हें ही चुनना होता है। . समस्या -- चुनाव प्रचार के लिए समय की कमी होने और मतदान के लिए सिर्फ एक दिन तय होने के कारण पूरी शक्ति प्रचार में झोंकनी होती है। सिर्फ इसी कारण से संसाधन युक्त पार्टी के उम्मीदवार अपनी बढ़त बना लेते है, और योग्य होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार पिछड़ जाते है। यदि निर्दलीय उम्मीदवार पार्टी खड़ी करने पर काम करेंगे तो उन्हें दशको लग जाएंगे। . ===== . समाधान : . १) मतदान अवधि की सीमा बढ़ाना --- यदि मतदान को 365 दिनों और 5 वर्ष के लिए खोल दिया जाए तो स्थिति पलट जायेगी। इससे कम संसाधन होने के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार बिना किसी संगठन के भी धीमे धीमे अपना प्रचार करते रह सकते है। इससे उनके पास मतदाताओ तक पहुँचने के लिए पर्याप्त अवसर रहेगा। जब भी कोई मतदाता किसी उम्मीदवार से सहमत होता है, वह अपनी इच्छा से तब उसे वोट कर सकेगा। इस तरह से चुनाव पार्ट टाइम गतिविधि बन जायेगी और उम्मीदवारों को हड़बड़ी में अपने संसाधन नहीं झोंकने पड़ेंगे। . २) जिस तरह बैंक अपना काउंटर लेकर रोज हमारे मोहल्ले में आकर नहीं कहता कि आज कि आज अपना पैसा निकालो या जमा कराओ, और फिर अगले 5 वर्ष तक किसी प्रकार का लेनदेन नहीं होगा, उसी तरह से मतदान में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें ऐसी प्रक्रिया लागू करनी चाहिए जिससे जिस व्यक्ति के पास जब समय हो वो उस समय पटवारी कार्यालय या कलेक्ट्री में जाकर अपना वोटर कार्ड दिखाकर अपना वोट दे सके। इस व्यवस्था के आने से चुनाव आयोग को मतदान के लिए अपनी भारी भरकम मशीनरी नहीं लगानी होगी, तथा चुनावो का खर्च बच जाएगा। . ३) वोट वापिस लेने का अधिकार --- कई बार मतदाता धुँवाधार प्रचार की चपेट में आकर गलत उम्मीदवार चुन लेते है। लेकिन उनके पास अपना वोट बदल लेने का कोई मौका नहीं होता। किसी भी समय वोट करने के साथ ही मतदाता को अपना वोट बदलने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए। यदि किसी जनप्रतिनिधि के के मतों में एक निश्चित प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की जाए व किसी अन्य उम्मीदवार को एक वर्तमान प्रतिनिधि से अधिक मत मिल जाए तो अधिक मत वाला उम्मीदवार पद ग्रहण कर लेगा। इस व्यवस्था से मौजूदा प्रतिनिधियों पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव बना रहेगा। #वोट_वापसी_पासबुक #जूरी_कोर्ट . ________________ हमारे आंदोलन से जुड़ने ,आंदोलन के कार्यकर्ता बनने के लिए 98877 42837 पर संपर्क कर सकते हैं l
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