मैं और मेरे अह्सास
दुनियादारी
चाहता हूँ दुनिया की सभी रस्में तोड़ दूँ l
मंज़िल की राह ईश्वर की गली में मोड़ दूँ ll
रीति रिवाज के नाम पर कलंक है सब l
दुनियादारी के ढकोसलों को फोड़ दूँ ll
कोई छोटा कोई बड़ा सिर्फ इन्सां बने l
और दिलों से दिलों का रिश्ता जोड़ दूँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह