Hindi Quote in Poem by Abha Dave

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महाराणा प्रताप (9 मई 1540 - 19 जनवरी 1597) आज महाराणा प्रताप जी की जयंती पूरे देश में मनाई जा रही है। महाराणा प्रताप जी की वीरता और त्याग की गाथा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप जी का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप जी का जन्म उत्सव उनकी वीरता और स्वाभिमान का प्रतीक है, जो आज भी प्रेरणा प्रदान करता है।

महाराणा प्रताप जी मेवाड़ (राजस्थान) के सिसोदिया राजवंश के एक महान राजपूत योद्धा थे, जिन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार करने के बजाय आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने 1572 में गद्दी संभाली। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध और बाद में छापामार युद्ध नीति से उन्होंने मुगलों को कड़ी टक्कर दी और मेवाड़ के स्वाभिमान की रक्षा की।

महाराणा प्रताप द्वारा घास की रोटी खाने की कहानी उनके अदम्य साहस और मुगलों के सामने न झुकने के संकल्प का प्रतीक है। हल्दीघाटी युद्ध के बाद, जब वे जंगलों में थे, तब उन्होंने मुगलों से लड़ने के लिए राजसी सुख त्यागकर जंगली घास (कोदो/रागी) के बीजों से बनी रोटियां खाई थीं।

महाराणा प्रताप जी को सादर नमन करते हुए प्रस्तुत है श्याम नारायण पांडेय जी द्वारा रचित रचना 🙏 🙏

स्वर्गीय श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित "चेतक की वीरता" हल्दीघाटी के युद्ध पर आधारित कविता वीर रस की कालजयी रचना है, जो महाराणा प्रताप के अदम्य साहस, चेतक की स्वामी भक्ति और मेवाड़ के स्वाभिमान को दर्शाती है।

चेतक की वीरता
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रण-बीच चौकड़ी भर-भरकर,चेतक बन गया निराला था।
राणा प्रताप के घोड़े से,पड़ गया हवा को पाला था॥

गिरता न कभी चेतक-तन पर,राणा प्रताप का कोड़ा था।
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर,या आसमान पर घोड़ा था॥

था यहीं रहा अब यहाँ नहीं
वह वहीं रहा था यहाँ नहीं
थी जगह न कोई जहाँ नहीं
किस अरिमस्तक पर कहाँ नहीं

जो तनिक हवा से बाँग हिली,लेकर सवार उड़ जाता था।
राणा की पुतली फिरी नहीं,तब तक चेतक मुड़ जाता था॥

कौशल दिखलाया चालों में,उड़ गया भयानक भालों में।
निर्भीक गया वह ढालों में,सरपट दौड़ा करवालों में॥
फँस गया शत्रु की चालों में
बढ़ते नद-सा वह लहर गया
फिर गया गया फिर ठहर गया
विकराल वज्रमय बादल-सा
अरि की सेना पर घहर गया।

भाला गिर गया गिरा निसंग
हय घोड़ा टापों से खन गया अंग
बैरी समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग।

संकलन / प्रस्तुति
आभा दवे

चित्र गूगल से साभार 🙏

Hindi Poem by Abha Dave : 112024431
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