Hindi Quote in Quotes by Vedanta Life Agyat Agyani

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✧ बीज से ब्रह्मांड तक — जीवन का विज्ञान ✧

ईश्वर जीवन का सीधा विज्ञान है—

बीज से वृक्ष और फिर बीज।
यही ब्रह्मांड का खेल है।
बीज यात्रा में उतरता है,
वह रुकता नहीं—
वह सदैव गतिमान रहता है।
जीवन स्वयं एक यात्री है।
बीज अपने आप गति नहीं करता,
भले ही वह भूमि में पड़ा हो,
बारिश हो जाए—
पर जब तक उचित अवस्था न मिले,
उसमें गति नहीं आती।
जब धरती, जल, वायु और अग्नि—
पंचतत्व एक साथ संतुलित होते हैं,
तभी बीज अंकुरित होता है।
अग्नि केवल ताप नहीं है—
वह जीवन की छिपी हुई ऊर्जा है।
हर बीज में पंचतत्व और तीन गुण मौजूद हैं,
और उनके साथ चेतना भी विद्यमान है।
जब तत्व और गुण मिलते हैं,
तो चेतना एक जीव के रूप में प्रकट होती है।
फिर वही जीव पुनः विभाजित होता है,
और अंततः फिर से बीज बन जाता है।
अर्थात—
चेतना, गति और कार्य
पंचतत्व और त्रिगुण के माध्यम से
रूपांतरण करते हैं।
और अंत में—
सब कुछ फिर एक सूक्ष्म बीज में सिमट जाता है।
जब बीज के भीतर फिर पंचतत्व जुड़ते हैं,
तो गति पुनः आरंभ होती है।
बीज से बीज—
यही अस्तित्व की निरंतर गति है।
अस्तित्व स्वयं को विकसित करता है।
मनुष्य का बीज भी पुनः बीज बनता है,
जिसमें कुछ प्रयास मनुष्य का होता है,
और कुछ प्रकृति का।
दोनों के मिलन से नया जीवन उत्पन्न होता है।
यह मिलन ही प्रकृति का चुंबक है—
यही “काम” है।
शरीर अपनी शक्ति स्वयं पाता है,
अपना भोजन स्वयं ग्रहण करता है।
उसमें “मैं”, “तुम”, “वह”—
कुछ भी नहीं है।
यही जीवन का खेल है—
यही लीला है।
इसे समझना ही दर्शन है।
यह अद्भुत, अलौकिक और रहस्यपूर्ण खेल है,
जिसे देखने और समझने में आनंद बरसता है।
जो देख रहा है—
वह भी उसी की व्यवस्था है।
और जो दिख रहा है—
वह भी वही है।
“मैं” बीच में आकर
अहंकार बन जाता है,
और एक दीवार खड़ी कर देता है।
यही सबसे बड़ी रुकावट है।
इस खेल को समझना ही धर्म है।
स्वभाव को देखना और समझना ही धर्म है।
जीवन का यह खेल—
अद्भुत, रहस्यमय और रसपूर्ण है।
यही जीवन है,
यही आनंद है,
यही प्रेम है।
जब “कर्ता” हट जाता है,
तो देखने वाला ही आनंद बन जाता है।
और फिर वही ऊर्जा—
तुम्हारे माध्यम से कार्य करती है।
धर्म का अर्थ है—
“मैं” को हटा देना।
“मैं” हटते ही—
सब कुछ एक खेल बन जाता है।
धर्म का कार्य है—
आंख खोलना,
और अज्ञान का संकट समाप्त करना।
लेकिन समाज के लिए—
धर्म एक व्यवस्था भी है।
भीड़ को संभालने के लिए
नियमों की आवश्यकता होती है।
यदि केवल एक व्यक्ति होता,
तो धर्म की कोई आवश्यकता नहीं थी।
धर्म भीड़ को नियंत्रित करता है,
ताकि “मैं-मैं” और “तू-तू” का संघर्ष न हो,
और एक प्रकार की शांति बनी रहे।
परंतु—
जो शांति बनाए रखने वाले हैं,
वही कभी-कभी अशांति के कारण भी बन जाते हैं।
धर्म भय भी पैदा करता है—
अच्छा-बुरा, सही-गलत के नाम पर।
और यहीं से विभाजन शुरू होता है:
मैं हिंदू,
तू मुस्लिम।
पर यह विभाजन भी
भौगोलिक और परिस्थितिजन्य है।
अलग-अलग स्थानों,
अलग-अलग जलवायु और परिस्थितियों के कारण
अलग-अलग धर्म और व्यवस्थाएँ उत्पन्न हुईं।
जहाँ जैसी आवश्यकता थी,
वैसा धर्म बना।
यदि पूरी पृथ्वी की परिस्थितियाँ एक जैसी होतीं,
तो शायद धर्म भी एक ही होता।
पर विविधता है—
इसलिए धर्म भी अनेक हैं।
आज जब सब मिल गए हैं,
तो पुराने भौगोलिक नियमों को पकड़ना ही
संघर्ष का कारण बन रहा है।
फिर भी—
समाज के लिए
कुछ नियम आवश्यक हैं।
पर सत्य नियमों में नहीं है।
सत्य—
उस जीवन में है
जो हर क्षण स्वयं को जन्म देता है

Hindi Quotes by Vedanta Life  Agyat Agyani : 112019337
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