ऋगुवेद सूक्ति-- (२३) की व्याख्या
मंत्र — ऋग्वेद १/१०४/९
“पितेव नः शृणुहि हूयमानः …”
पदच्छेद--
पितेव — नः — शृणुहि — हूयमानः
शाब्दिक अर्थ--
पितेव = पिता के समान
नः = हमारी
शृणुहि = सुनो
हूयमानः = पुकारे जाने पर
अर्थ-- हे प्रभु! पिता की भाँति हमारी पुकार सुनो।
यहाँ साधक और परमात्मा का सम्बन्ध पिता पुत्र का दिखाया गया है।
अन्य वेदों में भी इस भाव का प्रमाण मिलता है।
१. यजुर्वेद
(३६/१८)
“मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्”
अर्थ — हम सब प्राणियों को मित्रभाव से देखें और परमात्मा हमें कृपादृष्टि से देखें।
यहाँ ईश्वर का भाव रक्षक और मित्र का है, जो पिता के समान करुणामय है।
(४०/८ — ईशावास्य उपनिषद् मंत्र)
“स पर्यगाच्छुक्रमकायम्…”
अर्थ — वह परमात्मा सर्वव्यापक, शुद्ध और पापरहित है।
ऐसा सर्वव्यापक परमात्मा ही सबका आधार-पिता है।
२. सामवेद
सामवेद में ऋग्वैदिक मंत्रों का ही गान है। अनेक स्थानों पर इन्द्र एवं अन्य देवताओं को पुकारते हुए “सखा”, “पिता” समान संबोधन मिलता है।
उदाहरण —
“त्वं न इन्द्र पितेव नः”
हे इन्द्र! आप हमारे पिता के समान रक्षक बनें।
यहाँ भी वही वात्सल्य भाव है।
३. अथर्ववेद
(१९/६७/१)
“त्वं हि नः पिता वसो…”
अर्थ — हे प्रभो! आप हमारे पिता हैं, आप ही हमें धन-संपदा एवं संरक्षण प्रदान करते हैं।
(१०/८/४४)
परमात्मा को समस्त जगत का जनक एवं आधार कहा गया है।
अथर्ववेद में ईश्वर को प्रत्यक्ष रूप से “पिता” कहा गया है, जो ऋग्वेद के उक्त मंत्र की भावना को पुष्ट करता है।
निष्कर्ष--
चारों वेदों में यह सिद्ध है कि —
परमात्मा रक्षक है
वह पिता समान करुणामय है।
उपनिषदों में प्रमाण :--
१. तैत्तिरीयोपनिषद् (३.१)
“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते…”
अर्थ — जिससे ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसमें स्थित रहते हैं और जिसमें लीन हो जाते हैं — वही ब्रह्म है।
जो सृष्टि का जनक है, वही वास्तविक अर्थ में सबका पिता है।
२. छान्दोग्योपनिषद् (६.२.१)
“सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्…”
अर्थ — हे प्रिय! यह सब पहले सत् (ब्रह्म) ही था।
समस्त जगत उसी एक सत्य से प्रकट हुआ — अतः वही सबका मूल कारण और पालक है।
३. श्वेताश्वतरोपनिषद् (६.१७)
“यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च…”
अर्थ — जो देवताओं का भी कारण है, वही समस्त जगत का स्वामी है।
जब देवताओं का भी कारण वही है, तो वह समस्त जीवों का परम जनक है।
४. मुण्डकोपनिषद् (१.१.७)
“यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च…”
अर्थ — जैसे मकड़ी अपने से जाल निकालती है और पुनः समेट लेती है, वैसे ही ब्रह्म से जगत की उत्पत्ति और लय होती है।
यह उपमा ब्रह्म को सृष्टिकर्ता और आधार-पिता के रूप में स्थापित करती है।
५. कठोपनिषद् (२.२.१३)
“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्…”
अर्थ — वह नित्य, चेतन और सबका नियन्ता है।
जैसे पिता परिवार का पालक और नियन्ता होता है, वैसे ही परमात्मा समस्त प्राणियों का पालक है।
भाव--
उपनिषदों में “पिता” शब्द प्रत्यक्ष हर स्थान पर न हो, परन्तु —
सृष्टिकर्ता, पालक,आधार
करुणामय, नियन्ता
इन सभी विशेषणों से वही भाव सिद्ध होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण--
१. (९.१७)
“पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः…”
अर्थ — मैं इस सम्पूर्ण जगत का पिता, माता, धारण करने वाला और पितामह हूँ।
यहाँ भगवान् स्वयं को जगत्-पिता घोषित करते हैं। यह “पितेव” भाव का प्रत्यक्ष समर्थन है।
२. (१४.४)
“अहं बीजप्रदः पिता”
अर्थ — हे अर्जुन! समस्त योनियों में जो भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उनका बीज देने वाला पिता मैं हूँ।
स्पष्ट रूप से परमात्मा को समस्त जीवों का पिता कहा गया है।
३. (९.१८)
“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्…”
अर्थ — मैं ही गति, भर्ता (पालनकर्ता), स्वामी, साक्षी, निवास, शरण और निष्काम मित्र हूँ।
“शरणं” और “सुहृत्” शब्द पिता के करुणामय संरक्षण को प्रकट करते हैं।
४. (१८.६६)
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज…”
अर्थ — सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा।
यह वही भाव है — जैसे बालक संकट में पिता को पुकारता है और पिता उसकी रक्षा करता है।
निष्कर्ष--
गीता में परमात्मा स्वयं को पिता कहते हैं।
वह बीज प्रदाता हैं।
वह शरणदाता और सुहृद् हैं।
इस प्रकार ऋग्वैदिक “पितेव नः शृणुहि” का भाव गीता में पूर्ण विकसित रूप में प्रकट होता है —
भक्त पुकारता है, और भगवान् पिता के समान उसकी रक्षा करते हैं।
महाभारत में प्रमाण--
१. भीष्मस्तवराज (अनुशासन पर्व)
श्लोक —
“त्वं पिता त्वं गुरुस्त्वं च
त्वं बन्धुस्त्वं परायणम्।
त्वं हि सर्वस्य लोकस्य
कर्ता धाता सनातनः॥”
अर्थ —
आप ही हमारे पिता हैं, गुरु हैं, बन्धु हैं और परम आश्रय हैं। आप ही इस सम्पूर्ण लोक के सनातन कर्ता और धारण करने वाले हैं।
यहाँ भगवान को प्रत्यक्ष रूप से पिता और परायण (अन्तिम शरण) कहा गया है।
२. शान्ति पर्व (नारायणीय उपाख्यान)
श्लोक —
“नारायणः परो देवः
नारायणः परं तपः।
नारायणः परं ब्रह्म
नारायणः परः पिता॥”
अर्थ —
नारायण ही परम देव हैं, वही परम तप और ब्रह्म हैं, और वही परम पिता हैं।
यहाँ “परः पिता” शब्द से ईश्वर को सर्वोच्च पिता कहा गया है।
३. उद्योग पर्व (विदुरनीति)
श्लोक —
“धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ —
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है, और धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा रक्षित होता है।
पुराणों में प्रमाण --
१. श्रीमद्भागवत महापुराण ११.५.४१
श्लोक —
“देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां
न किंकरो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं
गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥”
अर्थ —
जो पुरुष सम्पूर्ण भाव से शरण देने वाले भगवान् मुकुन्द की शरण में चला जाता है, वह देवताओं, ऋषियों, प्राणियों, संबंधियों और पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।
यहाँ भगवान को “शरण्य” (सबको शरण देने वाले) कहा गया है — जैसे पिता शरण देता है।
२. विष्णु पुराण--
१.१९.८५
श्लोक —
“त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।”
अर्थ —
हे प्रभो! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं; आप ही बन्धु और सखा हैं।
यहाँ परमात्मा को प्रत्यक्ष रूप से “पिता” कहा गया है।
यह प्रार्थना-श्लोक परम्परागत रूप से विष्णु-स्तुति में उद्धृत है।
३. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)
श्लोक —
“त्वं पिता त्वं च मे माता त्वं बन्धुस्त्वं च दैवतम्।”
अर्थ —
हे प्रभो! आप ही मेरे पिता, माता, बन्धु और देवता हैं।
4--देवी भागवत पुराण--
श्लोक —
“या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता…”
अर्थ —
जो देवी समस्त प्राणियों में मातृरूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार।
जब परमशक्ति को “जगत्-जननी” कहा गया है, तो वही शक्ति पिता-स्वरूप भी मानी गई है — जो सबकी रक्षक है।
पुराणों में —
परमात्मा को प्रत्यक्ष “पिता” कहा गया है।
उन्हें शरण्य (शरण देने वाले) और पालनकर्ता बताया गया है।
स्मृति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
१. मनुस्मृति ७.१४४
श्लोक —
“पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥”
अर्थ —
बाल्यावस्था में पिता रक्षा करता है, युवावस्था में पति, और वृद्धावस्था में पुत्र।
यहाँ “पिता” को स्वाभाविक रक्षक कहा गया है। स्मृति-दृष्टि में रक्षण का यह आदर्श अंततः परमेश्वर में परिपूर्ण माना गया है।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३६७
श्लोक —
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्म का परमाधार परमात्मा हैं; अतः वही अंतिम रक्षक — पिता के सदृश।
३. पराशर स्मृति १.२३ (भावानुसार)
श्लोक —
“कलौ केवलनामाध्येयं मुक्तिदं परमं स्मृतम्।”
अर्थ —
कलियुग में केवल भगवान का नाम ही परम मुक्तिदायक कहा गया है।
यहाँ परमात्मा को संकट में अंतिम शरण बताया गया है।
४. नारद स्मृति (प्रथम अध्याय, भावानुसार)
नारद स्मृति में धर्म और न्याय को ईश्वरीय व्यवस्था बताया गया है।
जो समस्त धर्म-व्यवस्था का मूल है, वही परम नियन्ता और रक्षक है।
निष्कर्ष--
स्मृति-ग्रन्थों में —
“पिता” को स्वाभाविक रक्षक कहा गया है।
धर्म को रक्षणकर्ता बताया गया है।
परमात्मा को अंतिम शरण और मुक्तिदाता माना गया है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
१. विदुरनीति (महाभारत, उद्योग पर्व)
विदुर कहते हैं —
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
यहाँ धर्म को रक्षक कहा गया है। परमधर्मस्वरूप ईश्वर ही अंतिम रक्षक हैं — पिता के समान संरक्षण करने वाले।
२. चाणक्य नीति--
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः…
अर्थ — एक ही परम देव सब प्राणियों में स्थित है और सबका नियन्ता है।
३- नीतिशतकम् — भर्तृहरि
श्लोक —
“दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे॥”
भावार्थ —
जो परमात्मा देश-काल से परे, अनन्त चैतन्यस्वरूप और शान्त हैं, उन्हें नमस्कार है।
यहाँ परमात्मा को सर्वाधार, सर्वव्यापक चेतन सत्ता कहा गया है — वही समस्त जीवों का आधार-पिता है।
४-. हितोपदेश--
श्लोक —
“सर्वेषामेव भूतानां हितं यः साधुचिन्तयेत्।
वाचि सत्यं दया हृदि स पिता स च बान्धवः॥”
भावार्थ —
जो सब प्राणियों का हित चाहता है, जिसकी वाणी सत्य और हृदय दयालु है — वही सच्चा पिता और बन्धु है।
यह श्लोक पिता के लक्षण बताता है — दया और हितचिन्तन। यही गुण परमात्मा में परिपूर्ण रूप से हैं।
५- पंचतंत्र--
श्लोक —
“धर्मो रक्षति रक्षितो हन्ति धर्मो हतः।”
भावार्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्मस्वरूप परमात्मा ही अंतिम रक्षक हैं — जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है।
६- योगवसिष्ठ--
श्लोक —
“चिदाकाशो हि भगवान् सर्वभूतहिते रतः।
स्वभावादेव भूतानां पालयत्यखिलं जगत्॥” (भावानुसार)
भावार्थ —
चैतन्यस्वरूप भगवान् स्वभाव से ही सब प्राणियों के हित में रत हैं और सम्पूर्ण जगत का पालन करते हैं।
यहाँ स्पष्ट है — परमात्मा स्वभावतः पालक और हितैषी हैं, जैसे पिता।
निष्कर्ष--
इन आर्ष ग्रन्थों में —
परमात्मा को सर्वभूतहितकारी कहा गया है।
धर्म और दया को रक्षणकारी बताया गया है।
ईश्वर को पालक और आधार के रूप में निरूपित किया गया है।
इस प्रकार ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि” का भाव —
करुणामय, हितैषी, रक्षक-पिता — आर्ष एवं नीति-साहित्य में भी पुष्ट होता है।
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