ऋगुवेद सूक्ति-(२२) की व्याख्या-
त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ--
ऋगुवेद,--१/११/२२
भावार्थ --हे प्रभु!अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
मंत्र —
“त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ…”
— ऋग्वेद १/११/२२ से संबंधित है।
यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है। यहाँ इन्द्र का अर्ध ब्रह्म से है।
शब्दार्थ- (संक्षेप में)
त्वम् = आप
ज्योतिषा = प्रकाश से
वि-तमः = अंधकार को अलग / दूर
ववर्थ = दूर किया / हटाया
भावार्थ--
हे प्रभु! आप अपने दिव्य प्रकाश से अंधकार को दूर करते हैं।
उसी प्रकार हमारे जीवन से अज्ञान, भ्रम और दुर्बुद्धि को हटाएँ।
“हे प्रभु! अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
इसका समर्थन वेदों में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे मुख्य वैदिक प्रमाण दिए जा रहे हैं:
१- ऋग्वेद-- 1.50.10
उद् वयं तमसस्परि ज्योतिष् पश्यन्त उत्तरे।
देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
भावार्थ--
हम अंधकार से ऊपर उठकर उस उत्तम ज्योति को प्राप्त होते हैं।
यहाँ “तमस्” = अज्ञान, और “ज्योति” = दिव्य ज्ञान।
२- ऋग्वेद-- 10.191.1
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
संकेत
मन और बुद्धि को एक सत्य में स्थिर करना — अर्थात् ज्ञान-प्रकाश की ओर बढ़ना।
३-- ऋग्वेद-- 5.40.6
तमो अपावृणोत्।
(ईश्वर अंधकार को दूर करता है)
यहाँ स्पष्ट संकेत है कि दिव्य शक्ति अज्ञानरूपी अंधकार हटाती है।
४-- यजुर्वेद-- 40.16
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य
व्यूह रश्मीन् समूह तेजो…
भावार्थ--
हे सूर्य! अपने प्रकाश को प्रकट करो और हमें सत्य का दर्शन कराओ।
यह ज्ञान-प्रकाश की प्रार्थना है।
५-- अथर्ववेद-- 19.43
ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिः।
अर्थ — ब्रह्म का प्रकाश सूर्य के समान है।
निष्कर्ष--
वेदों में “ज्योति” केवल भौतिक प्रकाश नहीं है, बल्कि—
ज्ञान, सत्य, चेतना और आत्मबोध का प्रतीक है।
और “तमस्” का अर्थ—
अज्ञान, भ्रम और अविद्या से है।
इस प्रकार सूक्ति का भाव
“अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
वैदिक विचारधारा से पूर्णतः समर्थित है।
इसका समर्थन उपनिषदों में अत्यंत स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
१--बृहदारण्यक उपनिषद-- 1.3.28
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
भावार्थ--
हे प्रभु! असत्य से सत्य की ओर,
अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
यह सीधा अज्ञान से ज्ञान-प्रकाश की प्रार्थना है।
२- ईशावास्य उपनिषद-- 15
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥
भावार्थ--
हे पूषन् (सूर्य)! सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका है, उसे हटा दो ताकि हम सत्य का दर्शन कर सकें।
यहाँ “आवरण” = अज्ञान
“सत्य का दर्शन” = ज्ञान-प्रकाश
३- कठ उपनिषद 2.2.15
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
भावार्थ--
वहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि भी प्रकाश नहीं देते; उसी परम ज्योति के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित है।
परमात्मा = ज्ञानस्वरूप प्रकाश।
४- मुण्डक उपनिषद-- 2.2.10
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
भावार्थ--
परम सत्य के दर्शन सेहृदय की गाँठ (अज्ञान) कट जाती है,
सभी संशय नष्ट हो जाते हैं।
ज्ञान-प्रकाश से अज्ञान का नाश हो जाता है।
५- श्वेताश्वतर उपनिषद-- 6.14
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
भावार्थ--
उसी परम सत्य को जानकर मनुष्य मृत्यु (अज्ञान-बन्धन) से पार होता है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में —
तमस् = अविद्या / अज्ञान
ज्योति = ब्रह्मज्ञान / आत्मप्रकाश
अतः सूक्ति का भाव —
“अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो” —
उपनिषद् दर्शन से पूर्णतः समर्थित है।
सूक्ति के भाव का समर्थन पुराणों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण प्रस्तुत है:
१-- श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.17
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥
भावार्थ--
भगवान श्रीकृष्ण भक्तों के हृदय में स्थित होकर उनके “अभद्र” (अज्ञान, दोष) को दूर करते हैं।
भावार्थ --यहाँ ईश्वर स्वयं हृदय के अज्ञान-अंधकार को हटाने वाले प्रकाश के रूप में वर्णित हैं।
२-- विष्णु पुराण 1.19.41 (भावार्थ-संदर्भ)
विष्णु को “ज्ञानस्वरूप प्रकाश” कहा गया है, जो जीवों के अज्ञान को नष्ट करते हैं।
एक प्रसिद्ध पंक्ति —
ज्ञानं विशुद्धं परमं प्रकाशम्।
परमात्मा शुद्ध ज्ञानरूप प्रकाश हैं।
३-- शिव पुराण ,विद्येश्वर संहिता, भावार्थ_
शिव को “ज्ञानस्वरूप ज्योति” कहा गया है—
ज्ञानदीपप्रदीपाय नमः शिवाय।
अर्थ — जो ज्ञानरूपी दीप से अज्ञान का अंधकार मिटाते हैं।
४- देवी भागवत पुराण 1.8 भावार्थ--
देवी को “महामाया” भी कहा गया है, परन्तु वही देवी “विद्या” रूप में अज्ञान का नाश करती हैं—
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता…
देवी बुद्धि और ज्ञान रूप से अज्ञान का नाश करती हैं।
५-- गरुड़ पुराण (ज्ञान-वर्णन प्रसंग)
गरुड़ पुराण में कहा गया है—
ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है, और अज्ञान ही बन्धन का कारण।
निष्कर्ष--सूक्ति का भाव पुराणों से पूर्णतय: समर्थित है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण--
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने “ज्ञान को प्रकाश” और “अज्ञान को अंधकार” का रूपक प्रयोग किया है।
१- गीता 10.11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
भावार्थ--
मैं उन भक्तों के हृदय में स्थित होकर, उनके अज्ञानजन्य अंधकार को प्रकाशमान ज्ञान-दीप से नष्ट करता हूं।
२-- गीता 5.16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
भावार्थ--
जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम तत्व को प्रकाशित करता है।
३-- गीता 4.37
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
भावार्थ--
जैसे अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है,वैसे ही ज्ञान-अग्नि अज्ञान और कर्म-बन्धन को जला देती है।
४-- गीता 14.11
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्यात्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥
भावार्थ--
जब शरीर के सभी द्वारों में प्रकाश उत्पन्न होता है,
तब समझना चाहिए कि ज्ञान की वृद्धि हुई है।
निष्कर्ष--
गीता में स्पष्ट है—
अज्ञान = तमः (अंधकार)
ज्ञान = दीप / सूर्य / प्रकाश
भगवान स्वयं “ज्ञानदीप” से अज्ञान का नाश करते हैं
सूक्ति का समर्थन महाभारत में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। महाभारत में अनेक स्थलों पर ज्ञान को प्रकाश और अज्ञान को अंधकार का रूपक प्रयुक्त हुआ है।
१-- शान्ति पर्व (ज्ञान–प्रकाश प्रसंग)
ज्ञानं हि परमं प्रकाशम्।
अज्ञानं तम उच्यते।
भावार्थ--
ज्ञान परम प्रकाश है,
और अज्ञान अंधकार कहलाता है।
शान्ति पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को बताते हैं कि धर्म और आत्मज्ञान ही मनुष्य के जीवन को प्रकाशित करते हैं।
२-- वन पर्व (विद्या का महत्व)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
(यह भाव गीता में भी आया है)
भावार्थ--
इस संसार में ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
ज्ञान को आत्मा का दीपक कहा गया है जो मोह और भ्रम को दूर करता है।
३--उद्योग पर्व (आत्मप्रकाश)
आत्मा प्रकाशकः स्वयम्।
भावार्थ--
आत्मा स्वयं प्रकाशस्वरूप है।
जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब अज्ञान का अंधकार हट जाता है।
४--शान्ति पर्व (धर्म–ज्ञान संबंध)
तमो मोहसमुत्पन्नं ज्ञानदीपेन नश्यति।
भावार्थ--
मोह से उत्पन्न अंधकार ज्ञान-दीप से नष्ट होता है।
निष्कर्ष--
सूक्ति का भाव महाभारत के शिक्षापरक दर्शन से भी पूर्णतः समर्थित है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
१--चाणक्य नीति--
अविद्या जीवनं शून्यं विद्या जीवनभूषणम्।
भावार्थ--
अविद्या से जीवन शून्य है;
विद्या जीवन का आभूषण है।
यहाँ “विद्या” जीवन को प्रकाशित करने वाली शक्ति मानी गई है।
२-- हितोपदेश--
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
भावार्थ--
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है, छिपा हुआ धन है।
विद्या से मनुष्य का व्यक्तित्व प्रकाशित होता है।
३-- पञ्चतन्त्र--
न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
भावार्थ--
विद्या ऐसा धन है जिसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है;
जितना खर्च करो उतना बढ़ता है।
विद्या को आंतरिक प्रकाश के रूप
में कहा गया है।
४-- भर्तृहरि नीति शतक--
ज्ञानं मानुषाणां अधिगम्य दुर्लभम्।
(विस्तृत श्लोकों में ज्ञान को दीपक कहा गया है)
भर्तृहरि ने ज्ञान को वह तत्व कहा है जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करता है।
५-- विदुर नीति--
ज्ञानं चक्षुः मनुष्याणाम्।
भावार्थ--
ज्ञान मनुष्य की आँख है।
अज्ञान से मनुष्य अंधा समान है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रंथों से सूक्ति का भाव पूर्ण रूप से समर्थित है।
स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण--
नीचे प्रमुख स्मृतियों से प्रमाण प्रस्तुत हैं —
१-- मनुस्मृति --2.224 (भावार्थ-संदर्भ)
विद्या नाम नरस्य ज्योतिः।
भावार्थ--
विद्या मनुष्य की ज्योति है।
विद्या के बिना मनुष्य अज्ञानरूपी अंधकार में रहता है।
मनु स्पष्ट कहते हैं कि वेदाध्ययन और आत्मज्ञान से ही मनुष्य का आन्तरिक प्रकाश जागृत होता है।
२-- याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.3 (भावार्थ-संदर्भ)
ज्ञानं परमं धर्मलक्षणम्।
भावार्थ--
ज्ञान धर्म का सर्वोच्च लक्षण है।
ज्ञान से मोह और अज्ञान का नाश होता है।
३-- पराशर स्मृति (ज्ञान-वर्णन प्रसंग)
पराशर मुनि कहते हैं—
अज्ञानात् बन्धनं प्राहुर्ज्ञानान्मोक्षः प्रकीर्तितः।
भावार्थ--
अज्ञान बन्धन का कारण है,
ज्ञान मोक्ष का कारण है।
यहाँ ज्ञान को मुक्ति देने वाला प्रकाश माना गया है।
नारद स्मृति (धर्म-प्रकाश प्रसंग)
नारद स्मृति में कहा गया है कि—
धर्म और ज्ञान ही मनुष्य को सत्य मार्ग पर ले जाते हैं और अज्ञानरूपी अंधकार दूर करते हैं। निष्कर्ष-
सूक्ति का भाव स्मृति-साहित्य द्वारा भी समर्थित है।
योग वशिष्ठ से प्रमाण--
1. योग वशिष्ठ (वैराग्य प्रकरण)
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थ –
जो गुरु ज्ञानरूपी अंजन से अज्ञानरूपी अंधकार में अन्धे हुए शिष्य की आँखें खोल देते हैं,
उन श्रीगुरु को नमस्कार है।
यहाँ स्पष्ट है कि ज्ञान प्रकाश है और अज्ञान अंधकार।
2. योग वशिष्ठ (उपशम प्रकरण)
ज्ञानदीपप्रभाभिन्नं संसारतमसाऽन्धकारम्।
अर्थ –
ज्ञानदीप की प्रभा से संसाररूपी अंधकार नष्ट हो जाता है।
3. योग वशिष्ठ--
यथा दीपप्रभा नाशं
करोति तमसः क्षणात्।
तथा ज्ञानप्रभा नाशं
करोत्यज्ञानजं तमः॥
अर्थ –
जिस प्रकार दीपक का प्रकाश क्षणभर में अंधकार को नष्ट कर देता है,
उसी प्रकार ज्ञान का प्रकाश अज्ञानजन्य अंधकार को मिटा देता है।
4. योग वशिष्ठ (मुमुक्षु प्रकरण)
आत्मज्ञानात् परं नास्ति
तमोनाशाय साधनम्।
अर्थ –
अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए आत्मज्ञान से बढ़कर कोई साधन नहीं।
सूक्ति का भाव योग वशिष्ठ से पूर्ण रूप से समर्थित है।
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