नाना-नानी का घर बहुत बड़ा नहीं था, पर उसमें दिल भर देने वाली जगह थी। कच्चा आँगन, मिट्टी की खुशबू और सुबह-सुबह चूल्हे का धुआँ। मामा-मामी का अपनापन, नानी की मीठी डाँट, नाना की शांत मुस्कान— सब कुछ सादा, पर सच्चा। वो गाँव, वो गलियाँ, जहाँ शोर नहीं, सुकून रहता था। आज भी यादों में वही छोटा सा घर सबसे बड़ा लगता है।
- Prithvi Nokwal