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New bites

Good Morning 🌅

harshparmar8722

- लफ़्ज़ों की बंदिशों से परे -

लफ़्ज़ों की बंदिशों से परे एक राब्ता है तुमसे,
जैसे सदियों पुराना कोई वास्ता है तुमसे।

धुंधली सी इस दुनिया में जब खुद को खोता हूँ,
तेरी यादों के अक्स में ही तसल्ली पाता हूँ।

ज़िंदगी की इस मसरूफ़ियत में भी एक ठहराव हो तुम,
मेरी हर अनकही दुआ का खूबसूरत जवाब हो तुम।

वक्त भले ही रेत की तरह फिसल जाए हाथों से,
मगर तुम्हारा अहसास रूह में महकेगा सांसों से।

-MASHAALLHA

mashaallhakhan600196

बेरहम होकर के समंदर
हर चीज को नीगल लेता हैं।
पलभर अपनें पास में रखकर
पलभर में फिर उगल देता हैं।

गजेंद्र

kudmate.gaju78gmail.com202313

चिराग जला लेता हूँ
आफताब बुझा करके

पुराना दर्द भुल जाते हैं हम
नया दर्द दिल में बसा करके के

चिरागों की सोहबत में रहते हो शायद
उजाला रख जाते हो मेरी दहलीज पे मुस्कूरा करके

अश्कों से सिंचता हूँ रोज सुबह ओ शाम
जख्मों को रखता हूँ मैं हरा भरा करके

मत मचाओ शोर ऐ जहान वालों
बस अभी सोया है दर्द मुझको रुला करके

ferojkhan.536289

उसने पुराने जख्म कुरेदें हैं
गुजरा दर्द जगाया है

हंसाने वाले तूने आज हमें
जार जार रुलाया है

क्यूँ रखते खाली कमरा दिल का
एक दर्द को बैठाया है

मैं यहीं का यहीं रह गया
परिंदा आसमां फिर आया है

आखिर निजात मिली सियाह रातों से
जहाँ में सुरज उग आया है

ferojkhan.536289

अश्कों का सैलाब है
दर्द बेहिसाब है

किनारा नहीं है
मेरे डुबने की बात है

तारें गिनना मेरा शौंक है
जागने की रात है

दम घुट रहा है
कोई टीस सांसों के पास है

करीब आकर मेरा दिल बहलाओं
ये दिल बड़ा उदास है

क्यूं उन पर भरोसा कर लिया
खंजर उनके पास है

ferojkhan.536289

सस्ती सांसें
महंगा खंजर

सुनसान रास्ते पे
डरा सिकंदर

बोल सिंकदर
जीता के हारा

कहता है
अपनों ने मारा
अपनों से हारा

ferojkhan.536289

जमानें की रस्मों को तोड़कर आई थी तुम
तोहफा मुस्कुहटों का लाई थी तुम

हमें तब से कुछ हो गया
जब पहली दफा मुस्कुराई थी

थे तनहा से हम जमानें में
जमाना जला जब नजदिक आई थी तुम

कोई अजाब न मुझको परेशां करें
ये दुआ लब पे लाई थी तुम

जल रहे थे हम जिस वक्त धुप में
मेरी छाँव बनकर आई थी तुम

ferojkhan.536289

कविता
दर्दनाक यादे

दर्दनाक यादव के साथ
आधी रात में आने वाले खौफनाक सपना
जिसे आंखों मैं आते ही लोग चिल्लाकर उठ जाते हैं



यह यादें उन दिनों की है जब हम
किसी के डर से छुपा करते थे
आंखें बंद कर लिया करते थे

और चाहते थे कि
हम कभी आंखें ही ना खोले
और यह पल बित जाए
या तो सब कुछ खत्म हो जाए

या तो उम्मीद होता कोई आए
और हमें बचा ले

उस राक्षस से जो हमें पीटने के लिए
हमारे पीछे पड़े हैं


और वही दर्द डर के साऐ अब तलक ख्वाबों में है
वह चिल्लाहट से गुजते हुए आवाज
वह सिकोड़ते हुए आंखें
वह डरावनी चेहरा

अभी भी ख्वाबों में आ जाता है
और फिर हमें उन्हीं दिनों में ले जाते हैं
जब हम सबसे दर्दनाक दिनों में थे


और डर घबराहट के मारे
हम पूरे जोर लगाकर वहां से भागते हुए
और खुद को जागते हुए
चिल्ला कर उठ परते हैं


एक बच्चे के ख्वाबों को हमेशा खुशनामा होना चाहिए

और उसी बच्चे की ख्वाब दर्दनाक होते हैं
उम्र बीतते हुए
वह दर्द वो डर कम होने की वजह
और भी बड़ जाते हैं


नहीं पता समय के बाद वह बच्चे वह व्यक्ति कैसे बन जाते हैं
पर सच यह है कि वह भरोसा करना छोड़ देते हैं


उसे अकेलापन खाता नहीं है
वह जिंदगी से थक जाते हैं
फिर भी जीते रहते हैं


वह खुद से बोड़ हो जाते हैं
फिर भी उनके सांसे चलते रहते हैं


उसे उम्मीद नहीं है किसी से
पर जरा सा उम्मीद
उस इत्तेफाक उस कायनात में है
जो हर किसी की लाइफ में एडजस्ट करता है



वह बुरी यादें के साथ कुछ बच्चे जीना सीख लेते हैं
तो कुछ बच्चे उन यादों से भागते रहते हैं
जिंदगी भर


हर रिश्ते से बचते रहते हैं
जिंदगी में आने वाले हर अचीवमेंट से दूर रहते हैं
यह सोचकर के उसे फिर दर्द ना हो


वह घाऊ जो कभी भरा ही नहीं
उसे कोई खोरोज कर बाहर ना निकल दे


वह बच्चा जो सब कुछ छुपा कर रखा है
ऐसा नहीं है
कि वह समय के साथ ताकतवर हो गया है
सच यह है कि वह अंदर से डरा और सहमा हुआ है


इस दुनिया से इस समाज से अपनों से
यादों से ख्वाबों से वह डरा हुआ है


और यह डर उससे हर रोज तिल तिल मार रहा है
ऐसा नहीं है कि
जो हुआ उसमें उस बच्चों की गलती थी


पर सच इस समाज को सुकारता हुआ नहीं बन रहा

वो बच्चे समाज से डर रहे हैं
और समाज सच से



और यह साइकिल जिंदगी भर चलता रहता है
उस समाज और बच्चे की जिंदगी में
कभी ना खत्म होने वाले दर्द
और कभी ना भरने वाले जख्म
और समाज के कभी ना समझने वाले नासमझ के साथ



गजल


भीड़ है फिर भी तनहा है
दर्द में डुवो वे लम्हा लम्हा है

आखिर अकेला कौन है
और कौन साथ किसका है

दर्द है तो आके कहते हो हम है ना
फिर चिंता किस बात का है
सब साथ सभी का है
तो आखिर में अकेला कौन है


आखिर अकेला कौन है

abhinisha

सुनो ना…

आज मासिक धर्म पर खुलकर
बात करते हैं...

सुनो ना…

आज उस ख़ामोशी को तोड़ते हैं,
जो हर महीने
एक औरत के दर्द को
शर्म के पर्दे में छुपा देती है।
ये कोई गुनाह नहीं,
ना ही कोई कमजोरी है,
ये तो प्रकृति की वो भाषा है
जिससे जीवन जन्म लेता है।
फिर क्यों फुसफुसाहट में
कहा जाता है इसका नाम..?

फिर क्यों निगाहें झुक जाती हैं,
और सवाल पूछना भी
गुनाह समझ लिया जाता है..?
पेट की ऐंठन,
मन की थकान,
और चेहरे पर मुस्कान ओढ़े
दुनिया निभा लेना...
क्या ये कम हिम्मत की बात है..?

सुनो ना…

आज सिखाओ बच्चों को
कि ये “गंदा” नहीं,
बल्कि “ज़रूरी” है।
आज कहो सबको
ये तो औरत होने की
सबसे सच्ची पहचान है।
चलो आज
खुलकर बात करते हैं,
क्योंकि जब बात होगी,
तभी समझ बढ़ेगी,
और जब समझ बढ़ेगी
तभी सम्मान मिलेगा...!!

एक सच्चाई है ये इस लिए सोच बदलो मर्दों ♥️♥️♥️♥️✍️✍️✍️✍️
❤️💯🔥✍️

mystory021699

कोई एक ऐसा भी है जो मेरी काबिलियत को समझ सका

थोड़ी ही मगर वो हमारी असलियत को समझ सका

दिल से धन्यवाद है उस इन्सान का

जो हमारी लिखावट को काफी लोगो तक पहुचाने की कोशिश कर सका ।
♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️♥️writer bhagwat singhnaruka ✍️

mystory021699

कान्हा…
अब थक गई हूँ हर बार खुद को समेटते-समेटते… 💔
तुम दूर जाते हो
और मैं फिर भी तुम्हारे लौट आने की दुआ करती हूँ…
शायद यही राधा का प्रेम है—
टूटकर भी सिर्फ कृष्ण को चाहना। 🌙
“अब दर्द भी तुम्हारा लगता है कान्हा,
और सुकून भी तुम ही हो…
कैसे छोड़ दूँ उस मोहब्बत को,
जिसमें मेरी पूरी रूह बसती हो…” 💙

parmarsantok136152

बुंदेली दोहा प्रतियोगिता -268
दोहा दिवस दिनांक-16.5.2026
प्रदत्त शब्द #अनयाव (अन्याय)
प्राप्त प्रविष्ठियां:-

1
मचा हुआ अन्याव है,अब तो चारों ओर।
कोई कुछ नइं कर रहा,मचा रहे बस शोर।।
*
- वीरेन्द्र चंसौरिया टीकमगढ़
2
हड़प रहे जांगा जमीं,करबैं निसदिन घात।
अनयाव राजई करें,कितै जोरबैं हात।।
*
-प्रदीप खरे 'मंजुल',टीकमगढ़
3
गय अतीक अनयाव कर , मर गय दुबें विकास ।
किलन चेंपला मूँत रय,देखो होगइँ नाश।।
*
-प्रमोद मिश्रा बल्देवगढ़
4
बड़े बड़े न्यालय बने, सिस्टम बड़ौ बनाव।
न्याव मिलो ना वक़्त पै, जौइ बड़ौ अनयाव।।
*
-अरविन्द श्रीवास्तव,भोपाल
5
छल अनीत अनयाव जे, औगुन के सब नाम।
कीरत माटी में मिलत, बुरै देत अंजाम ।।
*
-विद्या चौहान, फरीदाबाद
6
करौ काउ के संग में, जीनें भी अन्याव।
विपदा भोगी ओइ नें, करनी कौ फल पाव।।
*
- अंजनी कुमार चतुर्वेदी निबाड़ी
7
जब-जब असुरन नें करो, धरती पै अनयाव।
विविध रूप धर विस्नु नें,उनकौ मान घटाव।।
*
-गोकुल प्रसाद यादव, नन्हींटेहरी
8
सहो बिभीसन भाइ को, जब खूबइ अनयाव।
सरन गही सिरि राम की, कुल को नास कराव।।
*
-तरुणा खरे'तनु' जबलपुर
9
जीत रई नित न्याय की , हारत रय अनयाव।
सौ भाई सोए समर, कौरव के कुनयाव।।
*
-आचार्य रामलाल द्विवेदी प्राणेश,चित्रकूट
10
कभउॅ॑ किसी के स॑ग मे॑,करियौ नै अन्याव।
साजौ कोई ना बनै॑,बुरव न रखियौ ख्वाब ।।
*
-शोभारामदाॅ॑गी"इ॑दु,न॑दनवारा
11
जब तक जा धरती रहो,करियो मत अन्याव।
मूरत भूले सें कभी,बुरो न होय तुमाव।।
*
-मूरत सिंह यादव दतिया
12
मार -मार भाँनेज सब, कंश करौ अन्याव।
किशन जन्म लै जेल में ,मम्में मार गिराव।।
*
-एस आर 'सरल',टीकमगढ़
13
रचो चक्रव्यू द्रोण ने, भओ बड़ो अनयाव।
अभिमन्यू से शूर खों,जुर मिल मार गिराव।।
*
-आशा रिछारिया,निवाड़ी
14
राजा होके जो करत,जनता पै अनयाव।
रैयत ऊँकी जान लो, देत न ऊखों भाव।।
*
-सुभाष सिंघई, जतारा
© संयोजक राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'
आयोजक जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़

rajeevnamdeoranalidhori247627

झील से गहरे तुम्हारे दो नयन,
चाँदनी ओढ़े है सोने का बदन,
मैं तुम्हारे प्राण में हूँ इस तरह,
जैसे ही सुरभित चंदन का वन।

साँस मेरी तेरी साँसों से मिली,
ज्यूँ मिली फूलों से तितलियाँ,
मैं तुम्हारे रूप गंध में भींगा हुआ,
कर रहा भ्रमरों की तरह गुंजन ।

तुम बसी मेरे हृदय में इस तरह,
जैसे सागर में छिपी कोई लहर,
जैसे मोती हो छिपी हुई सीप में,
जैसे फूल पर बिखरी ओस कण।

प्रशस्त करती तुम मेरा पथ प्रिये,
प्राण को देती हो तुम आराम भी,
तुम मेरे दिल की हो धड़कन प्रिये,
तुम से ही विश्राम पाता मेरा मन ।


Das vijju,,,,,,,

dasvijuu

१. समानता बनाम दासता
​"सच्चा प्रेम समानता में जन्मता है, डर और दासता में नहीं।"
​भक्ति मार्ग में अक्सर एक दूरी पैदा कर दी जाती है—'भगवान ऊँचे आकाश में हैं और भक्त पाताल की धूल है।' लेकिन मित्रता इस दूरी को मिटा देती है। सुदामा द्वारिका के वैभव को देखकर डरे नहीं, और कृष्ण अपनी सत्ता के मद में अंधे नहीं हुए। जहाँ दो लोग पूरी तरह नग्न मन से, बिना किसी मुखौटे के एक-दूसरे के सामने खड़े हो सकें, वहीं सच्ची मैत्री है।
​२. सिंहासन का झुकना और पैर धोना
​कथा का सबसे सुंदर विश्लेषण यही है कि सबसे बड़ा दृश्य कोई चमत्कार (जैसे सुदामा की झोपड़ी को महल बना देना) नहीं था, बल्कि कृष्ण का सुदामा के पैर धोना था।
​यहाँ राजा, रंक के सामने झुक रहा है।
​यहाँ ऐश्वर्य, सादगी के सामने नतमस्तक है।
​यह इस बात का प्रमाण है कि प्रेम में कोई 'पदानुक्रम' (Hierarchy) नहीं होता।
​३. दृष्टि ही संबंध तय करती है
​"जो प्रेम से आया, उसके लिए वे मित्र हैं। जो भय से आया, उसके लिए भगवान बन गए।"
​यह बात श्रीमद्भगवद्गीता और कृष्ण के पूरे चरित्र को समझने की कुंजी है। कंस ने उन्हें भय से देखा, तो वे काल बन गए। शिशुपाल ने ईर्ष्या से देखा, तो वे शत्रु बन गए। गोपियों और अर्जुन ने उन्हें प्रेम और सखा भाव से देखा, तो वे उनके सारथी और प्रेमी बन गए। कृष्ण एक दर्पण की तरह हैं—आप उनके सामने जो भाव लेकर जाएंगे, आपको वही रूप दिखाई देगा।
​४. अद्वैत की सुगंध
​“कृष्ण जानते थे कि सुदामा भी मैं ही हूँ।”
​यही वेदांत का चरम बिंदु है। जब तक 'मैं' और 'तू' का भेद है, तब तक द्वैत है, भय है, याचना है। लेकिन जैसे ही यह बोध होता है कि "तत्वमसि" (वह तुम ही हो), वैसे ही माँगने की इच्छा समाप्त हो जाती है। सुदामा कृष्ण के पास कुछ माँगने नहीं गए थे, और कृष्ण ने भी बिना माँगे सब कुछ दे दिया, क्योंकि अपने ही दूसरे रूप (सुदामा) को अभाव में देखना कृष्ण के लिए खुद को अभाव में रखने जैसा था।
​निष्कर्ष
आपने बिल्कुल सही कहा कि बाद के युगों ने 'भय' मिश्रित भक्ति को बढ़ावा दिया क्योंकि डरे हुए व्यक्ति को नियंत्रित करना आसान होता है। लेकिन कृष्ण और सुदामा की यह कथा हमें याद दिलाती है कि अध्यात्म का अंतिम लक्ष्य दास बनना नहीं, बल्कि सखा बनकर उस परम चेतना के साथ एक हो जाना है। यह 'वेदांत २.०' की एक बहुत ही प्रगतिशील और सुंदर व्याख्या है।

bhutaji

अब ना पूछ कि इस दिल का हाल क्या होगा,
जो होना था वो हो गया, अब मलाल क्या होगा।

किनारे से ही देख ली हमने गहराई समंदर की,
डूब ही गए जो इसमें, तो फिर सवाल क्या होगा।

नजरें चुराकर वो हमसे मुस्कुराते हैं इस तरह,
खुदा ही जाने अब दिल का हश्र-ओ-मलाल क्या होगा।

शमां बुझ चुकी है, मगर धुआं अभी बाकी है,
इस बिखरी हुई महफिल का अब ख्याल क्या होगा।

चाहत में तेरी हम खुद को ही भूल बैठे हैं,
इससे ज्यादा मोहब्बत का और कमाल क्या होगा।

palewaleawantikagmail.com200557

यह पुस्तक “महाराणा: सहस्र वर्षों का धर्मयुद्ध” मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश द्वारा सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए लड़े गए 1000 वर्ष के निरंतर संघर्ष का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक बप्पा रावल से लेकर महाराणा प्रताप तक के योद्धाओं के अटूट साहस को रेखांकित करते हुए प्रचलित इतिहास लेखन में उपेक्षित नायकों के गौरवशाली इतिहास को उजागर करती है। यह पुस्तक इतिहास के प्रति एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है, जो हर पाठक के लिए आवश्यक है।

https://www.matrubharti.com/book/19993093/01

hindgaurav710743

आना कभी उस घाट पर,,, दिखायेंगे हम तुम्हे जहा कभी हम बैठा करते थे ।।,,,

वो वहां का नजारा,,, वहां की शांति और पक्षियो ं की मधुर आवाजे

जरा देखना उस सूरज की किरन को

वो पानी में दिखता हुआ उसका बिंब

ऐसा लगता हे जैसे कोई किसी को पल भर के लिए निहार रहा हो,,, ।।।।

और देखना उस पंछी को जो इक पल में मछली को अपनी चोंच में भर ले गया

वो लहर जो तुम्हारे कदमों को छुए कभी महसूस करना उस पानी को

वो घाट ओर उसपर रखी वो कुर्सी कभी बैठो तो महसूस करना उस हवा के झोंके को

आना कभी उस घाट पर दिखाएंगे हम तुम्हे जहा कभी हम बैठा करते थे,,,,, ।।।।।।।

Das Vijju,,,,,,





मुझे मारने को तरस रही है दुनिया।
जैसे बादल भी ना बरसे,
वैसे बरस रही है दुनिया।

आजकल कल का भूला रात को घर आ जाए
भूला ही कहां जाता है।
आंख से आंसू आ जाए तो,
दुख दर्द बड़ा ही जाता है।
दुख दर्द मिटाने को कोई आगे ना आए
मुझको ही मिटाना सब का निशाना होता जाए।
मुझे मिटाने को तरस रही है दुनिया

dasvijuu