Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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रोला छंद 
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उम्मीदों की ज्योति, सदा ही आप जलाना।
भ्रम  से  रहना  दूर,  व्यर्थ  बनना  दीवाना।
कहें  मित्र यमराज, नहीं  करना  मनमानी।
मंजिल  होगी  दूर,    याद  आयेगी  नानी।।

कपटी चलते चाल, सजा के मुख पर लाली।
होते  हैं   बेशर्म,       भले  ये  खाएँ  गाली।।
चाहे  जैसे  आप,      बचे  ही  मित्रों  रहना।
इनसे  रहिए  दूर,    मानकर  सुंदर  गहना।।

आया  है  बदलाव, दिवस  बालिका  मनाएँ।
दोषी आखिर कौन,  नाहक कयूँ गाना गाएँ।।
कहें  मित्र  यमराज,   दिखावा  पड़े न  भारी।
करिए   केवल  आप,    मान  दीजिए  नारी।।

करिए  नहीं  विवाद, आप  को  पड़े  न भारी।
नहीं  जानते  आप,    किए  वो  क्या  तैयारी।
कहें  मित्र  यमराज, जोश में  तुम  मत आना।
बिना किए तकरार, आप बस बचकर जाना।।

जीवन  का  विस्तार,     बहुत  पड़ता  है  भारी।
कर लो आप विचार, किया क्या निज  से यारी।
कहें  मित्र  यमराज,   समय  की  कैसी  लीला।
दिखता  हमको आज, चित्र सब  नीला-पीला।।

सबका अपना स्वार्थ, आज है सब पर भारी।
समय  देख  प्रतिघात,  करें  जमकर  गद्दारी।
कैसा  आया  दौर,        बढ़ी  नूतन  बीमारी।
और  एक  हैं  आप,  उतरती  नहीं  खुमारी।।

सबके अपने भाग्य, सभी की कर्म कमाई।
नाहक रहते आप, समय को व्यर्थ गँवाई।।
कहें मित्र यमराज, भरोसा खुद पर रखिए।
जो पाया है आज, प्रेम से  उसको चखिए।।

भले सुनो ना आप, मुझे बस कुछ कहना है।
क्या  है  कोई  पाप, नहीं  तुमको  सुनना है।
मेरा  क्या  है  जोर, कीजिए  अपने मन की।
पता  चला  है आज, मरी मानवता जन की।।

मानव कितना आज, मुखौटा  आप चढ़ाए।
चाहे  जितने  लोग,      घुमाएं    दाएँ- बाएँ।
कहें  मित्र  यमराज,   पड़ेगा  तुमको  भारी।
 होगा   पर्दाफाश,    मुफ्त  पाओगे  गारी।।

उम्र, समय का ज्ञान, भला होता है किसको।
धन  ना देता  साथ, हमेशा दँभ  है  जिसको।
जीवन  का ये  खेल, बड़ा  है  सदा  निराला।
करो  सदा  सम्मान, नहीं  मुँह होगा काला।।

कौन निभाता फ़र्ज़, आज का हम सब जाने। 
करते  बड़ा  गुनाह,  सत्य  को  जो  पहचाने। 
कहें  मित्र  यमराज, समय  का देखो  खेला। 
क्यों  करना है  आज, फ़र्ज़ को मारो ढेला।।       

निभा रहे हैं फ़र्ज़, महज है कुछ अपवादी। 
किस्मत  वाले  लोग, बाप दादा  या दादी। 
कहें मित्र यमराज, आप अपने इठलाओ। 
फ़र्ज़ निभाते लोग, शीश अपने बैठाओ।।      

व्यर्थ   निभाते  फ़र्ज़, आप  करते  नादानी। 
कहाँ  मिलेगा  यार,  मुफ्त  में  दाना-पानी। 
कहें मित्र यमराज, नया मत  खोलो रास्ता। 
अच्छा होगा आप, बाँध लो अपना बस्ता।।

क्या समझे अभिशाप, जहर है गाढ़ा जिसका।
जिनके मन  में पाप, भला वो होता किसका।।
कहें मित्र यमराज, आप  सब  बचकर  रहिए।
हमें  बचाओ  आप,   ईश से  विनती  करिए।।

जिनके  मन  में पाप, बड़े वो  जालिम  होते।
मौका  रहे  तलाश,     बीज   संवेदन  बोते।।
कहें मित्र यमराज, पिघलकर गिर मत जाना।
पीट-पीटकर  माथ,    पड़े  ना  रोना  गाना।।

वाणी  में विष  घोल,  सुनाते  राम  कहानी।
लगते  हैं  बीमार,     सुनाते  आप  जुबानी।
कहें मित्र यमराज, समझ तू  इसकी माया।
कभी न देना घाव, आप वाणी  से  भाया।। 

वाणी  ऐसी  बोल, लगे  जो  सबको  प्यारी।
नहीं  जहर  तू घोल,    मान  दुश्मन  संसारी।
करना खूब विचार, आप जब भी मुँह खोलो।
कहें  मित्र  यमराज, घोलकर  मिश्री  बोलो।।                                        
बोलचाल  का रंग,आज बदला  है कितना।
जितना हुआ विकास, सभी जानते इतना।
कहें मित्र यमराज, क्षुब्ध होकर क्या होगा। 
संस्कार  का  पतन,  बढ़ाता  भारी  रोगा।।

जहर घोलकर आप,  बोलिए मीठी वाणी।
खूब दिखाओ प्यार, मानकर पागल प्राणी।                    कहें मित्र  यमराज, खेल  समय का  ऐसा। 
करना यही प्रयास,  बनाना  अपने  जैसा।।

बिखर  गए  सब  ख्वाब,    टूटी  उम्मीदें  सारी।
कैसे   हुआ   शिकार,     व्यर्थ   सारी   तैयारी।
कहें  मित्र  यमराज, तनिक  भी  मत घबराओ।
खुद पर रख विश्वास, नए फिर ख्वाब सजाओ।

मुनाफ़कत  का  रोग, आज  पड़ता  है  भारी।
आता   नहीं   है   काम,    पूर्व   कोई   तैयारी।
कहें  मित्र  यमराज, सभी  को  बचकर रहना।
करके आप विचार, तभी कुछ कहना सुनना।।

प्रकट  करें  आभार,    मानकर  कृपा  ईश्वर।
मिलना सबके साथ, प्रेम-भाव  संग रखकर।
कहें मित्र यमराज,  खिलेगी सुख की क्यारी।
इतनी  छोटी  बात,      भगा  देगी  बीमारी।।

रखिए  उत्तम  भाव, हृदय कटुता  मत लाना।
ईश्वर  पर  विश्वास, कभी ना  आप  डिगाना।
कहें मित्र यमराज,  करो  जब भी  आराधन।
रखना  दूर  विकार,   प्रार्थना  होगी  पावन।।

शुभचिंतक  है  कौन,     नहीं   जान  तू   पाया।
कोशिश की दिन रात, तुझे कितना समझाया।।
कहें  मित्र  यमराज,    छोड़  अब  दुनियादारी।
बहुत हुआ  अब यार, कहीं पड़ जाय न भारी।।

मुफ्त  का है  उपहार,          रोग  ये  पक्षाघाती।
मित्र  बने  यमराज,     ज्ञसुनाते  जी की  पाती।।
कहते  हमसे  रोज,        बात  मेरी  अब  मानो।
दुनिया की भी आज, असलियत को पहचानो।।

मम प्रियवर  यमराज, जानती दुनिया सारी।
कहते  वेद  पुराण,     नहीं  कोई  बीमारी।।
कहने  में  संकोच,     बजाता  हूँ मैं  बाजा।
क्यो  करना आभार,  मित्र  मेरे  यमराजा।।

मत  होना  नाराज,    प्रार्थना  सुन लो  मैय्या।
करता  हूँ  फरियाद,  पार कर दो  अब  नैय्या।
हम  बच्चे  नादान,       आप  हो  गंगा  माता।
हम अबोध-अज्ञान, जगत की तुम सुखदाता।।

निर्मल और पवित्र, मातु का  जल है पावन।
हर प्राणी खुशहाल, लगे माँ आप सुहावन।।
कहें  मित्र  यमराज, सोचना हम  कब चाहें।
दूषित  करते  नित्य,     चाह  गंगा दें  राहें।।

तेरी  मेरी  प्रीत,       बनेगी  एक  कहानी।
नीरस दिखते लोग, सुनाते आप जुबानी।।
कहें मित्र यमराज, जगत की लीला न्यारी।
तू  ही मम का ताज, हमें लगती है प्यारी।। 

सुधीर श्रीवास्तव  
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Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 112023887
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