Quotes by shekhar kharadi Idriya in Bitesapp read free

shekhar kharadi Idriya

shekhar kharadi Idriya Matrubharti Verified

@shekharkharadi6923
(849.7k)

प्रतिक्षा - क्षणिका विधा


प्रेम में तेरी प्रतिक्षा, सदियों सी हैं |
नेत्र में तेरी स्मृति, धुंधली सी हैं |
मन में तेरी कुतुहल, पतझड़ सी हैं |
तन में तेरी हलचल, मझधार सी हैं |
स्पर्श में तेरी सुरसुरी, पत्थर सी हैं |
हृदय में तेरी अनुपस्थित, बंजर सी हैं |
श्वास में तेरी अनुकंपा, शिथील सी हैं |
कदाचित.., पुन: मिलन की आश में
मैं शून्य, मौन बैठा हूँ !
केवल तुम्हें देखने ||

©_® शेखर खराड़ी
तिथि-१५/७/२०२६

Read More

हाइकु- ५-७-५

1
क्षण-भंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3
कलयुग से
रोग ग्रस्त मस्तिष्क
रचेंगी युद्ध |

4
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
तीव्र विनाश |

5
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |

6
कहा पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7
शांत उपदेश
सूने उंगली माल
न क्रोधी व्यक्ति |

8
निर्दय भाव
करे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9
दौड़े मनुष्य
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१४/७/२०२६

Read More

हाइकु-- ५-७-५

1-
क्षणभंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2-
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3-
कलयुग से
मस्तिष्क रोग ग्रस्त
युद्ध के रूप |

4-
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
विध्वंशक से

5-
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |
6-
कहां पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7-
पूर्ण उपदेश
सूने उंगली माल
न स्वार्थी इंन्सा

8-
निर्दय भाव
सोचे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9-
मानुष दौड़े
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10-
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

Read More

हाइकु-- ५-७-५

1-
क्षणभंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2-
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3-
कलयुग से
मस्तिष्क रोग ग्रस्त
युद्ध के रूप |

4-
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
विध्वंशक से

5-
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |
6-
कहां पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7-
पूर्ण उपदेश
सूने उंगली माल
न स्वार्थी इंन्सा

8-
निर्दय भाव
सोचे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9-
मानुष दौड़े
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10-
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

Read More

हाइकु-- ५-७-५

1-
क्षणभंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2-
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3-
कलयुग से
मस्तिष्क रोग ग्रस्त
युद्ध के रूप |

4-
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
विध्वंशक से

5-
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |
6-
कहां पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7-
पूर्ण उपदेश
सूने उंगली माल
न स्वार्थी इंन्सा

8-
निर्दय भाव
सोचे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9-
मानुष दौड़े
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10-
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

Read More

हाइकु-- ५-७-५

1-
क्षणभंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2-
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3-
कलयुग से
मस्तिष्क रोग ग्रस्त
युद्ध के रूप |

4-
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
विध्वंशक से

5-
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |
6-
कहां पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7-
पूर्ण उपदेश
सूने उंगली माल
न स्वार्थी इंन्सा

8-
निर्दय भाव
सोचे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9-
मानुष दौड़े
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10-
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

Read More

हाइकु-- ५-७-५

1-
क्षणभंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2-
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3-
कलयुग से
मस्तिष्क रोग ग्रस्त
युद्ध के रूप |

4-
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
विध्वंशक से

5-
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |
6-
कहां पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7-
पूर्ण उपदेश
सूने उंगली माल
न स्वार्थी इंन्सा

8-
निर्दय भाव
सोचे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9-
मानुष दौड़े
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10-
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

Read More

हाइकु-- ५-७-५

1-
क्षणभंगुर
यह जीवन पथ
लोभ सदैव |

2-
कृत्रिम बुद्धि
सुषुप्त करे वृद्धि
दीर्धकाल से |

3-
कलयुग से
मस्तिष्क रोग ग्रस्त
युद्ध के रूप |

4-
हिंसा, असत्य
प्रकोप चारों दिशा
विध्वंशक से

5-
कुदृष्टि व्याप्त
नग्न अश्लीलता से
मन विकृत |
6-
कहां पाएंगे ?
बुद्ध जैसी करुणा
सख्त दिल में |

7-
पूर्ण उपदेश
सूने उंगली माल
न स्वार्थी इंन्सा

8-
निर्दय भाव
सोचे स्वयं का हित
अन्य व्यथा क्या ?

9-
मानुष दौड़े
नित्य रुपयों पीछे
भटके व्यर्थ |

10-
अंधानुयायी
बूनें भ्रमीत जाल
करे शिकार |

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

Read More

आऊंगी..., सजल विधा

प्रातःकाल कोयल की कुकू सूनकर ,
तुम्हें पुराने कूप पर मिलने आऊंगी |

जंगली पुष्पों को श्वासों में भरकर ,
तुम्हें शूल, कंकर पर ढूढंने आऊंगी |

बहते झरनों का मीठा जल पी कर ,
तुम्हें नदी संग स्पर्श करने आऊंगी |

ठोस गड़रिए मन में नर्म स्नेह लेकर ,
तुम्हें दुपहरी धूप में छांव देने आऊंगी |

हरे मैदानों में भेड़-बकरियां चरा कर ,
तुम्हें आभ तले चाय पिलाने आऊंगी |

गरमा-गरम बाजरे की रोटी बनाकर ,
तुम्हें घी, गुड़ के साथ खिलाने आऊंगी |

देहाती डगर, बाट पर निरंतर चलकर ,
तुम्हें पहाड़ी गीत सुनाने शीघ्र आऊंगी |

हां.., एक दिन हृदय प्रेयसी बनकर ,
तुम पर पूर्ण न्यौछावर करने आऊंगी ||

-© शेखर खराड़ी

तिथि-१०/७/२०२६

Read More

तेरे प्यार में
गुमशुदा है मेरा दिल
इंतज़ार की राह देखकर ,
जरा तुम खुलकर बताओं
मुलाकात के फासलों तक....