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shekhar kharadi Idriya

shekhar kharadi Idriya Matrubharti Verified

@shekharkharadi6923
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तुम्हें ढूंढता हूँ, सजल विधा

जब तुम गांव की बांट पर नंगे पांव चलती हो ,
तब मैं माटी की नर्म स्पर्श में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम पांव से ओश बिंदु को सहलाती हो ,
तब मैं शुद्ध बूंदो के चमक में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम मक्के की फसलों को सहलाती हो ,
तब मैं पत्तों की सरसराहट में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम पीले सरसों के खेतों में युंही दौड़ती हो ,
तब मैं श्वासों की तेज धड़कन में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम खुशी से पल्लू हवा में लहराती हो ,
तब मैं हवा के शांत झोंको में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम पके जुवार के हुँडा भूनकर खाती हो
तब मैं दरांँती से कटे ठूठ में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम चूल्हे पर बाजरे की रोटी पकाती हो ,
तब मैं खाने के पुराने स्वाद में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम कुएं से पानी रस्सी से निकालती हो ,
तब मैं प्यासा मुसाफ़िर बनकर तुम्हे ढूंढता हूँ |

जब तुम मटके को कमर से ठुमकाती हो ,
तब मैं अल्हड़ प्रेमी सा केवल तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम 'छिछोरा छोरा' कहकर डांटती हो ,
तब मैं स्नेह की गहरी झील में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम प्रतिक्षा की राह में घड़ीभर ठहरती हो ,
तब मैं मिलन की लंबी दूरी में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम जंगली पुष्प बालों में सहज लगाती हो ,
तब मैं खुश्बू की तीव्र खींचाव में तुम्हें ढूंढता हूँ |

जब तुम साल-पलाश के पत्तों से कुटिया बनाती हो ,
तब मैं प्रकृति की असीम सादगी में तुम्हें ढूंढता हूँ |


©®- शेखर खराड़ी
तिथि- ७-९-२०२६

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बेवकूफ़ बंदर - हास्य-व्यंग्य विधा

हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
दिल के बजाए दिमाग़ से हैं घनचक्कर ,
मन के बिना तेरे आंगन के घुम्मकड़
तेरी छत पर कूद-कूद कर हल्ला मचाएंगे ,
तेरे बाग-बगीचों में ऊधम मचाएंगे
तेरे गमलों के पौधों को उखाड़ फेंकेंगे |

हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
मंदिर के बजाय तेरी पूजा-पाठ करेगें ,
पेट भरकर तेरा व्रत उपवास करेगें
तेरी गली में भीख माग उपवास तोडेंगे ,
गधे पर उल्टी शान-शौकत से बैठकर
फटे हाल में केवल तुम्हें मिलने आएंगे |


हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
शांति छोड़ हुप..हुप.. चिल्लाएंगे ,
तेरे हाथों के डंडे शौक से खाएंगे
तेरे नाम का टैटू सीने पर बनाएंगे ,
तेरी डांट पर जोर-जोर से हंसेंगे
तेरे नखरें सात समुंदर पार उठाएंगे |

हम तेरे प्यार में पक्के बेवकूफ़ बंदर
गले में टाई की जगह रस्सी लटकाएंगे ,
तन पे शर्ट की जगह जंगली पत्ते लपेटेंगे
पाउडर की जगह चेहरे पर कालिख लगाएंगे ,
तेरी पुरानी सैंन्डल गले में अदब से पहनेंगे
पूरे शहर को तेरा दिवाना मंजनू बताएंगे |

क्योंकी, हम तो हर जगह पे ठहरे फालतु ,
बस तेरे प्यार में हम पक्के बेवकूफ़ बंजर
दिन भर बस मदारी के भालू जैसा नाचेंगे ,
तेरे इशारों पर पिंजरे का तोता जैसा चहकेंगे
दौडेगें तेरे पीछे हमेशा हम दुम हिलाकर ,
घुमेंगे तेरे आगे-पीछे पालतू जानवर जैसा ||


©®- शेखर खराड़ी
तिथि-५/९/२०२६

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खौफ़नाक मंजर...,,

तुफानी नदियां , दरकते पहाड़ नेपाल की धरती पर
वो मंजर नहीं खौफ़नाक तबाही का गहरा सदमा था |
क्षणभर में धरा ढह गई, मलबे के ढ़ेर में जीवन दब गया,
सदियों के सुंदर आशियानें तीनके के भांति बह गए |

हर तरफ़ बर्बादी के रूह कँपकँपाते करुण दृश्य थे |
बाहर पानी का जलजला था, भीतर गहरा सन्नाटा था |
हर एक दिलों में सिर्फ़ वो खौफ़ का काला पहरा था |
हर एक मासूम की पुकार में पीड़ा का गहरा घाव था |

पत्थर,पानी, माटी और टूटते पहाड़ने क्रूरता से प्रहार किया
सबकुछ सैकड़ोें ने ख़ूबसूरत सपनों को युंही उजाड़ दिया
न अब नींद का ठिकाना, बस आंखों में वही दृश्य का बसेरा ,
जाएं तो कहां जाएं कुदरत के आगे सब लाचार, बेबस थे |

अब पहाड़ खामोश हैं, नदियां अब भी सामने बहती हैं,
जो बरसों से जीवन की आधार थी, अब वह शून्य, स्तब्ध हैं।
बस वह गहन मंथन के लिए पीछे अनगिनत प्रश्न छोड़ गईं |
सर्वस्व विनाश करके इन्सान को भीतर से वो तोड़ गईं |

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-३०/८/२०२६

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" ૨૪ ઓગસ્ટ વિશ્વ ગુજરાતી ભાષા દિવસ "

ઈડરિયા ગઢની..,
લીલીછમ ડુંગરોની કોતરમાં
તારો સાદ મને સંભાળાય ક્યાં ?
છાનો છૂપો સંતા કુંકડી રમે...
વગડે વગડે ઘડીક ગોતવા કાઢે.
દૂર દૂર સંતાવાનો ઢોંગ કરે
ઝાડની ડાળી ડાળી થપ્પો કરે
તારો ખાલીખમ પ્રેમ મને ...,
લાગણીના વહેણમાં ખેંચતાણ કરે
હૃદયના ધબકારા વધારીને
પ્રત્યેક્ષ રૂબરૂ મળવમાં,
એક-બે નહીં પણ લાખો બાના કાઢે
તારા હાચા,ખોટા વાદા મને..,
આજકાલ ઈડરિયા ગઢ પર
હેડતા , ચઢતા ધૂંધળા લાગે
નીચે ઊતરતા-ઊતરતા,
આંખોમાં ભ્રમના ટેકરા લાગે.
તારો ખાલીખમ પ્રેમ મને...

©®- શેખર ખરાડી, ઈડર , ગુજરાત

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प्रेम की अहमियत...

तुम लाख चाहकर भी सच्चे प्रेम की अहमियत..
हर पल, हर घड़ी, हर दिन, हर साल भूला नहीं पाओगी
चाहकर भी मन से मेरी छवि मिटा नहीं पाओगी |
क्योंकि तुम्हारी धड़कन में मेरा ही स्पंदन मिलेगा
चाहे मेरा अस्तित्व पैरों तले रौंद भी डालो ,
चाहे मेरा स्नेह के ढ़ेर सारे पत्र जला भी डालो
चाहे मेरे मन्नत के धागे तुरंत तोड़ भी डालो,
मैं फिर भी एक पुष्प बनकर सदा ही प्रिये..
तेरी ही राह में खिल जाऊंगा |
चाहे तुम जितनी भी दूर चली जाओगी
मैं उतना ही तुम्हारे पास चला आऊंगा |
चाहे तुम जितनी भी नाराज़ क्यों न हो ?
मैं उतना ही तुम्हें मनाने दौड़ता चला आऊंगा |
चाहे तुम मेरी प्रत्येक स्मृति हृदय से निकाल दों..!
फिर भी अपने अंर्तमन में मेरा ही एहसास पाओगी ,
हर धड़कन में मेरी ही आहट सून पाओगी
हर सांस में मेरी सांस तुम्हें मिलेगी |
मेरा वजूद मिटेगा पर मेरी अनुभूति नहीं मिटेगी ,
मेरा ख्व़ाब टूटेगा पर मेरी गहरी संवेदना नहीं मिटेगी
समय बीत जाएगा पर मेरी यह प्रीत कभी नहीं छूटेगी ,
तुम चाहो मुझे विस्मृत कर देना संसार की भांति..
पर मेरे प्रेम की छाया सदैव जिंदा रहेगी तुम्हारे भीतर
मेरे काव्य की एक एक पंक्ति सिर्फ़ तुम्हें पुकारेंगी |
मेरे चक्षु की एक एक दृष्टि सिर्फ़ तुम्हें ढूढ़ेगी,
केवल मृत्यु की अनंत गहराइ तक ||

©®- शेखर खराड़ी

तिथि- २२/८/२०२६

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अंगुलिमाल ( उल्टा पिरामिड़ काव्य श्रेणीं )

अनंत करुणा का निर्मल-स्वच्छ भाव
एक हत्यारे के हृदय से टकराकर ,
वो घमंड़ क्षणभर में मिट गया |
क्रूर हिंसा के मार्ग से रूठकर ,
अंगुलियों के माला से छूटकर
बुद्ध की शांत छवि देखकर ,
तुरंत नया जीवन पाकर |
किन्तु पश्चपात से ,
अंगुलिमाल
भीतर
रोता
हैं।

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-२१/८/२०२६

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कैलास निवासी....

ओ मेरे भोले भंडारी, मेरे कैलास निवासी ,
शून्य, मौन, एकांत वास में, मन हुआ अंतर्धान |
ब्रह्मांड के कण-कण में, अत्र-तत्र-सर्वत्र समाएं ,
सर्जन से विर्जन तक प्रभु तेरी ही महिमा गाएं ||

नमन तुम्हें है नृत्य रूप में, तांडव रूप तुम्हारा ,
विध्वंशक प्रलय के स्वामी, तुम गंगा धारा |
जन्म से श्मशान तक, तुम ही आदि अनंता ,
साधना से अगोरी तक प्रभु तुम ही एकांता ||

रूद्राक्ष और बेल पत्र से, सजती शिव आभा ,
लिंग रूप से शिवलिंग तक, फैली अद्भुत माया |
ओम कालेश्वर, महाकाल तुम पंचतत्व के स्वामी ,
अंतिम सत्य तुम हो केवल, हे पुण्यमय विधाता ||

तुमसे शरू , तुमसे खत्म है, यह सारा संसार ,
यही शाश्वत सत्य विश्व का, यही मुख्य प्राणनाथ |
बाकी सब मिथ्या है जग में, भ्रम का महा कलयुग ,
शिव चरणों में शिश झुकाकर, मुक्ति को है पाना ||

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-१३/८/२०२६

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निकम्मा इश्क़

जी..हाँ ,
निकम्मा हूँ ! फ़र्ज़ी हूँ !
तेरे इश्क़ में ,
काब़िल कहा हूँ मैं ?
तेरे पाक दिल के ,
हर दफ़ा, सौ-सौ ज़ज्बातें
तोड़ कर, तुम्हारे पास
अफलातून....,
वापस लौट आता हूँ |
बेशर्म, बेहया बनकर,
भोली-भाली बातों से,
झूठे-मूठे किस्सों से
अजीब-ओ-ग़रीब चश्में लगाकर ,
बनावटी सूरत दिखाकर ,
उल्टे-पुल्टे कारनामों पर
मख़मली मक्खन लगाकर ,
तुम्हें फिर से मनाता हूँ |
बेतुकी कहानी सुनाकर ,
जी-हजूरी करते-करते,
हमेशा-हमेशा तेरा ही
लुभाता हूँ कोमल मन..
फिर भी लायक कहां हूँ मैं !
तुम्हारी अच्छाईयों के आगे
अपने स्वार्थी, ज़िद्दी रवैये से ,
आदत से मज़बूर होकर ,
बन जाता हूँ, लायक से
इक खलनायक मैं ||

-©®- शेखर खराड़ी
तिथि-४/८/२०२६

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इश्क़ की यह कैसी इम्तेहान...?
दर्द का सिलसिला थमता नहीं
ग़म का आलम फिसलता नहीं ,
बेरूख़ी का जज्ब़ा पिघलता नहीं
बस जला है दिल कश्मकश की आग में
धुवां.., धुवां... होकर ||

©- Shekhar kharadi

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रिमझिम फुव्वारें...

अम्बर से बरसीं रिमझीम फुव्वारें..,
वृक्षों और पुष्पों से टप-टप पानी गिरे |
धीरे-धीरे भींग रहा मेरा अल्हड़ तन-मन ,
मैं झूमू, मैं नाचूं, संग मल्हार गीत गाऊं |

मधुमालती की खुश्बू मंद-मंद लेकर ,
भीगी सी भागी सी, मैं ऋतु का आनंद लूं !
छम-छम पायल की झंकार से तुम्हें पुकारूं ,
हर एक गिरती बूंद-बूंद में तुम्हें ढूढूं |

हृदय की मद्धम गति से धड़कती हुई ,
पूर्ण समर्पण की भाव से खूद को खो दूं |
सदा तुम्हें चाहूं, सदा तुम्हें याद करूं ,
सदा मैं जीवन भर, बस तुम्हें प्रेम करूं ||

©®- शेखर खराड़ी
तिथि-२९/७/२०२६

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