One can experiences direct experience like suspense, thriller, action, romance, murder mystery in short story, long story and red it in my written book most of the stories, novels, social, spiritual, inspirational, creative, imaginative, Psychological, etihasic, technological, love emotional, Buddha, I have written books on all these topics and write Poetry, well thought out and creative quotes.. There are occupations and passions that flow in my blood like a veil Always... by--- Shekhar Kharadi

धनुषाकार पिरामिड काव्य रचना 🏹

क्या - १
हूं मैं -२
आइना -३
बताएगा -४
मेरी सूरत -५
वरना कलम -६
पेशकश करेगीं -७
मेरी काबिलियत -७
लिख लिखकर -६
तुम पढ़ना -५
शिद्दत से -४
हमेशा -३
अभी -२
से -१

-© शेखर खराड़ी
तिथि- १३/६/२०२२ , जून

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कमबख्त़ तेरे....
ज़लिल-ए-इश्क़ में
दो पल ठहरकर ,
ग़मगीन से रहते हैं
किस किसको पूछे ?
दिल-ए-हाल का पता....
जो मुंह फुलाकर बैठे हैं
गैरों की महफ़िल में जाकर ,
आज़ खुद शर्मिंदा हैं
फ़िज़ूल की बातों पे रूठकर ,
उन्हें फुर्सत में हंसा..हंसा कर
जिंद-ए-जुनून से कैसे मनाएं ?

-© शेखर खराड़ी,
तिथि-११/६/२०२२

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दिल तो बच्चा है
जिंद पे जो अड़ा है ,
दिमाग़ का कहना कहा सुनता है
इश्क़-ए-सैलाब में बहता है
ख़्वाब-ए-आसमां में उड़ना है
बिंदास-ए-ख्वाहिशें लेकर ,
बेकाबू जज़्बात से कहा ड़रता है
वो तो नादान परिंदों जैसा है
मनमर्ज़ी-ए-हुक्म पे जो चलता है ,
क्योंकि दिल तो बच्चा है
जिंद पे जो अड़ा है ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-३१/६/२०२२, मई

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ठिकठाक से
भोंदू से दिखते हैं
तेरे पागल इश्क़ में
खुद को रूलाकर ,
आंसू जो बहाते हैं
तेरे शहर में आकर ,
वो लुढ़क-लुढ़क कर
बहते रहें, रेंग-रेंग कर
गली-मुहल्ले में जाकर
क्या खूब कहते हैं ?
हमारे प्यार के क़िस्से
टेढ़े-मेढ़े मोड़ पे रुककर ,
जरा फ़िक्र किसीको हैं
तसल्ली से सुनने में यहां
जो हुएं हैं नीलाम सरेआम
उन्हें जरा सा ख़्याल कैसा
फ़िलहाल नज़रें हटाकर ,
दो घड़ी फुर्सत कहा है ?
साफतौर सीधा मिलकर
रू-ब-रू फितूर पढ़कर ,
गुफ्तगू करने के लिए
वर्ना बेवजह ही..,
रोज़मर्रा घायल जो हुए
गैरों के खंजर से
मतलबी रवैए से ,
इस्तेमाल जो हुए बेख़ौफ़
जिस्म से रूह तलक
लहू का कतरा-कतरा
मांगता है हिसाब
फिर भी परवाह किसको है ?
पलटकर लौट आएं
घाव पर औषधि लगाएं
व्यथा की नदी पीकर ,
समुद्र की गहराई छूकर
रिश्तों की अहमियत समझें ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-३०/६/२०२२, मई

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#इंतज़ार

तेरा इंतज़ार करते-करते
दिन बीतें, रात गुजरी ,
गुज़रे सालों-साल
न तुम आई, न तुम्हारी यादें आई
बस बेजुबान बारिश की बूंदें...
थोड़ा सा प्यार जता गयीं ।

पता है, इश्क़ इंतज़ार है
तड़पता है, जलता है, रूलाता है
हद से ज्यादा इन्तेहा लेता है
दिल की गुस्ताखियां पढ़-पढ़कर
मन की नादानियां लिख-लिखकर ,
हर दफ़ा उत्सुकता जो बढ़ाता है ।

मिलना है, ऋतुओं के संग
बहते झरनों के बहाव तक
तैरते हुए तुम्हें देखना हैं
सांसों की गहराईयों को छूकर
आंखों की परतें खोलकर ,
यकिनन तुम्हें देखना हैं ।

मिटानी है, हर पल, हर घड़ी
बरसों की ये सख़्त दूरियां
परस्पर मृदु आलिंगन से
भावनात्मक गले लगाकर
तन-मन-धन तुम्हें सौंपकर ,
अंतःकरण से तुम्हें पाना हैं ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि २३/५/२०२२, मई

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माँ ममता का सागर है,
पहाड़-सा विश्वास है ।

माँ बरसती बारिश सी
बूंद-बूंद में मीठा जल है ।

माँ रिमझिम फुव्वारे सी
स्नेह है, करुणा है, धैर्य है ।

माँ निस्वार्थ बहती-सी,
नदी है, झरना है, झील है ।

माँ पुष्प पुष्प में खिली सी
श्वास है, हवा है, इत्र है ।

माँ मृदु डांट-थपकी सी
चुंबन है, आलिंगन है, स्पर्श है ।

माँ उचित-अनुचित सी
खदान है, संस्कार है, गुरु है ।

माँ अपार श्रद्धा सी
कावा है, काशी है, कैलाश है ।

माँ नित्य प्रेरणा सी
बल है, उमंग है, साहस है ।

माँ ऋतु रक्षित सी
छांव है, छाता है, कबलं है ।

माँ सर्व यात्रा धाम सी
व्रत है, उपवास है, पूजा है ।

माँ हृदय पुकार सी
राम है, रब है, अल्लाह है ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-११/५/२०२२, मई

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विषय- हास्य-व्यंग्य काव्य / बेवकूफ गधे

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
रेंक..रेंक..कर दिन भूनेंगे
झूक.. झूककर सलाम भरेंगे
मर मरकर सांस निकालेंगे
जी जीकर पूंछ मुंडवाएंगें
हंस हंसकर जी हजूरी पढ़ेंगें ।

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
रखकर हुक्म सर बालों पर
दिहाड़ी मजदूरी से गंजे बनेंगे
खून-पसीने से नंगें चलेंगे
लात-घूंसे-झापड़ से बिमार पड़ेंगे
हट्टे-कट्टे डन्डे भी बदन से तोड़ेंगे ।

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
शौक़ शौरहत से बारात में कूदेंगे
गली-मुहल्ले से महारानी चुराएंगे
पीठ पर बिठाकर शेर कराएंगें
अल्हड़-उज्जड़ ताने-बाने खायेंगे
ठाठ-बाट से हंसेंगे-रोएंगे-नाचेंगे ।

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
घिस घिसकर बर्तन गंदा करेंगे
आटा गूंथ-गूंथकर रोटी जलाएंगे
सांझ सवेरे खूब कपड़े फाड़ेंगे
झाड़ू-पोछा से मकान बिगाड़ेंगे
मेकअप से चेहरा भूत बनाएंगे ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-२/५/२०२२, मई

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उत्तर-पूर्व-पश्विम-पूरब

तपते ताप सा कहर ,

प्रचंड-उष्ण हवा लहर

गर्म लू सा मंद-मंद पहर ,

रौद्र रूप ऊर्जावान प्रकोप

उड़ती धूल-बंवडर से ,

वन-पहाड़-बगीयां जलें

व्यथित-उदास राहें रुठें

दुपहरी धूप के प्रहार से

दौड़ता जनजीवन ठप

शहर-शहर सड़कें पिघलें

अंग-अंग से बहें पसीना

पग-पग से उठें ज्वार ,

सारे पंछी हुए मूर्छित

सर्वत्र त्राहि-त्राहि पुकारें..

करुणामय श्वासे चलें

मृदु ऋतु के सख्त सन्नाटे से

मुरझाए सृष्टि का यौवन....

देख सिकुड़-सिकुड़ कर ,

जल का बूंद-बूंद मिटें

धरा-व्योम आंसू बहाएं ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि- ९/६/२०२२, मई

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