ये मोहब्बत थी
या किसी तन्हा शाम की आदत,
जो धीरे-धीरे
मेरे कमरे में फैल गई।
तुम आईं
और शब्दों को कम बोलना सिखा गईं,
मैंने ख़ामोशी को
तुम्हारा जवाब समझ लिया।
मैं हर रोज़
अपने हिस्से का सच
तुम्हारे नाम लिखता रहा,
तुम हर बार
उसे पढ़े बिना
मोड़कर रख देती रहीं।
कभी-कभी सोचता हूँ—
इश्क़ वो नहीं होता
जो मिल जाए,
इश्क़ शायद वो होता है
जो आदमी को
थोड़ा और अकेला कर दे।
आज भी
तुम्हारी याद
किसी पुराने खत की तरह है—
ना फाड़ सकता हूँ,
ना दोबारा पढ़ने की हिम्मत है।
आर्यमौलिक