मैं ऐसी क्यों हो गई हूं ?
कोई भी ऐसा क्यों हो जाता है?
कैसे हो सकता है कोई इतना निष्ठुर।
कोई कैसे इतने बड़े घर में अकेले रह सकता है।
पूरे दिन ,पूरे हफ्ते, पूरे महीने...
बिना किसी से बात किए...
मैं कैसे अकेले रहना सिख सकती हूं।
क्यों मुझे अब किसी की दरकार नहीं...?
शायद किसी बहुत अपने को खोने के बाद इंसान निष्ठुर हो जाता है।
उसे समझ आ जाता है कि दुनिया छलावा है
या वो फिर किसी को खोने से डरता है।
शायद इसलिए हो जाता है इंसान इतना निष्ठुर हृदयविहीन
और जब मैं खुद में खोई रहती हूं तब मुझे ये अकेलापन इतना डरावना नहीं लगता।
पर जब मुझे इसका अहसास होता है।
ये बहुत डरावना सा दिखता है
ArUu ✍️