जीवन में बड़ा कुछ पाया नहीं,
पर संतोष का खज़ाना जरूर पाया है।
ख्वाहिशें ऐसी रखीं ही नहीं,
जो अधूरी रहकर मन को रुला जाएं।
सपनों को आँखों में सजाया जरूर है,
पर उनके पूरे होने का बोझ कभी नहीं उठाया।
उन्हें ईश्वर की झोली में डाल दिया है,
क्योंकि वही जानता है कब क्या देना है।
मेरे पास जो है, वही मेरा संसार है,
जो नहीं है, उसकी कोई तड़प नहीं।
हर हाल में मुस्कुराना सीखा है मैंने,
यही मेरी पहचान है, यही मैं हूँ।
अगर आज ईश्वर पूछ लें मुझसे—
'तैयार हो इस धरती को छोड़ने के लिए?'
तो मैं सहजता से कह दूँगी—
'हाँ प्रभु, तैयार हूँ…
क्योंकि मेरा मन अब शांत है,
मेरे भीतर अब कोई उम्मीद बाकी नहीं,
बस आपकी शरण ही मेरी अंतिम मंज़िल है।'"** 🌹✨
— Komal Mehta