कोई भी दार से जिंदा नहीं उतरता है
मगर जुनून हमारा नहीं लउतरतां है
तबाह कर दिया अहबाब को सियासत ने
मगर मकान से झंडा नहीं उतरता है
मैं अपने दिल के उजडने की बात किस से कहूं
कोई मिजाज पे पुरा नहीं उतरता है
कभी कमीज के आधे बटन लागते थे
और अब बदन से लबादा नहीं उतरता है
मुसालहत के बहुत रास्ते है दुनिया में
मगर सलीब से ईसा नहीं उतरता है
जुआरियों का मुकद्दर खराब है शायद है
जो चाहिए वही पता नहीं उतरतां है
…..शकील जमाली
❤️