नही लगता बिसराने मे समय मुझे भी ,
अगर ! खोजती न आत्मा मे संबन्ध जो
तुमसे |
मिले न हो बेशक मगर होगा ! यह
विश्वास की प्रीत स्वतः जो बँध
गई है |
नही पकड़ा है मैने कुछ भी सिवाय
इस बात के कि मै और तुम अलग
नही है | नही जानती हूँ बेशक !
जुड़ाव की वो कड़ी मगर जब सोचती
हूँ तुम्हे !
अकारण हृदय का पीड़ा से भर
जाना | जिसकी तुलना अबतक
जीवन के किसी पन्ने से नही की जा सकी है |
नही लगता अभी तक की पीड़ा भी मरती है ,
जिसे सुना था अब तक |
ऐसा नही है की बिसरा न सकूँ मगर !
जाने कौन बैठा है भीतर नही देता बिसराने,
जाने क्या तलाश रहा है इस पीड़ा मे |
मैने कुछ पकड़कर नही रखा है सिवाय
इसके की कि तुम मेरा सदियों का इंतजार
और मै तुम्हारी तपस्या हूँ |
आखिर मै क्या हूँ ? यही प्रश्न को गठियाये
तुम्हारी प्रतीक्षा रहती है |
हर भाव तुमसे जोड़ बैठी हूँ ,
किसी को झाँकने की भी इजाजत नही है |
मुझे भावना का भी मोह नही आखिर कबतक
शेष रहेगी नही जानती |
पकड़कर नही रखा मैने सिवाय इसके कि कुछ
है इसके भीतर शायद मै हूँ | आखिर मै कौन हूँ
यही प्रश्न तो तुममे उलझाये रखता है मुझे |
याद आता है वह एक क्षण जब तुम्हारी प्रीत
देह मोह को लांघकर बस अनंत मोह के वश
हो गई वह क्षण अव्यक्त है , और उस क्षण के
स्पर्श से कोशो दूर हूँ |
तुम्हारा मुझसे दूर जाना मेरा परिवर्तन, पतन कैसे
हो सकता है | तुम जो पतित को पावन करने वाले
हो | यही मेरी पीड़ा का आधार है | मगर मैने पकड़कर
नही रखा सिवाय इसके कि मेरे और तुम्हारे
अतिरिक्त शेष कुछ भी नही है |