अनन्त ,विशाल ब्रह्मांड हमारा
सुख के आगे दुख भी प्यारा,
रहा गुणों से सरस उजाला
अवगुण देते नित अँधियारा।
भई लोक में चर्चा न्यारी
गुण-अवगुण से दुनिया प्यारी,
मत-सम्मत विषम व्यापारी
दुविधा में निज दुनिया सारी।
आँखों में राहें प्यारी
फूलों पर बैठे व्यापारी,
चले लोक में पथिक संसारी
क्षण-क्षण मिले लक्ष्य सुखारी।
सुख-दुख में ईश्वर प्यारा
कुटी बना कर साधु न्यारा,
अन्न खेत का सबको प्यारा
जीवन का गुण अक्षुण्ण सारा।
जो शब्द से निकला प्यारा
वही अमृतमय बना तुम्हारा,
जिस शब्द में विष की धारा
उसे निगल कर ये जग हारा।
* महेश रौतेला