भीष्म
जीवन की राहों में
फूल हैं कम
कांटे हैं ज्यादा।
हम जिन्हें समझते हैं फूल
वे ही चुभते हैं बनकर शूल।
कांटे तो कांटे हैं
उनसे हम रहते हैं सावधान,
धोखा वहीं खाते हैं
जहाँ बस फूल नजर आते हैं।
पितामह भीष्म का मन था
कृष्ण के साथ
लेकिन वे
तन से
जीवन भर कांटों के साथ रहे
और
कांटों की सेज पर ही मरे।
भीष्म जब संसार से विदा हुए
तो अपने साथ ले गए
धरती के ढेर से कांटे
और अपनी जन्मभूमि पर
छोड़ गए श्रीकृष्ण को
और पाण्डवों सहित उन वीरों को
जिनका चरित्र था
फूलों सा,
वे स्वयं अधर्म के कांटों पर सोये
और जनता को दिये
धर्म के फूल।
आज नेता
सो रहे हैं फूलों की सेज पर
और जनता को दे रहे हैं
मंइगाई और भ्रष्टाचार के कांटे।
जनता का दुख-दर्द
उन्हें नजर नहीं आता,
इसीलिये उनमें कोई भी
भीष्म पितामह नहीं बन पाता।