समयचक्र अविरत घूमता रहता।
कभी धूप, कभी छाँव की आँख मिचौली।
कभी सुख, कभी दुःख से भरी झोली।
कभी रात होती कालरात्रि, कभी रात होती होली।
जीवन में चलती रहती हमेशा आवन-जा।
कभी रंक बनाता, कभी बना देता राजा।
कभी हस्ती मिटाता, कभी हस्ती बनाता।
कभी रुलाता, कभी गीत गुन गुनाता।
कभी थपेड़ा मारता, कभी पीठ थपथपाता।
कभी ह्रास करता, कभी इतिहास रचता।
कभी कुठता रहता, कभी ख़ुशी से इतराता।
कभी कड़ी धूप बरसाता कभी छाता बन जाता।
कभी इशारों पर नचाता, हाथ में छोटी थमाता।
कभी खाई में गिराता, कभी टोच पर पहुँचाता।
कभी याचक, कभी बना देता सबसे बड़ा दाता।
बताओ, समय के चक्र से कौन अछूता रह पाता?
-दीपेश कामडी 'अनीस'