यादों के किस्से-कहानी आज भी ज़ेहन में हैं,
चलती-फिरती सी सभी परछाइयां आंगन में हैं
हादिसे कितने हैं देखे,आंख ने तो अब मिरी,
कैसी बदली सूरतें हालात के दरपन में हैं
कत्ल का तो ग़म नहीं है,फ़िक्र बस इतनी सी है,
रक्त्त की दो-चार बून्दें आपके दामन में हैं
करुनेश कंचन