प्रभु ने महिषी माँ का जिसे रूप दिया था ,
कुछ पुरुषों ने अब उसको कामिनी बना दिया ।
जब चाहा वासना की आग में झुलस दिया ,
दिल भर गया तो पैरों से निर्मम कुचल दिया ।।
वह जब मिटी ; मिटती रही , दुनिया को सुख मिला ।
उससे किसी को सुख मिले , इसका नहीं गिला ।
पर रोती है , जब प्यार का कोई मान ही ना हो ।
भगवान-सा पूजे जिसे , इंसान भी ना हो ।
अस्तित्व हरके उसका मृदु भावों की आड़ में ,
पुरुषों ने नारी-देह को खिलौना बना लिया ।
जब चाहा वासना की आग में झुलस दिया ,
दिल भर गया तो पैरों से निर्मम कुचल दिया ।।
इस ही देह से जन्मे हैं , भगवान कृष्ण-राम
समझो तो घर की देवी में हैं सारे तीर्थ धाम
पत्थर की पूजा करके कोई प्रभु-भक्त नहीं होता
अबला पर अत्याचार ताजोतख़्त नहीं होता
भक्ति की आड़ में प्रभु को भी दगा दिया ,
माँ के पवित्र रूप पर जब मन फिसल गया।।
जब चाहा वासना की आग में झुलस दिया ,
दिल भर गया तो पैरों से निर्मम कुचल दिया ।।