बिखरा- बिखरा रहता हूँ
चहल-पहल के साथ चला हूँ,
ऊँच-नीच सब देखा हूँ
धन-वैभव से खेला हूँ
अब बिखरा- बिखरा रहता हूँ।
उड़ते पंछी पकड़ा हूँ
उन्हें गगन में छोड़ा हूँ,
पत्रों में बह जाता हूँ
आँसू में आ जाता हूँ,
फिर बिखरा- बिखरा रहता हूँ।
तुममें, उसमें,अपने में,
बिखरा- बिखरा रहता हूँ,
रीत-नीति सब पकड़े हूँ
बहका-बहका रहता हूँ।
मैं भेंट तुमसे चाह रहा हूँ
मुक्ति थोड़ी पा रहा हूँ,
इस मिट्टी पर चलता-फिरता
कुछ बिखरा-बिखरा रहता हूँ।
**महेश रौतेला