कैसी मुझसे चूक हुई यारों इश्क़ निभाने में
बेतहाशा चाह कर भी तन्हा रहा ज़माने में
पूछते तो सब हैं मेरी खोमोशी का सबब
लब थरथराते हैं नाम उसका बतलाने में
दुख अगर हुआ हो तुम्हे कभी मेरी बातों से
माफ़ कर दीजिएगा ग़लती हुई अनजाने में
ये वादियां और शोखियां नही भाती अब
दिल-जलों को पनाह मिलती है वीराने में
कभी नाम भर से तेरे आ जाती थी मुस्कान
अब सुकून नहीं मिलता डूबे हैं मयख़ाने में
तक़दीर पे अपनी मैं इतराना कैसे छोडूं भला
चाँद रहता था कभी 'अम्बर' के आशियाने में