ना जुस्तजु रही , ना कोई आरझु ए दिल
बस आप में, अपनी हयाति ओर कुछ नहि
टुटकर क्युं बिखर जाना, पाने की तमन्ना
ख्वाईश ए दिल , खास यहाँ अब कुछ नहि
क्या करे ठिठोलीे अल्फाज़ की ओकात़ नहि
मौन मैं पाया अंदाज़ , महेफुस यहाँ कुछ नहि
मिट गया अंदाज़ गिला ओर शिकवा करना
खुद मैं बेखुदी का अंदाज़ ,यहाँ ओर कुछ नहि
रुखसत हो गई , अब सारी बलाएँ जिंदगी से
रुह मैं रुहाना है अंदाज़ , यहाँ और कुछ नहि