बन्धु, चले थे कभी साथ हम
आवाज बने थे साथ-साथ हम,
थकना कभी नहीं सीखा था
चलते थे साथ-साथ हम।
बन्धु, नहीं थे केवल स्वप्न हम
यथार्थ बीज बन उग आये थे,
अटूट शौर्य से उगे हुये वृक्ष
फल-फूलों से लदे देखे थे।
बन्धु, अभी तो शाम हुयी है
कथा रात्रि की दूर खड़ी है,
महाभारत के बीच खड़े हम
श्रीकृष्ण से सत्य लिये हैं।
**महेश रौतेला