कालिमा
परछाई के रंग की
कि जैसे समय चल रहा हो
अपने पिछले पहर में
और पिछला पहर,बहुत लंबा
काटे कटता ही नहीं
कुछ परिंदे ज़मीं पर
बैठ कर सुगबुगाते
यह सोचते हैं होगा कब
इस पहर का अंत
कब मिलेंगे अन्न
कि इस घने वन में
नहीं दिखता कोई मंज़र
सुहाना और रौशन
कुछ पुराने वृक्ष
दिखते हैं कि जैसे
स्लेट पर
अबोध बालक ने
उकेर डाला है
सीधी-तिरक्षी कुछ लकीरें
एक उल्लू बैठकर
उसी डाल पर
देखता है जुगनुओं को
देखते ही झपट पड़ता
और फिर से वही कालिमा।
अमरदीप कुमार