Quotes by अमरदीप कुमार in Bitesapp read free

अमरदीप कुमार

अमरदीप कुमार

@amardeepkumar238gmail.com
(15.8k)

भैया यह तो रामराज्य है

काहे को लोकतंत्र तुम्हारा


बोले आत्मनिर्भर हो जाओ

टूटी चप्पल और घिसाओ

रोटी-पानी को तरसो तुम

बीच सड़क पे मारे जाओ


भैया यह तो नागराज्य है

काहे को लोकतंत्र तुम्हारा


जनता दुर्दिन को  जीवत है

लेखक मधुर कहानी कहता

राष्ट्रवाद का चूरन देकर

लार चुआता व्यंजन खाता


भैया यह तो कामराज्य है

काहे को लोकतंत्र तुम्हारा


हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई

दोनों में फिर हुई लड़ाई

मीडिया में भी घमासान है

नेता जी की खूब कमाई


भैया यह तो दामराज्य है

काहे को लोकतंत्र तुम्हारा

Read More

कालिमा
परछाई के रंग की
कि जैसे समय चल रहा हो
अपने पिछले पहर में
और पिछला पहर,बहुत लंबा
काटे कटता ही नहीं

कुछ परिंदे ज़मीं पर
बैठ कर सुगबुगाते
यह सोचते हैं होगा कब
इस पहर का अंत
कब मिलेंगे अन्न
कि इस घने वन में
नहीं दिखता कोई मंज़र
सुहाना और रौशन

कुछ पुराने वृक्ष
दिखते हैं कि जैसे
स्लेट पर
अबोध बालक ने
उकेर डाला है
सीधी-तिरक्षी कुछ लकीरें
एक उल्लू बैठकर
उसी डाल पर
देखता है जुगनुओं को
देखते ही झपट पड़ता
और फिर से वही कालिमा।

अमरदीप कुमार

Read More

मैं एक आधा किसान और आधा मजदूर का बेटा हूँ

मेरे पिता के पास दो बीघा समतल और
तीन बीघा उबड़-खाबड़ ज़मीन है
इनमें से कुछ चौरहा तो कुछ बटइआ की शर्तों पर
किसी दूसरे किसान को दे दी गयी है वर्षों से

हर साल उपज जाते हैं कुछ अनाज जिससे
मेरी दादी बना लेती है मोटी-मोटी रोटियाँ
कुछ अच्छे चावल को बेचकर खरीद लेती है
नमक-गुड़,जीरा-गोलकी और सौ ग्राम हुमाध
बाकी बचे खुद्दी को बना लेती है गीला भात
इतने में ही खत्म हो जाती है मेरे घर की किसानी

शेष बचे हुए पिता रह जाते हैं एक मजदूर
उनके पास मजदूरी के बखत पहनने को
दो कम दामों की कमीज और पायजामा है
उन्होंने कमीजों का नाम दिया है ड्यूटी वाला शर्ट
माँ उसे धोते हुए हर रविवार को परेशान होती है

सुना है कि सालों पहले पिता ने रोपा था प्याज
दादी बताती है ज़मीन में धँसी थी बड़ी-बड़ी पोटियाँ
उसके बाद ख़ूब रुआँसा होकर कहती है
इंदर देवता इतना गुस्साए कि पोटियाँ
ज़मीन में ही रह गयी और गल कर हो गयी पानी
और उसी साल पिता जी ने हल-अरौवा फेंक
पहुँच गए लुधियाना,फिर बन गए मजदूर

मेरे पिता आत्महंता होने से बच गए।

©अमरदीप कुमार

Read More