खामोशियों को गुनगुनाने दो, रातों के गहरे साये में,
अहसासों को बह जाने दो, बिन लफ्जों की बातों में.
कुछ देर, ठहरो तो सही, चुप्पी की इस दुनिया में,
आंखों को पढ़ लेने दो, दिन के इस उजियारे में.
ना ज़ोर लगाओ इतना, जज्बातों को छिपाने में,
देखो कैसे शर्माने लगे हो, मन ही मन मुस्काने में.
ठहराव का अपना मज़ा है, मन को शांत साधने में,
पीछे बहुत कुछ छोड़ दिया है, आगे ही भागने में.
आओ... ठहरा जाए... मन के इस संसार में,
वैसे भी रखा क्या है, भीड़ भरे बाज़ार में....