एक दिन फिसलती धूप में तू भी निकल के देख..
होती है क्या ये कश्मकश तू भी गुज़र के देख...!!!
ना आँख से गुज़रा...ना दामन पे ही बिखरा...
तू भी कभी ऐसे अश्क़ की हद से गुज़र के देख...!!!
जिसकी उम्मीद पर कोई सदियाँ गुज़ार दे...
तू भी किसी ऐसे वादे की सरहद से मुकर के देख...!!!
यूं तो आईने में दिखता है हर एक अक्स...
जो रूह से सँवारे ऐसी नज़रों में सँवर के देख...!!! ?