दुविधा
क्या मैं पहिचान सकूँगा
तेरा जीवन तट,
अपना यौवन, मन सावन,
तेरी बिखरी लट
स्नेहिल आँखें इकटक।
कैसे पहिचानूँ,कैसे जानूँ,
तेरी आहट,
लहराता आँचल, जीवन की करवट।
हृदय के स्वर स्पन्दन
बीता जीवन मिलन,
कैसे दोहराऊँ,कैसे पाऊँ
अपने स्नेहिल शब्द,
अपनी आहट,अपना लय।
*महेश रौतेला