🌸कोई रास्ता ही नहीं🌸
ग़ज़ल
कहाँ को जायें ये हंसी कोई रास्ता ही नहीं
हर तरफ़ धुंध है उजालों से वास्ता ही नहीं।
दिल क्या चीज़ है मैं जान भी लुटायूं उसपे
मेरी वफ़ा को मिले शोहरत वो दास्तां ही नहीं।
निगाहें ढूँढें लिए ख़्वाब आरमानों के कई
हो जाये मुकम्मल शौक़ ये रफ़्ता ही नहीं।
हो मेहर कभी तो दिल मिल जाये उनसे
मैं कैसे दर्द बताऊँ हरजाई समझता ही नहीं।
✍️ बेनी सागर