"शुरुवात"
कुछ ख़त्म करने के लिए,
पहले एक शुरुआत ज़रूरी है।
और अगर शुरुआत ही न हो,
तो क्या कोई अंत...
दर्दनाक हो पाएगा?
सुखद हो पाएगा?
या ख़ूबसूरत भी हो पाएगा?
पूछो उस बारिश की बूंद से,
जो आज समंदर बनकर बह रही है।
कैसे बादलों की कोख में छटपटाई होगी,
गिरने से पहले कितनी बार डरी होगी।
कैसे कतरा-कतरा,
ज़मीन की ठोकरें खाकर,
धूल में लोटकर,
फिर भी बहती रही होगी।
और एक दिन,
खुद को खोकर ही,
उसने समंदर में नई शुरुआत पाई होगी।
हम भी वही बूंद हैं।
जब तक बादल में हैं, सुरक्षित हैं।
जब तक रास्ते का पत्थर हैं, इस्तेमाल हो रहे हैं।
पर असली चमक,
असली मुकाम,
असली अंत...
तभी आता है
जब हम गिरने की हिम्मत करते हैं।
इसलिए डरो मत।
शुरुआत करो।
क्योंकि हर ख़ूबसूरत अंत की,
पहली सीढ़ी...
एक डरती हुई शुरुआत ही होती है।
प्राची गुर्जर……