kuchh nahin Kavita aur nahin udan ke sath
शीर्षक: दूषित मिट्टी
हम कहते हैं माँ से है माटी, माटी से तिरंगा,
पर ये शब्द कहीं खो जाते हैं, सच्चाई कहाँ पाते हैं?
बाते करते आज की, कोई नहीं देखना चाहता,
क्या है सच्चाई, हर कोई झूठ दिखाता है, हम मानते जाते हैं।
जानो हमारी आँखों पर, झूठ ने डेरा घेरा है।
कहते हैं कानून अंधा है, पर आज दिखता है—कानून अंधा है।
कहते हैं हम देश नहीं मिटने देंगे, हम देश नहीं बिकने देंगे,
कहते हैं स्पष्ट बस इस बात की, पर काम हमारा अपनी जेब भरना है।
कोई कदम उठाए अच्छा, ये नहीं लगता है अच्छा,
मरवा देते हैं लोगों को, ये कानून वाले।
आवाज़ दबा दी जाती है, इंसान का निशान मिटा दिया जाता है।
आज के अख़बारों में कौन कह पाता है?
करते मानवता की बात हैं, क्या मानवता का 'म' पता है?
चलो ये तो छोड़ो, गंगा जमुनी अभियान चलाए जाते हैं,
अबोरो टन सफाई कराई जाती है, क्या ये सच्चाई?
बड़ी जहाजों से गंगा दूषित की जाती है, कोई भी गंदा पानी यूँ ही बहाया जाता है।
एक दिखावा देते हैं, सफाई कराई जाती है।
बराबर की बातें करते हैं, बढ़तों की उन्नति खटकती है।
शिक्षा की तो बात छोड़ो, इसका तो कोई तोड़ नहीं,
हर साल बच्चे मरते हैं, उनका तो कोई मोल नहीं,
हर साल स्कूल बंद कराए जाते हैं,
हर साल सरकारी सेंटर बनाए जाते हैं।
और गर्व से कहते हैं—हमारा भारत महान,
या ये मिट्टी दूषित है, है ये ही सच्चाई।