"किनारा"
हर बढ़ता कदम मुझे खुद से दूर ले जा रहा है...
आगे तो बढ़ रही हूँ, पर क्या यही वो राह है
जिस पर चलने को कभी मेरा जी चाहता था?
नहीं रहना था मुझे अर्श पर,
निशान तो चाहिए थे मुझे अपने ही फ़र्श पर।
मगर ज़िंदगी की भाग-दौड़ में
मैं उन कदमों से कदम मिलाने लगी,
जो कभी मेरे थे ही नहीं...
क्यों काट रही हूँ मैं वो फसल,
जिसके बीज मैंने कभी बोये ही नहीं?
क्यों सवार हूँ मैं उस कश्ती पर,
जो भटक गई है समुंदर की लहरों में?
क्योंकि रास्ते बदल गए,
और मैं खुद को भूल गई।
पर दूर कहीं एक किनारा नज़र आता है...
शांत, मौन, समुंदर के शोर से जुदा।
क्या जी सकती हूँ मैं उस शांत किनारे पर?
क्या लौट सकती हूँ मैं वापस... खुद तक?
हाँ। क्योंकि किनारा कहीं बाहर नहीं,
वो तेरे ही अंदर सोया है।
जिस दिन तू रुकेगी,
और लहरों का शोर सुनने के बजाय
अपनी साँस की आहट सुनेगी...
उस दिन कश्ती खुद मुड़ जाएगी,
और हर कदम तुझे तुझ तक ले जाएगा।
तू अर्श की नहीं, अपने फ़र्श की है
और तेरा निशान वहीं बनेगा।
प्राची गुर्जर ….