"सच का स्वाद"
मैं सोचती हूँ...
सच इतना कड़वा क्यों होता है?
कि सही होकर भी उसे
कोई पीना नहीं चाहता।
मैं उलझन में हूँ...
सच अगर सही है,
तो उससे आँख मिलाने से
हर कोई क्यों कतराता है?
क्या हो...
अगर हर ज़ुबान पर
सिर्फ कड़वा सच उगने लगे?
क्या रिश्ते तब भी मिठास से जी पाएँगे,
या अपने ही हाथों से
रेत की तरह फिसल जाएँगे?
क्या तब ईमान ज़िंदा रहेगा,
या झूठ के घूँघट में
हर कोई सादिक़ बना रहेगा?
शायद सच कड़वा इसलिए है,
क्योंकि उसमें चीनी मिलाने की इजाज़त नहीं।
और झूठ मीठा इसलिए लगता है,
क्योंकि उसे हम अपने हाथों से घोलते हैं।
पर मैं कहती हूँ,
कड़वी दवा ही मर्ज़ मिटाती है,
और मीठा ज़हर...
सिर्फ़ मौत बाँटता है।
प्राची तंवर…..