—आख़िरी रास्ता—
अब दरख़्त सूखे पत्तों से घिरे हैं,
हवाएँ उदासी में झूम रही हैं।
महफ़िलों को सन्नाटों ने घेर रखा है।
तन्हाइयाँ वीरान सड़कों पर घूम रही हैं,
उड़ाने थक गईं तो इन परिन्दों ने,
अब ख़ाक को ही आशियाँ बना लिया है।
ये क्या चल रहा है, ये कैसा मौसम बदल रहा है,
सूरज पश्चिम से निकल पूरब में ढल रहा है।
क्यों अब शांत हैं वो लोग, जिनकी आवाज़ों में शोर था?
क्यों अब वो दिखाई नहीं देती, वो शान-ओ-शौकत?
क्या खो दिया उन्होंने, जिसका उन्हें इल्म ही नहीं,
वो अब आख़िरी रास्ते पर हैं मौजूद, और उन्हें ख़बर ही नहीं।
-MASHAALLHA