The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
शिक्षक दिवस पर कविता गुरु वो जो सन्मार्ग दिखाए सिर्फ सिलेबस ही न पूरा कराए छात्र का सर्वांगीण विकास कराए देशप्रेम, और नैतिकता सिखाए मन की सारी गांठे खोले कानों में मिश्री सी घोले करे चरित्र निर्माण, मानवता सिखाए जिसके सानिध्य में आकर मन गंगा सा निर्मल हो जाए शिष्य बिना संकोच मन की बात कह पाए करे हमेशा प्रोत्साहित और हौसला बढ़ाए ऐसे गुरु अगर मिल जाए जीवन अपना धन्य हो जाए ऐसी गुरु-शिष्य परंपरा कहाँ से लाए गुरु भक्त अरुणि, एकलव्य याद आएं ना वो गुरु रहे, ना वो शिष्य बेशर्मी की हद तो देखो शिष्य आज का गुरु को आंख दिखाए जब सम्मान ही नहीं गुरु का मन में तो ऐसे बच्चे ज्ञान कहाँ से पाए डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
कविता - श्राद्ध पक्ष कवयित्री डॉ वंदना शर्मा आता है हर वर्ष क्वार में, पूर्वजों के तर्पण के लिए श्राद्ध पक्ष, महिमा बड़ी है इन 16 दिनों की, सोलह तिथियाँ सभी पूजी जातीं। सबका सम्मान करें, सब है समान, सनातन धर्म यही सिखलाता, न कोई छोटा, न कोई बड़ा, सबका अपना महत्व, सबको पूजा जाता, यह हमारे सनातन की परंपरा है, नदी, पर्वत, अग्नि या हो धरा, सबके प्रति कृतज्ञता, धन्यवाद करो। शायद इसीलिए ऋषि मुनियों ने, सोलह तिथियों के निमित्त, बनाए दान-तर्पण के पर्व। बिना श्रद्धा के किया तो सब व्यर्थ, करने से पहले जानो इनका अर्थ, कुछ मूर्ख अभिमानी करते हैं दिखावा, जीवित माँ-बाप को पूछते नहीं, मरने के बाद दान कर छुपाए कर्म, पाप कर्म जो कभी छिपता नहीं, सत्य कभी झुकता नहीं। समय रहते कर लो, सेवा अपने मां-बाप की, ले लो दुआएं मां-बाप की, इहलोक भी सुधरेगा, और परलोक भी। है सार्थक तभी दान-तर्पण, जब मां-बाप खुश हैं इस धरा पर, करो पूर्वजों का आभार, जिनके वंशज हो तुम, मिलेगी मुक्ति उनको, और सुख शांति तुमको भी। उड़ो चाहे कितना भी, छू लो तुम सारा आकाश, पर मत भूलो जड़ों को अपनी, यही है जीवन का आधार। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली vandna.reporter@gmail.com
कविता -हिंदी को संपर्क भाषा बनाते हैं कवयित्री डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली आओ एक संकल्प लेते हैं हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाते हैं विश्व में सभी से हिंदी में बतियाते हैं हिंदी की मिठास से, जग को मिलवाते हैं गर्व करे अपनी भाषा पर हम गर्व से बोले हिंदी और हिंदी को वैश्विक भाषा बनाते हैं बच्चों को संस्कार सिखाए हिंदी अपनापन बढ़ाए हिंदी आओ देवनागरी लिखना सिखाते हैं रिश्तों का अटूट बंधन है हिंदी बड़ों का सम्मान, छोटों का दुलार हिंदी ऊर्जा का संचार है इसमें ध्वनि नाद ब्रह्माण्ड का इसमें आओ जन-जन तक हिंदी पहुंचाते हैं छोड़ मतभेद भाषा के सारे हिंदी को जनभाषा बनाते हैं हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाते हैं। डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली vandna.reporter@gmail.com
गीत -ओ कान्हा, आया जन्मदिन तेरा कवयित्री डॉ वंदना शर्मा ओ कान्हा, आया जन्मदिन तेरा फूल भी लाऊं, माखन भी लाऊं सारे घर को सजाऊं, और बता तुझे कैसे रिझाऊं ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा फल भी चढ़ाऊं, मेवा चढ़ाऊं अपने मन के श्रद्धा सुमन भी सब तुझे अर्पण कर दूं और बता तुझे कैसे रिझाऊं ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा भजन मैं गाऊं, आरती गाऊं सुबह शाम बस तेरा ही नाम रटती जाऊं तुझे ही गाऊं और बता तुझे कैसे रिझाऊं ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा सबकी बिगड़ी तू बनाता सबको गले से लगाता मेरी भी बिगड़ी बना दे मुझको भी अपना बना ले चरणों में थोड़ी सी जगह दे और कहीं अब चैन न पाऊं और बता तुझे कैसे रिझाऊं ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली vandna.reporter@gmail.com
आया राखी का त्योहार डॉ. वंदना शर्मा आया राखी का त्योहार चारों तरफ छाई बहार भाई को है बहना का इंतजार सज गए देखो सारे बाजार आया राखी का त्योहार बहना ने कलाई पर प्यार बांधा है सिर्फ धागा नहीं ये, रक्षा सूत्र बांधा है दुआओं के साथ, आशीर्वाद बांधा है सलामत रहे मेरे भाई का परिवार रेशम की डोर ने यह संसार बांधा है समझो तो ये धागा प्रेम का अनमोल है सब रिश्तों में ना समझो तो बंधन है रीत और रिवाजों का यह धागा है विश्वास का समझो तो लाख का ना समझो तो राख का मान है एक-दूजे का सदियों से चली आई परंपरा का पैसों से ना तौलो भैया मेरी राखी का मोल मिलता है बड़े नसीब से ये पल मेरी राखी है बड़ी अनमोल रुपया पैसा ना बहना चाहे वो तो बस भाई का स्नेह चाहे मायके की देहरी चाहे भाई की आँखों में मान चाहे दे भर-भर दुआएँ, थोड़ा सा प्यार चाहे द्वेष की बातों से ना करो इसे बेकार आया राखी का त्योहार डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
कविता बने पूरक एक दूजे के कवियत्री डॉ वंदना शर्मा अपने लिए जीना भी कितना मुश्किल होता है ना चार ताने दस निगोहे पीछा करती दिन भर क्यों नारी को त्याग की देवी बना पूजा गया क्या इंसान बने रहना काफी नहीं था जीने के लिए सबके लिए जीते हुए खुद जीना भूल जाती है नारी घर तो सबका है, हक जताते सभी देखभाल की जिम्मेदारी भी तो बारी-बारी निभाओ सभी नारी को नारी ही समझो घर से न बांधो कभी घर शब्द आराम का सूचक है वही घर कामकाजी स्त्री के लिए थकान और जिम्मेदारी है वही घर गृहिणी के लिए पूरे दिन की देखभाल लाचारी है करें अगर सब अपना-अपना काम बने आत्मनिर्भर, नारी को दे सम्मान तो बोझ न लगे किसी को गृहस्थी सबका अपना-अपना हो आसमान बने पूरक एक-दूजे के सहयोग से होते सारे काम डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
मेरी हिंदी भाषा मधुरता वाणी में टपकती हिंदी में जब कोई बात करें अपनापन दिल को छू जाता भाषा की शालीनता और गरिमा उसे मधुर बनाती है छेड़ देती तार झंकृत हृदय के मेरी हिंदी भाषा जब मुखरित होती है शब्द दिल को छू जाते गहराई से बात जो हिंदी कहती है हिंदी में जो अपनापन है रिश्तों का मामा, चाचा, ताऊ, मौसी, बुआ सबका लाड मिलता, खास लगता अन्य किसी भाषा में वो बात कहां प्रेम व्यक्त करे जो हिंदी जैसा बड़े का सम्मान, रिश्तों की मर्यादा भाषा हिंदी सबको जोड़े बांध नेह का धागा भावनाओं में बहती रस धार है हिंदी दिल को दिल से जोड़े, मधुर राग है हिंदी रिश्तों की सूत्रधार है भाषा हिंदी डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
कविता वो स्त्री है लेखिका डॉ वंदना शर्मा वह निष्प्राण सी है अपनी मर्यादाओं के कारण लेकिन मरती नहीं है क्यूंकि वो स्त्री है सृजन करती है दर्द सहकर विनाश भी कर सकती है काली बनकर वो शक्ति है जग की उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता समाज ने डाली बेड़िया पैरों में उसके ताकि उसकी उड़ान रोक सके पर बहती हवा को कौन रोक पाया है आज तक उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता कोई मन्नत नहीं मांगी जाती फिर भी वो जीती है ज्यादा बोये जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियां स्प्रिंग देखी है कभी आपने जितना दबाओं उतना उछलती है स्त्री की असीम शक्ति से डर लगाई पाबंदी पुरूष समाज ने पर वो शक्ति और अधिक मुखरित हुई अपनी राह खुद बनाई वो चांद पर जा वापिस आयी हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया नभ अपने कदमों में झुकाया क्योंकि वो स्त्री है हार नहीं सकती परिस्थितियां अनुकूल भले न हो वो लडऩा जानती है वो स्त्री है हर सीमा से परे हर बाधा उससे डरे वो कुछ भी कर सकती है शक्ति बिना शिव अधूरे शक्ति से हो सारे कार्य पूरे कण कण में व्याप्त है जो जो ऊर्जा जो प्राण है वो स्त्री है डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
बड़ी सयानी बरखा रानी बादल संग बरसाए पानी बुलाने पर तो आती नहीं बिन बुलाए बरसाए पानी बरखा रानी बड़ी सयानी बादल संग बरसाए पानी जब भी मैं बाहर खेलने जाऊँ गर्मी से परेशान हो जाऊँ देख आसमां में काले बादल मन ही मन हरसाऊँ पर उस समय तो तुम करती अपनी मनमानी क्यूं नहीं बरसाती पानी जब मुझे हो स्कूल जाना तुम चुपके से आ जाना नहीं पड़ेगा मुझको स्कूल जाना मुझे पसंद है बारिश में गरम-गरम पकोड़ी खाना रिमझिम-रिमझिम करके खूब बरसना बरखा रानी जब भी बुलाऊँ, तुम आ जाना मत तरसाना बरखा रानी बरखा रानी बड़ी सयानी बादल संग बरसाए पानी डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
शिक्षक दिवस पर मेरे सभी गुरुजनों को समर्पित सौभाग्य है जो ऐसे गुरु मिले सबकी कृपा है मैंने पायी हुई मेरे महादेव की कृपा जो ऐसे गुरुजनों से शिक्षा मैंने पाई भोला भाला मन था मेरा संस्कार और नीति मुझे सिखाई पाकर स्नेह उनका हुआ प्रफुल्लित मन भाग्य पर अपने मैं भी इतराई शब्दों का मर्म सिखवाया अर्थ में गहनता तब आई मेरी गलती पर मुझे सुधारा लेखन की बारीकी समझाई थी अनजान चालाकियों से जग की दे ज्ञान मुझे नई राह दिखलाई बन प्रेरणा मेरी मुझे रास्ता दिखवाया हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया सत्य और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया आशीर्वाद से उनके मैंने ये सफलता पाई बारम्बार धन्यवाद मेरे गुरुजन को देती हूँ शिक्षक दिवस की आपको बधाई डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved | Powered by Custom Web Development Company India.
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser