Quotes by Vandna Sharma in Bitesapp read free

Vandna Sharma

Vandna Sharma

@drvandnasharma8596
(56.9k)

शिक्षक दिवस पर कविता

गुरु वो जो सन्मार्ग दिखाए
सिर्फ सिलेबस ही न पूरा कराए
छात्र का सर्वांगीण विकास कराए
देशप्रेम, और नैतिकता सिखाए
मन की सारी गांठे खोले
कानों में मिश्री सी घोले
करे चरित्र निर्माण, मानवता सिखाए
जिसके सानिध्य में आकर
मन गंगा सा निर्मल हो जाए
शिष्य बिना संकोच मन की बात कह पाए
करे हमेशा प्रोत्साहित और हौसला बढ़ाए
ऐसे गुरु अगर मिल जाए
जीवन अपना धन्य हो जाए
ऐसी गुरु-शिष्य परंपरा कहाँ से लाए
गुरु भक्त अरुणि, एकलव्य याद आएं
ना वो गुरु रहे, ना वो शिष्य
बेशर्मी की हद तो देखो
शिष्य आज का गुरु को आंख दिखाए
जब सम्मान ही नहीं गुरु का मन में
तो ऐसे बच्चे ज्ञान कहाँ से पाए
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

Read More

कविता - श्राद्ध पक्ष
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

आता है हर वर्ष क्वार में,
पूर्वजों के तर्पण के लिए श्राद्ध पक्ष,
महिमा बड़ी है इन 16 दिनों की,
सोलह तिथियाँ सभी पूजी जातीं।

सबका सम्मान करें, सब है समान,
सनातन धर्म यही सिखलाता,
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
सबका अपना महत्व,
सबको पूजा जाता,
यह हमारे सनातन की परंपरा है,
नदी, पर्वत, अग्नि या हो धरा,
सबके प्रति कृतज्ञता, धन्यवाद करो।

शायद इसीलिए ऋषि मुनियों ने,
सोलह तिथियों के निमित्त,
बनाए दान-तर्पण के पर्व।

बिना श्रद्धा के किया तो सब व्यर्थ,
करने से पहले जानो इनका अर्थ,
कुछ मूर्ख अभिमानी करते हैं दिखावा,
जीवित माँ-बाप को पूछते नहीं,
मरने के बाद दान कर छुपाए कर्म,
पाप कर्म जो कभी छिपता नहीं,
सत्य कभी झुकता नहीं।

समय रहते कर लो,
सेवा अपने मां-बाप की,
ले लो दुआएं मां-बाप की,
इहलोक भी सुधरेगा,
और परलोक भी।

है सार्थक तभी दान-तर्पण,
जब मां-बाप खुश हैं इस धरा पर,
करो पूर्वजों का आभार,
जिनके वंशज हो तुम,
मिलेगी मुक्ति उनको,
और सुख शांति तुमको भी।

उड़ो चाहे कितना भी,
छू लो तुम सारा आकाश,
पर मत भूलो जड़ों को अपनी,
यही है जीवन का आधार।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

Read More

कविता -हिंदी को संपर्क भाषा बनाते हैं
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली


आओ एक संकल्प लेते हैं
हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाते हैं
विश्व में सभी से हिंदी में बतियाते हैं
हिंदी की मिठास से, जग को मिलवाते हैं

गर्व करे अपनी भाषा पर हम
गर्व से बोले हिंदी और
हिंदी को वैश्विक भाषा बनाते हैं

बच्चों को संस्कार सिखाए हिंदी
अपनापन बढ़ाए हिंदी
आओ देवनागरी लिखना सिखाते हैं

रिश्तों का अटूट बंधन है हिंदी
बड़ों का सम्मान, छोटों का दुलार हिंदी
ऊर्जा का संचार है इसमें
ध्वनि नाद ब्रह्माण्ड का इसमें

आओ जन-जन तक हिंदी पहुंचाते हैं
छोड़ मतभेद भाषा के सारे
हिंदी को जनभाषा बनाते हैं
हिंदी को सम्पर्क भाषा बनाते हैं।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

Read More

गीत -ओ कान्हा, आया जन्मदिन तेरा
कवयित्री डॉ वंदना शर्मा

ओ कान्हा, आया जन्मदिन तेरा
फूल भी लाऊं, माखन भी लाऊं
सारे घर को सजाऊं, और
बता तुझे कैसे रिझाऊं

ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा
फल भी चढ़ाऊं, मेवा चढ़ाऊं
अपने मन के श्रद्धा सुमन भी
सब तुझे अर्पण कर दूं
और बता तुझे कैसे रिझाऊं

ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा
भजन मैं गाऊं, आरती गाऊं
सुबह शाम बस तेरा ही
नाम रटती जाऊं तुझे ही गाऊं
और बता तुझे कैसे रिझाऊं

ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा
सबकी बिगड़ी तू बनाता
सबको गले से लगाता
मेरी भी बिगड़ी बना दे
मुझको भी अपना बना ले
चरणों में थोड़ी सी जगह दे
और कहीं अब चैन न पाऊं
और बता तुझे कैसे रिझाऊं
ओ कान्हा आया जन्मदिन तेरा

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com

Read More

आया राखी का त्योहार
डॉ. वंदना शर्मा

आया राखी का त्योहार
चारों तरफ छाई बहार
भाई को है बहना का इंतजार
सज गए देखो सारे बाजार
आया राखी का त्योहार

बहना ने कलाई पर प्यार बांधा है
सिर्फ धागा नहीं ये, रक्षा सूत्र बांधा है
दुआओं के साथ, आशीर्वाद बांधा है
सलामत रहे मेरे भाई का परिवार
रेशम की डोर ने यह संसार बांधा है

समझो तो ये धागा प्रेम का
अनमोल है सब रिश्तों में
ना समझो तो बंधन है
रीत और रिवाजों का
यह धागा है विश्वास का

समझो तो लाख का
ना समझो तो राख का
मान है एक-दूजे का
सदियों से चली आई परंपरा का

पैसों से ना तौलो भैया मेरी राखी का मोल
मिलता है बड़े नसीब से ये पल
मेरी राखी है बड़ी अनमोल
रुपया पैसा ना बहना चाहे
वो तो बस भाई का स्नेह चाहे
मायके की देहरी चाहे
भाई की आँखों में मान चाहे
दे भर-भर दुआएँ,
थोड़ा सा प्यार चाहे

द्वेष की बातों से ना करो इसे बेकार
आया राखी का त्योहार

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

Read More

कविता बने पूरक एक दूजे के
कवियत्री डॉ वंदना शर्मा

अपने लिए जीना भी
कितना मुश्किल होता है ना
चार ताने दस निगोहे
पीछा करती दिन भर
क्यों नारी को त्याग की
देवी बना पूजा गया
क्या इंसान बने रहना
काफी नहीं था जीने के लिए
सबके लिए जीते हुए
खुद जीना भूल जाती है नारी
घर तो सबका है, हक जताते सभी
देखभाल की जिम्मेदारी भी तो
बारी-बारी निभाओ सभी
नारी को नारी ही समझो
घर से न बांधो कभी
घर शब्द आराम का सूचक है
वही घर कामकाजी स्त्री के लिए
थकान और जिम्मेदारी है
वही घर गृहिणी के लिए पूरे दिन
की देखभाल लाचारी है
करें अगर सब अपना-अपना काम
बने आत्मनिर्भर, नारी को दे सम्मान
तो बोझ न लगे किसी को गृहस्थी
सबका अपना-अपना हो आसमान
बने पूरक एक-दूजे के
सहयोग से होते सारे काम

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

Read More

मेरी हिंदी भाषा

मधुरता वाणी में टपकती
हिंदी में जब कोई बात करें
अपनापन दिल को छू जाता
भाषा की शालीनता और गरिमा
उसे मधुर बनाती है

छेड़ देती तार झंकृत हृदय के
मेरी हिंदी भाषा जब मुखरित होती है
शब्द दिल को छू जाते
गहराई से बात जो हिंदी कहती है

हिंदी में जो अपनापन है रिश्तों का
मामा, चाचा, ताऊ, मौसी, बुआ
सबका लाड मिलता, खास लगता
अन्य किसी भाषा में वो बात कहां

प्रेम व्यक्त करे जो हिंदी जैसा
बड़े का सम्मान, रिश्तों की मर्यादा
भाषा हिंदी सबको जोड़े
बांध नेह का धागा

भावनाओं में बहती रस धार है हिंदी
दिल को दिल से जोड़े, मधुर राग है हिंदी
रिश्तों की सूत्रधार है भाषा हिंदी
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

Read More

कविता वो स्त्री है
लेखिका डॉ वंदना शर्मा




वह निष्प्राण सी है अपनी मर्यादाओं के कारण
लेकिन मरती नहीं है
क्यूंकि वो स्त्री है
सृजन करती है दर्द सहकर
विनाश भी कर सकती है काली बनकर
वो शक्ति है जग की
उसकी जिजीविषा को कोई नहीं हरा सकता
समाज ने डाली बेड़िया पैरों में उसके
ताकि उसकी उड़ान रोक सके
पर बहती हवा को
कौन रोक पाया है आज तक
उसके लिए कोई व्रत नहीं रखा जाता
कोई मन्नत नहीं मांगी जाती
फिर भी वो जीती है ज्यादा
बोये जाते हैं बेटे उग आती हैं बेटियां
स्प्रिंग देखी है कभी आपने
जितना दबाओं उतना उछलती है
स्त्री की असीम शक्ति से डर
लगाई पाबंदी पुरूष समाज ने
पर वो शक्ति और अधिक मुखरित हुई
अपनी राह खुद बनाई
वो चांद पर जा वापिस आयी
हर अभेद क्षेत्र में परचम लहराया
नभ अपने कदमों में झुकाया
क्योंकि वो स्त्री है
हार नहीं सकती
परिस्थितियां अनुकूल भले न हो
वो लडऩा जानती है
वो स्त्री है
हर सीमा से परे
हर बाधा उससे डरे
वो कुछ भी कर सकती है
शक्ति बिना शिव अधूरे
शक्ति से हो सारे कार्य पूरे
कण कण में व्याप्त है जो
जो ऊर्जा जो प्राण है
वो स्त्री है
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

Read More

बड़ी सयानी बरखा रानी
बादल संग बरसाए पानी
बुलाने पर तो आती नहीं
बिन बुलाए बरसाए पानी

बरखा रानी बड़ी सयानी
बादल संग बरसाए पानी

जब भी मैं बाहर खेलने जाऊँ
गर्मी से परेशान हो जाऊँ
देख आसमां में काले बादल
मन ही मन हरसाऊँ
पर उस समय तो तुम
करती अपनी मनमानी
क्यूं नहीं बरसाती पानी

जब मुझे हो स्कूल जाना
तुम चुपके से आ जाना
नहीं पड़ेगा मुझको स्कूल जाना
मुझे पसंद है बारिश में
गरम-गरम पकोड़ी खाना

रिमझिम-रिमझिम करके
खूब बरसना बरखा रानी
जब भी बुलाऊँ, तुम आ जाना
मत तरसाना बरखा रानी

बरखा रानी बड़ी सयानी
बादल संग बरसाए पानी

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

Read More

शिक्षक दिवस पर मेरे सभी गुरुजनों को समर्पित

सौभाग्य है जो ऐसे गुरु मिले
सबकी कृपा है मैंने पायी
हुई मेरे महादेव की कृपा जो
ऐसे गुरुजनों से शिक्षा मैंने पाई

भोला भाला मन था मेरा
संस्कार और नीति मुझे सिखाई
पाकर स्नेह उनका हुआ प्रफुल्लित मन
भाग्य पर अपने मैं भी इतराई

शब्दों का मर्म सिखवाया
अर्थ में गहनता तब आई
मेरी गलती पर मुझे सुधारा
लेखन की बारीकी समझाई

थी अनजान चालाकियों से जग की
दे ज्ञान मुझे नई राह दिखलाई
बन प्रेरणा मेरी मुझे रास्ता दिखवाया
हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाया

सत्य और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया
आशीर्वाद से उनके मैंने ये सफलता पाई
बारम्बार धन्यवाद मेरे गुरुजन को
देती हूँ शिक्षक दिवस की आपको बधाई

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली

Read More