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जन्माष्टमी है। कहाँ से बात शुरू करें? क्या शुरू करें? शुरू कुछ तब किया जाता है, जब वो पहले कभी ना रहा हो, या रुका रहा हो। कृष्ण हमारे लिए कभी शुरू नहीं होते। साल भर मौजूद रहे हैं, प्रतिदिन ही नहीं, पल-पल रहे हैं। जब वो हमारे लिए कभी समाप्त ही नहीं होते, तो उनको शुरू कैसे करें? कम्यूनिटी के लिए जन्माष्टमी आदि दिवस बड़े न्यारे हो जाते हैं। आज हमारे गुरु (वो स्वयं को कुछ भी कहें, हम तो उन्हें गुरु ही कहेंगे) फिर से मंच से दहाड़ेंगे। पिछले हफ़्ते का गोवा शिविर पूरा किया, और अगले ही दिन - सोमवार - बोधस्थल के लिए निकल गए। रोज़ स्थानीय यात्रा करी, ताबड़तोड़ मीटिंग करीं। और मंगलवार को वायरल पकड़ लिया। फिर बुख़ार में ही गोवा वापस आ गए। हम अभी पूछ रहे हैं कि सुबह इस स्थिति में कैसे जन्माष्टमी मनेगी, तो कह रहे हैं कि बिना काली अंधेरी रात के, बिना बाढ़ के, बिना तूफ़ान के, बिना बेड़ियों के, कृष्ण का जन्म हुआ था क्या? कोई क्या जवाब दे ऐसी बातों का? तो बस गाढ़ी अदरक की चाय देकर हम सामने से हट गए। सुबह तक वो किताब पर काम करेंगे, और हम उनको घंटे-घंटे पर मस्त काढ़ा पिलाते रहेंगे। फिर हमने सोचा उनको तो कुछ बोल नहीं सकते, आपको ही बताए देते हैं। तो हमने कहा कि जन्माष्टमी हमारे लिए न्यारी हो जाती है। क्यों? अजात और अजन्मे का जन्मदिवस मनाना है। अद्भुत बात है। जिसका न जन्म है न मृत्यु, एक विशेष दिन उसका जन्मदिवस मनाना है। ये कैसे करें? जिसका नाम 365 दिनों में भी नहीं समाता, उसके नाम कोई एक दिन कैसे करें? असंभव नहीं है, एक सुंदर विधि मौजूद है: ये एक दिन इस बात को याद करने का है कि सारे ही दिन उन्हीं के हैं। ये एक दिन ये याद करने का है कि अजात का जन्म या तो कभी नहीं होगा, या प्रतिदिन होगा। जन्माष्टमी का दिन इसलिए है ताकि कृष्ण को प्रतिदिन स्मरण रखा जा सके। जन्माष्टमी इसलिए नहीं है कि एक दिन ही ज़्यादा याद रखा, और बाक़ी दिनों पर कम। जन्माष्टमी ये प्रण लेने का दिवस है कि प्रतिदिन सत्य को याद रखेंगे अधिकतम। श्रीकृष्ण की बात हो और गीता की नहीं, ये असंभव है। और कृष्ण की पूरी शिक्षा ही युद्धक्षेत्र की है। युद्ध की पृष्ठभूमि में ही गीता गरजती है। आज का युद्धक्षेत्र विकट है। कौरव चढ़े हुए हैं। बल, संसाधन, शस्त्र, सत्ता, संपदा सब उन्हीं के हाथों में है। तब तो उन्होंने बस हस्तिनापुर हड़पा था, आज पूरी पृथ्वी हड़प ली है। नदी, पहाड़, जीव, स्त्री-पुरुष - सब पर उनका कब्ज़ा है। और तो और, धर्म शब्द पर भी उनका कब्ज़ा है। युद्ध के लिए बड़े संसाधन जुटाने पड़े थे। स्वयं कृष्ण भी जानते थे कि बिना सैनिकों और शस्त्रों के ये लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। कृष्ण जिस पक्ष के साथ खड़े हों, वो पक्ष भी कृष्ण की उपस्थिति के साथ-साथ भौतिक संसाधन भी माँगता है। बिना सेना के पांडव भी क्या कर लेते? कृष्ण तो हमारे साथ प्रतिदिन हैं ही। कमी सैनिकों, शस्त्रों और संसाधनों की रहती है। यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ (जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं श्री है, विजय है, ऐश्वर्य है और अचल नीति है) योगेश्वर तो खड़े हैं, धनुष उठाने की बारी हमारी है। जन्माष्टमी पर आइए, साथ खड़
एक ऐसा पर्व, जो हमें कृष्ण के समीप ले जाता है, जो हमें कृष्ण के जीवन से परिचित कराता है। आचार्य जी ने समझाया था कि जन्म सभी का बंधन और अँधेरे में ही होता है, जैसे कृष्ण का हुआ था। और उस बंधन और अँधेरे से भी जीवन की उत्कृष्टता और जो उच्चतम अवस्था है, उसे हासिल किया जा सकता है। उस संभावना को साकार करते हैं श्री कृष्ण और इसीलिए हम सब जन्माष्टमी मनाते हैं। लेकिन जो पर्व जीवन के बंधनों और अँधेरों से प्रकाश और मुक्ति की तरफ़ ले जाने का प्रतीक है, उसी पर्व पर लाखों-करोड़ों लोग कृष्ण से दूर हो जाएँगे, क्योंकि उन तक कृष्ण की जो छवियाँ पहुँचाई जा रही हैं, जो कृष्ण के बारे में उन्हें ज्ञान दिया जा रहा है, वो विकृत और विषैला है। आपकी संस्था लगातार गीता के माध्यम से कृष्ण के वास्तविक स्वरूप को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास कर रही है। आचार्य जी ने कहा था कि आज का धर्मयुद्ध वास्तव में प्रचारयुद्ध है। आज का कुरुक्षेत्र प्रचार क्षेत्र है। जो प्रचार को जीत लेगा, वो तय करेगा कि धर्म जीतेगा या अधर्म। आज हमें धर्म तो जीतता नहीं दिख रहा है, वरना पृथ्वी विनाश के कगार पर खड़ी नहीं होती, हर तरह से मानव इतना विकृत नहीं होता। इस जन्माष्टमी पर लाखों लोगों के जीवन में कृष्ण पहुँच सकते हैं, हजारों लोग गीता सत्रों में जुड़ सकते हैं, अगर आप उसके लिए माध्यम बनें तो। पिछले महीने संस्था को बेहद कम संसाधन मिले थे। इस महीने की शुरुआत कुछ खास नहीं है। और जो श्री कृष्ण के नाम पर पाखंड-अंधविश्वास फैला रहे हैं, जो गीता को विकृत कर रहे हैं, वो हजारों करोड़ में खेल रहे हैं। आज ज़रूरी है कि गीता के लिए, धर्म के लिए समर्पित होकर आगे आइए और इस जन्माष्टमी पर माध्यम बनिए सत्य को, कृष्ण को, गीता को जन-जन तक पहुँचाने का। निर्मम होकर धर्म के लिए समर्पित होइए।
miss you fevrite
hari unit me th
🌍 आर्कटिक की पिघलती बर्फ़ खोल रही नया समुद्री रास्ता 🧊 नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी तट के साथ आर्कटिक महासागर से होकर एशिया और यूरोप को जोड़ता है। समुद्री बर्फ़ के कारण लंबे समय तक इस रास्ते पर जहाज़ों की आवाजाही मुश्किल रही। अब गर्मियों में बर्फ़ का फैलाव कम होने से यहाँ जहाज़ों की आवाजाही आसान हो रही है। 🚢 और यह अब सिर्फ़ संभावना नहीं है। अगस्त 2026 में चीन ने इसी रास्ते से यूरोप के लिए नियमित मौसमी मालवाहक सेवा शुरू कर दी है। दक्षिण कोरिया ने भी इसी रास्ते पर व्यावसायिक परीक्षण शुरू किया है। ⏱️ इसकी वजह साफ़ है। 2025 में चीन के निंगबो से ब्रिटेन के फेलिक्सस्टो तक इसी रास्ते की एक परीक्षण यात्रा करीब 20 दिनों में पूरी हुई थी, जबकि स्वेज़ नहर के रास्ते यही यात्रा लगभग 40 दिन ले सकती है। 📦 कम दूरी, कम यात्रा समय और कई मार्गों पर ईंधन की बचत ने इस रास्ते को व्यापार के लिए आकर्षक बनाया है। 🌡️ लेकिन इसी खबर में एक और संख्या है। 📉 1980 से 2024 के बीच आर्कटिक की सितंबर समुद्री-बर्फ़ का क्षेत्रफल 35.8% घट चुका है। 2013 से 2023 के बीच आर्कटिक में प्रवेश करने वाले जहाज़ों की संख्या 37.3% बढ़ी। और इन जहाज़ों से निकलने वाला ब्लैक कार्बन बर्फ़ और हिम पर जम सकता है। सफ़ेद सतह के गहरे पड़ने पर वह सूर्य की रोशनी कम लौटाती है और ज्यादा गर्मी सोखती है, जिससे बर्फ़ के पिघलने की गति बढ़ सकती है। 🔄 बर्फ़ घटी, तो आर्कटिक के समुद्री रास्ते जहाज़ों के लिए अधिक सुगम हुए। व्यापारिक संभावनाएँ बढ़ीं, तो जहाज़ों की आवाजाही भी बढ़ी। लेकिन यही बढ़ती आवाजाही ब्लैक कार्बन जैसे उत्सर्जनों के ज़रिए आर्कटिक के नाज़ुक पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। ⚡ एक ही बदलाव है। उसका एक अर्थ जलवायु संकट है, दूसरा व्यापार का अवसर। 👁️ यहीं अहंकार का सूक्ष्म खेल दिखाई देता है। आर्कटिक की बर्फ़ का कम होना जलवायु संकट का संकेत है। लेकिन जैसे ही उसी बदलाव से व्यापार का लाभ दिखाई देता है, हमारी प्राथमिकता बदल जाती है। संकट वही रहता है, लेकिन अब हमारी नज़र उसके भीतर मिलने वाले लाभ पर टिक जाती है। 🌐 यहीं आर्कटिक की कहानी हमारे जीवन से जुड़ती है। 📈 तेज़ व्यापार, सस्ती चीज़ें और अधिक सुविधा की माँग केवल बाज़ार की माँग नहीं है। इन्हें चलाने वाली हमारी अपनी चाह भी है। हम सुविधा चाहते हैं, इसलिए उत्पादन बढ़ता है; उत्पादन बढ़ता है, इसलिए संसाधनों और प्रकृति पर दबाव बढ़ता है। फिर उसी दबाव से पैदा हुआ संकट सामने आता है और जब उसमें कोई नई सुविधा मिलती है, तो हम उसे अवसर की तरह देखने लगते हैं। ⚠️ इसलिए समस्या केवल यह नहीं कि हम संकट को नहीं देखते। कभी-कभी हम संकट को देखते हुए भी उसी केंद्र को पकड़े रहते हैं, जो उस संकट को बढ़ाने वाली व्यवस्था को चलाती है। ❓ पिघलती बर्फ़ हमें संकट दिखा रही है, फिर भी उसमें खुलता रास्ता हमें आकर्षित क्यों कर रहा है?
“नहीं” कहना था… फिर भी मुँह से “हाँ” निकल गया। कोई आपसे मदद माँगता है हाँ। कोई अपना काम आप पर डाल देता है हाँ। आप पहले से व्यस्त हैं फिर भी हाँ। मन बिल्कुल नहीं है फिर भी बोल देते हैं, “ठीक है, कर दूँगा।” और बाद में अकेले में सोचते हैं “मैं हर बार मना क्यों नहीं कर पाता?” 🧠 इसके पीछे एक कारण हो सकती है-दूसरों को खुश रखने की प्रवृत्ति। इसमें व्यक्ति दूसरों की स्वीकृति को इतना महत्व देने लगता है कि अपनी सीमाओं से समझौता करने लगता है। शोध में इसे अस्वीकृति, अलग-थलग पड़ने और टकराव से बचने की इच्छा से जोड़ा गया है। 😟 अस्वीकृति का डर “अगर मैंने मना किया तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगा?” ⚔️ टकराव से बचना “हाँ” कहने से उस क्षण की असहजता खत्म हो जाती है। ❤️ स्वीकृति की चाह मनुष्य रिश्ते बनाए रखना और अपने बारे में सकारात्मक धारणा बनाए रखना चाहता है इन्हीं जरूरतों को सामाजिक प्रभाव के शोध में महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ माना गया है। मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट सियालदिनी और नोआ गोल्डस्टीन ने इस क्षेत्र के शोध की व्यापक समीक्षा की है। 🔄 एक और दिलचस्प सिद्धांत है-“प्रतिबद्धता और निरंतरता”। मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट सियालदिनी के अनुसार, एक बार हम किसी बात के लिए “हाँ” कह देते हैं, तो बाद में उसी के अनुरूप व्यवहार करने का दबाव महसूस कर सकते हैं। यानी एक छोटी “हाँ” आगे की बड़ी “हाँ” को आसान बना सकती है। इसका प्रसिद्ध उदाहरण “फुट-इन-द-डोर प्रभाव” है। 1966 में जोनाथन फ्रीडमैन और स्कॉट फ्रेज़र ने पाया कि जिन लोगों ने पहले एक छोटी-सी माँग स्वीकार की थी, वे बाद में बड़ी माँग मानने के लिए अधिक तैयार थे। लेकिन यहाँ बात और गहरी हो जाती है। 🪞 कभी-कभी “हाँ” किसी दूसरे की ज़रूरत से नहीं, बल्कि अपने ही ‘मैं’ को बचाने की कोशिश से निकलती है। “वह मुझे बुरा न समझे।” “रिश्ता खराब न हो जाए।” “लोग मुझे अच्छा इंसान समझें।” यानी हम सामने वाले को खुश करने के लिए नहीं, अपने बारे में बनी हुई छवि को बचाने के लिए भी “हाँ” कहते हैं। यहाँ सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “मैंने हाँ क्यों कहा?” बल्कि थोड़ा गहरा सवाल है: 🔍 “उस क्षण मेरे भीतर क्या चल रहा था? क्या मैं सचमुच मदद करना चाहता था, या अपनी स्वीकृति और सुरक्षा बचाना चाहता था?” स्रोत:
🚲 हर सुबह साढ़े सात बजे मिसेज़ थर्लो अपनी भारी साइकिल को पहाड़ी से नीचे धकेलती हैं। शाम करीब छह बजे उसी साइकिल को सामान से लादकर वापस ऊपर लाती हैं। 📖 साइकिल उनके लिए सवारी कम, बोझ ढोने का साधन ज़्यादा है। एच. ई. बेट्स की कहानी 'The Ox' में लेखक मिसेज़ थर्लो को भी इसी तरह हमारे सामने रखता है: लगातार काम करती हुईं, बोझ उठाती हुईं, लगभग किसी बैल की तरह। 🧹 वह घरों में सफ़ाई और धुलाई का काम करती हैं। इस लगातार मेहनत के केंद्र में एक उम्मीद है, उनके दो बेटों का भविष्य। वर्षों की मेहनत से उन्होंने लगभग 54 पाउंड जमा किए हैं। उनकी बड़ी चिंता यही है कि बेटों का भविष्य बेहतर हो। 🕙 लेकिन फिर उनका बनाया हुआ संसार एक-एक करके बिखरने लगता है। ⚠️ उनके पति हत्या करने के बाद गायब हो जाते हैं और उनकी जमा की हुई रकम भी साथ ले जाते हैं। बाद में उन्हें पकड़ लिया जाता है और अंततः फाँसी हो जाती है। इस सबके बाद भी उनके बेटे उनके पास हैं। 👦 लेकिन दोनों लड़के अपने अपेक्षाकृत संपन्न चाचा के साथ रहने लगते हैं। जब मिसेज़ थर्लो उन्हें वापस लेने पहुँचती हैं, तो लड़के उनके साथ लौटना नहीं चाहते। पैसा गया। पति गया। और अब बेटे भी। 🐂 कहानी के अंत में मिसेज़ थर्लो फिर अपनी उसी साइकिल को धकेलती हुई दिखाई देती हैं। ⛓️💥 लेकिन अब जिस भविष्य की ओर वह इतने वर्षों से बढ़ रही थीं, वही जैसे गायब हो चुका है। बेट्स की अंतिम छवि बेहद उदास है, वह आगे बढ़ रही हैं, लेकिन जैसे आगे अब कहीं पहुँचना ही नहीं है। 🪞 मिसेज़ थर्लो ने जो किया, उसे स्वार्थ कहना अन्याय होगा। पर उनकी स्थिति हमारे सामने एक कठिन सवाल ज़रूर रखती है: क्या किसी दूसरे का भविष्य धीरे-धीरे हमारे अपने जीवन का आधार बन सकता है? 🧐 हम अपने भीतर देखें तो अहंकार केवल धन, पद या प्रशंसा से ही पहचान नहीं बनाता। रिश्ते और भूमिकाएँ भी उसकी पहचान का आधार बन सकते हैं: "मेरे बच्चे" "मेरा परिवार" "मेरी ज़िम्मेदारी" 🌱 तब किसी अपने का जाना केवल उस व्यक्ति का जाना नहीं रह जाता। उसके साथ "मैं कौन हूँ?" का वह उत्तर भी हिलने लगता है, जो उस रिश्ते पर टिका था। 🥶 और शायद इसीलिए The Ox की अंतिम छवि इतनी बेचैन करती है। एक स्त्री अब भी वही साइकिल धकेल रही है। बोझ अब भी है। चलना भी जारी है। लेकिन जिस दिशा ने इतने वर्षों तक उस चलने को अर्थ दिया था, वह नहीं रही। 🔍 कहानी मिसेज़ थर्लो के त्याग पर फैसला सुनाने के बजाय सवाल हमारी तरफ़ मोड़ देती है: ❓ अगर वह व्यक्ति या भूमिका कल हट जाए जिसके सहारे मैं अपने जीवन को अर्थ देता हूँ, तो क्या केवल वह रिश्ता टूटेगा, या "मैं कौन हूँ?" का मेरा उत्तर भी?
Tume salah nahi sahi disha ki jarurat . he.
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